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ED केस खत्म, लेकिन कंपनी हाथ से गई: अहमद ए.आर. बुहारी की कानूनी जीत और कारोबारी हार ने खड़े किए बड़े सवाल

बिजनेस / कानून / कॉरपोरेट | ABC NATIONAL NEWS | चेन्नई | 20 मई 2026

चेन्नई के एनआरआई उद्योगपति और कोस्टल एनर्जेन प्राइवेट लिमिटेड (CEPL) के प्रमोटर अहमद ए.आर. बुहारी को आखिरकार प्रवर्तन निदेशालय (ED) के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी राहत मिल गई है। चेन्नई की विशेष PMLA अदालत ने उनके खिलाफ बचा हुआ अंतिम मामला भी समाप्त कर दिया, जिसके बाद लगभग चार वर्षों से चल रही कानूनी लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई। लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि अदालत से राहत मिलने के बावजूद बुहारी अपनी ही स्थापित कंपनी पर नियंत्रण खो चुके हैं। यही वजह है कि यह मामला केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि भारत में कॉरपोरेट दिवाला प्रक्रिया, एजेंसियों की कार्रवाई और बड़े औद्योगिक अधिग्रहणों पर नई बहस का कारण बनता दिखाई दे रहा है।

अहमद बुहारी को मार्च 2022 में ED ने लगभग 564 करोड़ रुपये के कथित घोटाले के मामले में गिरफ्तार किया था। उन पर आरोप था कि कंपनी ने आयातित कोयले की कीमतों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया और निम्न गुणवत्ता वाले कोयले की आपूर्ति की। यह मामला 2018 की CBI FIR पर आधारित था, जिसे बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने 2025 में खारिज कर दिया। इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट और विशेष अदालत के आदेशों ने भी ED के मामले की कानूनी नींव को कमजोर कर दिया। करीब 32 महीने हिरासत में बिताने के बाद बुहारी अब कानूनी रूप से राहत की स्थिति में हैं। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि अगर मूल आरोप ही टिक नहीं पाए, तो इतने लंबे समय तक चली कार्रवाई और हिरासत की जवाबदेही कौन तय करेगा?

इसी दौरान CEPL की आर्थिक स्थिति तेजी से बिगड़ती चली गई। तमिलनाडु के तूतीकोरिन स्थित 1200 मेगावाट के आयातित कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट का संचालन करने वाली यह कंपनी 6000 से 11000 करोड़ रुपये तक के भारी कर्ज में डूब गई और 2022 में कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में चली गई। बाद में डिके अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (DAIT) और अडानी पावर लिमिटेड के कंसोर्टियम ने NCLT द्वारा स्वीकृत समाधान योजना के तहत कंपनी का अधिग्रहण कर लिया। इस डील में लगभग 3335 करोड़ रुपये का भुगतान वित्तीय लेनदारों को किया गया। 2024 में इस अधिग्रहण को भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) की मंजूरी भी मिल गई।

हालांकि इस अधिग्रहण को बुहारी और कुछ शेयरधारकों ने अदालत में चुनौती दी थी, लेकिन अंततः सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिल सकी और अधिग्रहण प्रक्रिया जारी रही। अब यह प्लांट एक विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) के तहत संचालित हो रहा है और तमिलनाडु बिजली बोर्ड TANGEDCO को बिजली आपूर्ति कर रहा है। यानी कानूनी लड़ाई खत्म होने तक कंपनी का स्वामित्व और संचालन पूरी तरह बदल चुका था।

विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला भारत में कॉरपोरेट कानून और जांच एजेंसियों की भूमिका पर कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। क्या किसी कारोबारी के खिलाफ लंबी जांच और गिरफ्तारी का असर उसकी कंपनियों के भविष्य को स्थायी रूप से बदल सकता है, भले ही बाद में अदालतें आरोपों को खारिज कर दें? क्या दिवाला प्रक्रिया के दौरान मूल प्रमोटरों को पर्याप्त न्यायिक अवसर मिल पाता है? और सबसे बड़ा सवाल — क्या भारत की कॉरपोरेट व्यवस्था में कानूनी राहत मिलने तक बहुत देर हो चुकी होती है?

इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी दिखाया है कि भारत में आर्थिक अपराध, कॉरपोरेट दिवालियापन और रणनीतिक अधिग्रहण अब केवल कारोबारी विषय नहीं रहे, बल्कि वे राजनीतिक, कानूनी और संस्थागत शक्ति संतुलन का हिस्सा बन चुके हैं। अहमद बुहारी अदालत से मुक्त हो गए हैं, लेकिन जिस कंपनी को उन्होंने खड़ा किया था, वह अब उनके हाथ में नहीं है। यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा और सबसे प्रतीकात्मक निष्कर्ष बनकर सामने आया है।

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