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भारत-इटली “स्पेशल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप”: क्या मोदी की नई कूटनीति भारत को वैश्विक शक्ति बना पाएगी?

ओपिनियन / अंतरराष्ट्रीय | अखलाक उस्मानी | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली / रोम | 20 मई 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के बीच रोम में हुई शिखर वार्ता केवल एक औपचारिक द्विपक्षीय मुलाकात नहीं थी, बल्कि यह तेजी से बदलती वैश्विक भू-राजनीति में भारत की नई रणनीतिक दिशा का संकेत भी थी। भारत और इटली ने अपने संबंधों को “स्पेशल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप” तक अपग्रेड करने का फैसला किया है। साथ ही 2025-2029 के लिए संयुक्त रणनीतिक कार्ययोजना (Joint Strategic Action Plan) पर आगे बढ़ने की घोषणा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देश अब पारंपरिक कूटनीति से आगे बढ़कर तकनीक, रक्षा, ऊर्जा, AI, स्पेस, समुद्री सुरक्षा और इंडो-मेडिटेरेनियन कॉरिडोर जैसे भविष्य के क्षेत्रों में गहरी साझेदारी बनाना चाहते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने “Design and Develop in India and Italy and Deliver for the World” का नया मंत्र देकर यह संदेश देने की कोशिश की कि भारत अब केवल बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक उत्पादन और इनोवेशन नेटवर्क का हिस्सा बनना चाहता है। इटली डिजाइन, इंजीनियरिंग और प्रिसिशन मैन्युफैक्चरिंग के लिए जाना जाता है, जबकि भारत के पास विशाल बाजार, तकनीकी प्रतिभा और स्केल है। यदि यह साझेदारी सही दिशा में आगे बढ़ती है, तो यह भारत को यूरोप के साथ तकनीकी और औद्योगिक सहयोग का नया रास्ता दे सकती है।

लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह साझेदारी केवल प्रतीकात्मक कूटनीति बनकर रह जाएगी या वास्तव में भारत की रणनीतिक क्षमता को मजबूत करेगी? आज दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, उसमें केवल दोस्ती और संयुक्त बयान पर्याप्त नहीं हैं। वैश्विक शक्ति अब उन देशों के पास है जो सप्लाई चेन, AI, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा मार्ग, डिजिटल प्लेटफॉर्म और रक्षा तकनीक को नियंत्रित करते हैं। ऐसे में भारत-इटली साझेदारी की असली परीक्षा इस बात से होगी कि क्या यह भारत को तकनीकी आत्मनिर्भरता, रक्षा उत्पादन और वैश्विक विनिर्माण नेटवर्क में वास्तविक बढ़त दिला पाती है या नहीं।

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भारत और इटली के बीच बढ़ती नजदीकी का एक बड़ा भू-राजनीतिक संदर्भ भी है। यूरोप चीन पर अत्यधिक आर्थिक निर्भरता को कम करना चाहता है, जबकि भारत पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत कर अपनी वैश्विक स्थिति को और प्रभावशाली बनाना चाहता है। इंडो-मेडिटेरेनियन कॉरिडोर की चर्चा इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जहां भारत हिंद महासागर से लेकर भूमध्यसागर तक व्यापार, ऊर्जा और लॉजिस्टिक कनेक्टिविटी में बड़ी भूमिका निभाना चाहता है। यह चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के मुकाबले पश्चिम समर्थित वैकल्पिक आर्थिक गलियारे की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

हालांकि, विपक्ष इस पूरी कूटनीति को अलग नजरिए से देख रहा है। राहुल गांधी ने मोदी-मेलोनी की “मेलोडी टॉफी” वाली तस्वीरों और वीडियो पर तंज कसते हुए कहा कि देश आर्थिक संकट और महंगाई के खतरे का सामना कर रहा है, जबकि प्रधानमंत्री “रील डिप्लोमेसी” में व्यस्त हैं। विपक्ष का आरोप है कि विदेश यात्राओं और इमेज मैनेजमेंट से अधिक जरूरी घरेलू आर्थिक चुनौतियों, बेरोजगारी, निवेश संकट और ऊर्जा असुरक्षा पर ध्यान देना है। भाजपा इसे भारत की मजबूत वैश्विक छवि और आधुनिक कूटनीतिक शैली बता रही है।

सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं मौजूद है। यह भी सच है कि आज की दुनिया में व्यक्तिगत नेतृत्व, विजुअल डिप्लोमेसी और सोशल मीडिया आधारित राजनीतिक संचार वैश्विक राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि केवल प्रतीकात्मक तस्वीरें और दोस्ताना केमिस्ट्री किसी देश को रणनीतिक शक्ति नहीं बनातीं। असली ताकत तब बनती है जब साझेदारियां तकनीक, व्यापार, रक्षा उत्पादन, निवेश और वैश्विक प्रभाव में ठोस परिणाम देती हैं।

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भारत और इटली के बीच यह नई “स्पेशल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप” इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की उस बड़ी कोशिश का हिस्सा है जिसमें वह पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों के साथ गहरे आर्थिक और तकनीकी गठबंधन बनाकर खुद को वैश्विक शक्ति संतुलन में निर्णायक खिलाड़ी के रूप में स्थापित करना चाहता है। AI, क्लीन एनर्जी, क्रिटिकल मिनरल्स, स्पेस और न्यूक्लियर एनर्जी जैसे क्षेत्रों में सहयोग भारत की भविष्य की आर्थिक और रणनीतिक दिशा तय कर सकते हैं।

लेकिन अंतिम सवाल अब भी वही है — क्या भारत केवल वैश्विक मंचों पर दिखाई देने वाली शक्ति बनेगा, या ऐसी शक्ति बनेगा जिसके बिना वैश्विक व्यवस्था अधूरी लगे? रोम में हुई मोदी-मेलोनी मुलाकात ने उम्मीदें जरूर बढ़ाई हैं। अब असली चुनौती उन उम्मीदों को रणनीतिक परिणामों में बदलने की है।

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