राष्ट्रीय/बिहार | ABC NATIONAL NEWS | पटना | 4 अक्टूबर 2026
बिहार के कई जिलों में बाढ़ से बिगड़े हालात के बीच अब सरकार से जवाबदेही तय करने की मांग तेज हो गई है। बक्सर से RJD सांसद सुधाकर सिंह ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बाढ़ और तटबंधों के टूटने की घटनाओं की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। उन्होंने सवाल उठाया है कि आखिर बार-बार तटबंध और बांध टूटने की नौबत क्यों आ रही है और इनके निर्माण तथा रखरखाव पर खर्च होने वाली रकम का जमीन पर कितना असर दिखाई दे रहा है। सुधाकर सिंह ने निर्माण और रखरखाव पर हुए खर्च की समीक्षा कराने के साथ-साथ लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और इंजीनियरों के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की है। उनका कहना है कि यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा का मामला नहीं माना जा सकता, क्योंकि तटबंधों के टूटने से लोगों के घर, खेत, पशुधन और आजीविका तक तबाह हो रही है।
सुधाकर सिंह ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में बाढ़ की गंभीर स्थिति और विभिन्न इलाकों में बांध तथा तटबंधों के टूटने की घटनाओं को बेहद चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि बाढ़ का सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ रहा है। कई जगहों पर घरों के बह जाने की खबरें सामने आ रही हैं, जबकि कृषि भूमि और फसलों को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है। ग्रामीण परिवारों के सामने एक साथ कई संकट खड़े हो गए हैं—रहने के लिए सुरक्षित जगह, खाने-पीने का इंतजाम, पशुओं को बचाने की चुनौती और रोजी-रोटी का सवाल। बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी प्रभावित परिवारों के लिए संकट खत्म नहीं होगा, क्योंकि खेतों में खड़ी फसल के नुकसान और मकानों की क्षति का असर लंबे समय तक उनकी आर्थिक स्थिति पर रह सकता है।
सांसद की मांग का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा तटबंधों के निर्माण और रखरखाव पर हुए सरकारी खर्च की जांच है। उनका कहना है कि यदि किसी इलाके में बार-बार तटबंध टूट रहे हैं तो यह देखना जरूरी है कि वहां निर्माण किस गुणवत्ता का हुआ, रखरखाव के लिए कितनी राशि खर्च की गई, काम की निगरानी किस स्तर पर हुई और संबंधित विभाग के अधिकारियों तथा इंजीनियरों ने अपनी जिम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभाई। सवाल यह है कि करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी यदि बाढ़ का पानी तटबंध तोड़कर गांवों और आबादी में पहुंच जाता है, तो जवाबदेही किसकी होगी। सुधाकर सिंह ने इसी आधार पर खर्च की समीक्षा और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई है।
बिहार जैसे बाढ़ प्रभावित राज्य में तटबंधों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। हर साल मानसून के दौरान नदियों के जलस्तर बढ़ने के साथ हजारों परिवार बाढ़ के खतरे में आ जाते हैं। ऐसे में तटबंध सिर्फ मिट्टी और पत्थर की संरचना नहीं होते, बल्कि लाखों लोगों के घर, खेत और जीवन की सुरक्षा से जुड़े होते हैं। यदि इनमें कमजोरी सामने आती है तो उसका खामियाजा सीधे ग्रामीण आबादी को भुगतना पड़ता है। इसलिए सुधाकर सिंह का सवाल यह है कि बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाने से पहले उन व्यवस्थाओं की भी जांच होनी चाहिए जो लोगों को बाढ़ से बचाने के लिए बनाई गई थीं।
सुधाकर सिंह ने अधिकारियों और इंजीनियरों की जवाबदेही तय करने की मांग भी इसी संदर्भ में की है। उनका कहना है कि अगर जांच में लापरवाही, घटिया निर्माण या रखरखाव में अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। यह मांग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्राकृतिक आपदा और प्रशासनिक लापरवाही के बीच अंतर करना जरूरी है। भारी बारिश और नदियों का उफान प्राकृतिक परिस्थितियां हो सकती हैं, लेकिन कमजोर तटबंध, खराब रखरखाव या निर्माण में कथित अनियमितता प्रशासनिक जिम्मेदारी का विषय बन जाती है।
फिलहाल बिहार में बाढ़ की स्थिति ने सरकार के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है—एक तरफ प्रभावित लोगों को तत्काल राहत और सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराना, दूसरी तरफ उन कारणों की जांच करना जिनकी वजह से तटबंध और बांध टूटने की घटनाएं हुईं। सुधाकर सिंह ने मुख्यमंत्री से स्वतंत्र जांच की मांग करके इस मुद्दे को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे जवाबदेही और सरकारी खर्च की जांच के सवाल से जोड़ दिया है। अब देखना होगा कि राज्य सरकार इस मांग पर क्या कदम उठाती है और क्या तटबंधों के निर्माण एवं रखरखाव पर खर्च हुई राशि तथा संबंधित अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच कराई जाती है।


