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आर्थिक विकास से रणनीतिक ताकत तक: भारत की उभरती शक्ति का अधूरा सफर

ओपिनियन | प्रो. डॉ. जितेन्द्र भंडारी, अर्थशास्त्री | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 मई 2026

ऐसे समय में जब पाकिस्तान खुद को “शांति मध्यस्थ” के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा है, दुनिया एक असाधारण भू-राजनीतिक दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराता खतरा और वैश्विक शक्ति संतुलन में तेजी से हो रहे बदलाव भारत के सामने एक कठोर सच रख रहे हैं — केवल आर्थिक विकास अब पर्याप्त नहीं है। आज की दुनिया में ताकत केवल GDP से नहीं, बल्कि तकनीक, सप्लाई चेन, ऊर्जा मार्ग, वैश्विक वित्तीय ढांचे, दुर्लभ संसाधनों और रणनीतिक नियंत्रण से तय होती है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में जरूर शामिल है, लेकिन क्या वह ऐसी शक्ति बन पाया है जिसके बिना वैश्विक व्यवस्था प्रभावित हो जाए? यही आज का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

21वीं सदी की भू-अर्थव्यवस्था में शक्ति का अर्थ पूरी तरह बदल चुका है। अमेरिका केवल अपनी विशाल अर्थव्यवस्था के कारण महाशक्ति नहीं है; उसकी असली ताकत डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सिलिकॉन वैली और OpenAI तथा NVIDIA जैसी तकनीकी कंपनियों से आती है। चीन ने केवल विनिर्माण में ही नहीं, बल्कि रेयर अर्थ प्रोसेसिंग, बैटरी सप्लाई चेन, सोलर टेक्नोलॉजी और वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में भी अपनी निर्णायक पकड़ बना ली है। यहां तक कि छोटे देश भी रणनीतिक महत्व हासिल कर चुके हैं। ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य के कारण वैश्विक ऊर्जा राजनीति को प्रभावित करता है, जबकि ताइवान दुनिया के सबसे उन्नत सेमीकंडक्टर निर्माण का केंद्र है। इसके मुकाबले भारत की स्थिति विरोधाभासी दिखाई देती है — विशाल बाजार, युवा आबादी और डिजिटल क्रांति के बावजूद भारत अभी तक ऐसा वैश्विक “लीवरेज” विकसित नहीं कर पाया है जो अंतरराष्ट्रीय निर्णयों को प्रभावित कर सके।

भारत के पास कई महत्वपूर्ण ताकतें अवश्य हैं। राजनीतिक स्थिरता, मजबूत मैक्रो-इकोनॉमिक आधार, विशाल घरेलू बाजार, अनुकूल जनसांख्यिकीय संरचना और UPI व आधार जैसी विश्वस्तरीय डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रणालियां भारत की उपलब्धियां हैं। लेकिन ये उपलब्धियां अभी उस स्तर तक नहीं पहुंची हैं जहां दुनिया भारत पर रणनीतिक रूप से निर्भर हो जाए। दुनिया भारत में निवेश करना चाहती है, भारत के बाजार में प्रवेश करना चाहती है, लेकिन क्या दुनिया भारत के बिना चल नहीं सकती? यही वह अंतर है जो “आर्थिक आकार” और “वैश्विक प्रभाव” के बीच मौजूद है।

भारत की ऊर्जा निर्भरता इस कमजोरी का सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का 90 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश का तेल आयात बिल लगभग 135 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इनमें से आधे से ज्यादा आयात पश्चिम एशिया से आते हैं। इसका अर्थ साफ है — जैसे ही पश्चिम एशिया में युद्ध, समुद्री अवरोध या भू-राजनीतिक संकट पैदा होता है, उसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। महंगाई बढ़ती है, रुपया दबाव में आता है, राजकोषीय घाटा बढ़ता है और विकास दर प्रभावित होती है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने सस्ता रूसी तेल खरीदकर व्यावहारिक नीति जरूर अपनाई, लेकिन यह दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा नहीं कही जा सकती। भारत अभी भी वैश्विक ऊर्जा बाजार में “प्राइस टेकर” है, “प्राइस मेकर” नहीं।

सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी भारत के सामने यही चुनौती है। पिछले तीन दशकों में भारतीय आईटी उद्योग ने देश को वैश्विक पहचान दिलाई। अरबों डॉलर का निर्यात और लाखों नौकरियों ने भारत को सेवाक्षेत्र की महाशक्ति बना दिया। लेकिन भारत का आईटी मॉडल मुख्यतः श्रम-आधारित सेवाओं पर टिका रहा, न कि तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वामित्व पर। आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर, सेमीकंडक्टर डिजाइन और एडवांस्ड कंप्यूटिंग के युग में प्रवेश कर रही है, तब भारत की सीमाएं स्पष्ट दिखाई देने लगी हैं। Generative AI अब कोडिंग, डॉक्यूमेंटेशन, टेस्टिंग और बैक-ऑफिस कार्यों को स्वचालित करने लगी है। इससे भारत के उस “लेबर आर्बिट्राज मॉडल” को खतरा पैदा हो गया है जिस पर वर्षों से आईटी निर्यात आधारित रहा है। भारत के पास प्रतिभा जरूर है, लेकिन क्या उसके पास OpenAI, NVIDIA या TSMC जैसी निर्णायक वैश्विक तकनीकी शक्ति है? फिलहाल इसका उत्तर सीमित ही दिखाई देता है।

भारत की सबसे बड़ी संरचनात्मक कमजोरी विनिर्माण क्षेत्र में दिखाई देती है। इतिहास बताता है कि हर बड़ी आर्थिक शक्ति बड़े पैमाने के औद्योगिकीकरण से उभरी। चीन दुनिया की फैक्ट्री बना, दक्षिण कोरिया ने इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल उद्योगों में वैश्विक ब्रांड तैयार किए, वियतनाम वैश्विक सप्लाई चेन में गहराई से शामिल हुआ। भारत ने अपेक्षाकृत जल्दी सेवाक्षेत्र आधारित विकास मॉडल अपना लिया, जबकि उसका विनिर्माण क्षेत्र आज भी GDP के लगभग 15-17 प्रतिशत के आसपास सीमित है। दूसरी ओर, देश की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी अभी भी कम उत्पादक कृषि क्षेत्र में फंसी हुई है। यह असंतुलन रोजगार सृजन, निर्यात क्षमता और औद्योगिक विस्तार — तीनों को सीमित करता है।

“मेक इन इंडिया” और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी योजनाएं सही दिशा में उठाए गए कदम हैं, लेकिन चुनौती उससे कहीं बड़ी है। भारत को केवल उत्पादन नहीं, बल्कि ऐसे औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने होंगे जिन पर वैश्विक बाजार निर्भर हों। यदि भारत वैश्विक सप्लाई चेन का केंद्रीय नोड नहीं बनता, तो वह केवल एक विशाल उपभोक्ता बाजार बनकर रह जाएगा।

व्यापारिक दृष्टि से भी भारत की स्थिति मिश्रित है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के बावजूद वैश्विक मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में भारत की हिस्सेदारी लगभग 2-3 प्रतिशत के आसपास ही है। भारत के निर्यात बाजार मुख्यतः अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों पर निर्भर हैं, लेकिन भारत की इन देशों की नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता सीमित है। यही संरचनात्मक असमानता भविष्य के भू-राजनीतिक तनावों में भारत की कमजोरी बन सकती है।

असल चुनौती यही है कि भारत वैश्विक व्यवस्था में “भागीदारी” तो कर रहा है, लेकिन “निर्णायक नियंत्रण” उसके हाथ में नहीं है। वैश्विक प्रभाव तब पैदा होता है जब दुनिया आपके नियंत्रण वाले किसी संसाधन, तकनीक, सप्लाई चेन, वित्तीय ढांचे या समुद्री मार्ग पर निर्भर हो। भारत अभी बहुत कम ऐसे रणनीतिक बिंदुओं को नियंत्रित करता है।

फिर भी भारत की स्थिति निराशाजनक नहीं है। भारत दुनिया की सबसे युवा बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उसके पास विशाल घरेलू बाजार, तकनीकी प्रतिभा और दीर्घकालिक विकास की क्षमता है। लेकिन आने वाले दशक की वैश्विक प्रतिस्पर्धा केवल विकास दर से तय नहीं होगी। असली सवाल यह होगा कि AI मॉडल कौन नियंत्रित करता है, सेमीकंडक्टर कौन बनाता है, ऊर्जा मार्ग किसके प्रभाव में हैं, और वैश्विक डिजिटल प्लेटफॉर्म किसके हाथों में हैं।

भारत के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती “आर्थिक आकार” को “रणनीतिक प्रभाव” में बदलने की है। इसके लिए केवल GDP वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी। देश को तकनीकी अनुसंधान, सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा प्रौद्योगिकी, औद्योगिक क्षमता और उच्च मूल्य वाली वैश्विक सप्लाई चेन में गहरे निवेश की जरूरत होगी। भारत को सेवाक्षेत्र आधारित विकास से आगे बढ़कर तकनीकी और विनिर्माण गहराई हासिल करनी ही होगी।

क्योंकि सबसे बड़ा खतरा आर्थिक मंदी नहीं, बल्कि यह है कि भारत धीरे-धीरे ऐसी वैश्विक व्यवस्था का हिस्सा बन जाए जिसे वह प्रभावित ही न कर सके। आने वाली दुनिया में वही देश निर्णायक होंगे जिनके बिना वैश्विक व्यवस्था सुचारु रूप से चल नहीं सकती। भारत ने आर्थिक आकार हासिल कर लिया है। अब उसे रणनीतिक प्रभाव हासिल करना होगा।

भारत के लिए असली खतरा किसी अचानक पतन में नहीं, बल्कि धीरे-धीरे ऐसी वैश्विक व्यवस्थाओं का हिस्सा बन जाने में है, जिन्हें वह अंततः प्रभावित ही न कर सके। उभरती हुई भू-अर्थव्यवस्था में प्रभाव अब उन देशों के पास जाता जा रहा है, जिनके बिना दुनिया सुचारु रूप से चल नहीं सकती। भारत ने आकार और विस्तार तो हासिल कर लिया है, लेकिन अगली बड़ी चुनौती रणनीतिक प्रभाव और निर्णायक पकड़ हासिल करने की है। अन्यथा स्थिति कुछ वैसी ही हो सकती है जैसी अमिताभ बच्चन की मशहूर फिल्म ‘दीवार’ में थी — जहां उनके पास लगभग सब कुछ था, लेकिन असली ताकत और नैतिक प्रभाव (मां) शशि कपूर के पास था।

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