[the_ad id="179"]
Home » Politics » सजा के बाद भी BJP विधायक की कुर्सी बरकरार? दीपांकर ने स्पीकर से पूछा—मंज़िल पर कार्रवाई, राजू सिंह पर चुप्पी क्यों?

सजा के बाद भी BJP विधायक की कुर्सी बरकरार? दीपांकर ने स्पीकर से पूछा—मंज़िल पर कार्रवाई, राजू सिंह पर चुप्पी क्यों?

राजनीति/ बिहार | ABC NATIONAL NEWS | पटना | 4 अक्टूबर 2026

बिहार की राजनीति में एक बार फिर विधायकों की सदस्यता और विधानसभा की कार्रवाई में कथित दोहरे मापदंड का सवाल खड़ा हो गया है। भाकपा-माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने बीजेपी विधायक राजू सिंह की सदस्यता को लेकर बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार पर सीधा सवाल उठाया है। दीपांकर का कहना है कि राजू सिंह एक ऐसे मामले में दोषी ठहराए जा चुके हैं जिसमें जश्न में हुई गोलीबारी के दौरान एक महिला की मौत हुई थी, फिर भी उनकी विधानसभा सदस्यता को लेकर अब तक कोई फैसला सामने नहीं आया है। इसके उलट भाकपा-माले विधायक मनोज मंजिल को दोषसिद्धि के बाद तत्काल विधानसभा की सदस्यता से हटा दिया गया था। दीपांकर ने इसी अंतर को आधार बनाकर पूछा है कि जब एक विधायक की सदस्यता पर तुरंत कार्रवाई हो सकती है, तो दूसरे विधायक के मामले में फैसला लंबित क्यों है?

दीपांकर भट्टाचार्य ने रविवार को पटना में ‘शिक्षा बचाओ, देश बचाओ’ सेमिनार के दौरान यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि मनोज मंजिल के मामले में दोषसिद्धि के बाद विधानसभा की सदस्यता समाप्त करने में देर नहीं की गई थी, लेकिन बीजेपी विधायक राजू सिंह के मामले में अलग रवैया दिखाई दे रहा है। दीपांकर ने विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार से इस अंतर का जवाब मांगा और सवाल उठाया कि आखिर इस मामले में निर्णय लेने में देरी क्यों हो रही है। उनका सवाल सिर्फ एक विधायक की सदस्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विधानसभा की निष्पक्षता, संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और कानून के सामने समानता से जुड़ा बड़ा राजनीतिक सवाल बन गया है।

मामला क्या है? राजू सिंह को एक जश्न के दौरान हुई गोलीबारी के मामले में दोषी ठहराया गया था। इस घटना में एक महिला की मौत हुई थी। दीपांकर भट्टाचार्य का सवाल है कि जब अदालत से दोषसिद्धि के बाद मनोज मंजिल की सदस्यता तत्काल समाप्त कर दी गई थी, तो राजू सिंह के मामले में विधानसभा अध्यक्ष की ओर से अब तक क्या निर्णय लिया गया है और कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष की मंशा पर भी सवाल उठाया है। हालांकि, इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष या बीजेपी की ओर से कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आने की बात इस रिपोर्ट में नहीं कही गई है।

मनोज मंजिल का उदाहरण क्यों महत्वपूर्ण है? दीपांकर ने अपने सवाल को मजबूत करने के लिए मनोज मंजिल के मामले का हवाला दिया। उनका कहना है कि जब भाकपा-माले विधायक को हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था, तब उनकी सदस्यता तत्काल समाप्त कर दी गई। अब बीजेपी विधायक की दोषसिद्धि के बावजूद सदस्यता को लेकर फैसला नहीं होने से यह सवाल उठता है कि क्या विधानसभा में दोषसिद्धि के मामलों के लिए कार्रवाई का एक समान पैमाना है या राजनीतिक पहचान के आधार पर अलग-अलग रवैया अपनाया जा रहा है। यही वह बिंदु है जिस पर दीपांकर ने विधानसभा अध्यक्ष से स्पष्ट जवाब मांगा है।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब बिहार की राजनीति पहले ही चुनावी माहौल में बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रही है। ऐसे में किसी निर्वाचित विधायक की सदस्यता पर कार्रवाई का सवाल सीधे जनता के विश्वास से जुड़ जाता है। विधानसभा में पहुंचने वाला हर विधायक जनता के वोट से आता है और उसकी सदस्यता को लेकर कोई भी निर्णय केवल राजनीतिक दलों का आंतरिक मामला नहीं रह जाता। खासकर तब, जब मामला किसी गंभीर अपराध में अदालत द्वारा दोषसिद्धि से जुड़ा हो। ऐसे मामलों में विधानसभा की कार्रवाई जितनी पारदर्शी और स्पष्ट होगी, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा उतना ही मजबूत रहेगा।

दीपांकर भट्टाचार्य ने मूल सवाल यही खड़ा किया है कि कानून और विधानसभा की कार्रवाई सबके लिए समान है या नहीं? अगर दोषसिद्धि के बाद एक विधायक की सदस्यता समाप्त की जा सकती है, तो दूसरे विधायक के मामले में प्रक्रिया क्या है और निर्णय में देरी का कारण क्या है—इसका जवाब विधानसभा अध्यक्ष को देना चाहिए। सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि विधानसभा अध्यक्ष का पद राजनीतिक दल से ऊपर संवैधानिक जिम्मेदारी का पद माना जाता है। किसी सदस्य की सदस्यता पर फैसला करते समय निष्पक्षता और समान मानदंड लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी शर्त हैं।

फिलहाल दीपांकर भट्टाचार्य के आरोपों ने बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार के सामने सीधा सवाल खड़ा कर दिया है—मनोज मंजिल के मामले में तत्काल कार्रवाई और राजू सिंह के मामले में इंतजार क्यों? अब निगाह इस बात पर है कि विधानसभा अध्यक्ष इस सवाल का क्या जवाब देते हैं और राजू सिंह की सदस्यता को लेकर कोई औपचारिक निर्णय कब सामने आता है। यह विवाद केवल एक विधायक की कुर्सी का नहीं, बल्कि विधानसभा की निष्पक्षता और कानून के समान अनुप्रयोग पर जनता के भरोसे का सवाल बन चुका है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *