ओपिनियन | राष्ट्रीय/केरल/शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | 9 अगस्त 2026
तिरुवनंतपुरम। केरल के कासरगोड में प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के लिए आयोजित एक ‘फ्रीडम क्विज’ में विनायक दामोदर सावरकर से जुड़े सवाल ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। क्विज में पूछा गया कि ब्रिटिश शासन के दौरान किस स्वतंत्रता सेनानी को सबसे कठोर सजा मिली थी और अपेक्षित उत्तर सावरकर बताया गया। राज्य के शिक्षा विभाग ने इस सवाल को ऐतिहासिक रूप से गलत बताया है और जांच के आदेश दिए हैं। विभाग का कहना है कि यह क्विज उसकी अधिकृत गतिविधि का हिस्सा नहीं था। विवाद केवल एक सवाल तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि इतिहास के ऐसे व्यक्तित्व, जिनकी भूमिका और राजनीतिक विरासत पर गंभीर बहस मौजूद है, उन्हें प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के सामने किस तरह प्रस्तुत किया जाना चाहिए। किसी ऐतिहासिक व्यक्ति का नाम लेना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन उसे बिना संदर्भ और बिना विवादित तथ्यों का उल्लेख किए स्वतंत्रता संग्राम के निर्विवाद नायक के रूप में प्रस्तुत करना शिक्षा की निष्पक्षता पर सवाल जरूर खड़ा करता है।
‘सबसे कठोर सजा’ वाला सवाल कितना ऐतिहासिक?
सबसे पहले उस प्रश्न की भाषा पर बात होनी चाहिए। ‘ब्रिटिश शासन में सबसे कठोर सजा पाने वाला स्वतंत्रता सेनानी कौन था?’—यह अपने आप में एक ऐसा प्रश्न है जिसके लिए स्पष्ट ऐतिहासिक मानदंड चाहिए। सावरकर को अंडमान की सेल्युलर जेल में दो आजीवन कारावास की सजा दी गई थी, लेकिन इसे सीधे तौर पर ‘सबसे कठोर सजा’ घोषित करने के लिए अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को मिली सजाओं और उनके संदर्भ से तुलना करनी होगी। प्राथमिक कक्षा के बच्चों के लिए तैयार किए गए क्विज में ऐसी विवादास्पद और व्यापक श्रेणी का इस्तेमाल करना निश्चित रूप से सवाल खड़े करता है। यदि शिक्षा विभाग इसे तथ्यात्मक रूप से गलत मानता है तो उसे इसकी जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। बच्चों को इतिहास पढ़ाते समय प्रभावशाली शब्दों के बजाय प्रमाणित तथ्य सबसे ऊपर होने चाहिए।
सावरकर का इतिहास केवल जेल जाने तक सीमित नहीं
सावरकर की राजनीतिक विरासत को समझने के लिए उनके जीवन के सभी प्रमुख पहलुओं को सामने रखना जरूरी है। यह तथ्य ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हिस्सा है कि सावरकर को ब्रिटिश शासन ने गिरफ्तार किया, उन पर मुकदमा चला और उन्हें कठोर कारावास की सजा हुई। लेकिन उनका पूरा राजनीतिक जीवन केवल इसी आधार पर नहीं समझा जा सकता। जेल के दौरान और उसके बाद ब्रिटिश सरकार को लिखी गई उनकी दया या क्षमादान याचिकाएं उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण और विवादित हिस्सा हैं। उनके परपोते सत्यकी सावरकर ने पुणे की एक अदालत में बयान देते हुए दावा किया है कि सावरकर ने ब्रिटिश सरकार को कई क्षमादान याचिकाएं दी थीं। इन याचिकाओं की राजनीतिक और ऐतिहासिक व्याख्या को लेकर मतभेद जरूर हैं, लेकिन इन्हें इतिहास की चर्चा से बाहर रखना भी उचित नहीं होगा।
इसी तरह सावरकर के रत्नागिरी में नजरबंदी के दौरान ब्रिटिश सरकार से मिलने वाले भत्ते का उल्लेख भी विभिन्न स्रोतों में मिलता है। सावरकर से जुड़े अपने स्रोत में भी 60 रुपये मासिक भत्ते का उल्लेख मिलता है। लेकिन इसे ‘पेंशन’ कहने से पहले उसके प्रशासनिक और ऐतिहासिक संदर्भ को समझना जरूरी है। इतिहास का काम किसी व्यक्ति को बचाना या गिराना नहीं, बल्कि दस्तावेजों और परिस्थितियों को सामने रखना है।
माफी की याचिकाओं पर बहस क्यों नहीं होनी चाहिए?
सावरकर के समर्थक इन याचिकाओं को राजनीतिक रणनीति बताते हैं, जबकि आलोचक इन्हें ब्रिटिश सरकार से रिहाई और राहत मांगने के रूप में देखते हैं। इस विवाद को छिपाने के बजाय बच्चों की उम्र और शैक्षिक स्तर के अनुरूप आगे की कक्षाओं में समझाया जा सकता है। आखिर इतिहास केवल उन घटनाओं का नाम नहीं है जिन पर सभी सहमत हों। इतिहास में विवाद भी होते हैं, व्याख्याएं भी होती हैं और दस्तावेजों के अलग-अलग अर्थ भी निकाले जाते हैं।
यही कारण है कि सावरकर को केवल ‘वीर’ या केवल ‘देशद्रोही’ जैसे राजनीतिक विशेषणों में बांधना दोनों ही गलत होंगे। लेकिन यदि किसी क्विज में उन्हें बिना किसी संदर्भ के स्वतंत्रता संग्राम के महान नायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उस प्रस्तुति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। बच्चों को यह भी जानना चाहिए कि सावरकर की राजनीति बाद के दौर में हिंदुत्व की वैचारिक अवधारणा से गहराई से जुड़ी और उनका राजनीतिक प्रभाव स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक राष्ट्रवादी विमर्श से अलग विशिष्ट दिशा में विकसित हुआ।
स्कूल में इतिहास पढ़ाया जाए, राजनीतिक छवि नहीं
प्राथमिक शिक्षा में सबसे बड़ी सावधानी यही होनी चाहिए कि बच्चों के सामने इतिहास को राजनीतिक प्रचार की भाषा में न रखा जाए। यदि प्रश्न यह हो कि ‘सावरकर कौन थे?’ तो बच्चों को उनके जीवन के प्रमुख तथ्य बताए जा सकते हैं। लेकिन यदि प्रश्न की संरचना ही उन्हें ‘सबसे कठोर सजा पाने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी’ के रूप में स्थापित करती है, तो वह तथ्यात्मक जानकारी से आगे जाकर एक मूल्यांकन भी प्रस्तुत करती है।
यही समस्या किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व के साथ होगी। अगर गांधी को केवल महान और निर्विवाद बताया जाए तो इतिहास अधूरा होगा। अगर नेहरू को केवल गलत बताया जाए तो भी इतिहास अधूरा होगा। इसी तरह सावरकर को केवल महान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में पेश करना भी इतिहास की पूरी तस्वीर नहीं है। बच्चों को व्यक्ति नहीं, पूरा संदर्भ पढ़ाया जाना चाहिए।
इतिहास में सावरकर की भूमिका पर सवाल जरूरी हैं
सावरकर के समर्थक उन्हें ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष करने वाले क्रांतिकारी के रूप में देखते हैं। दूसरी ओर उनके आलोचक उनकी क्षमादान याचिकाओं, बाद की राजनीतिक विचारधारा और हिंदुत्व की अवधारणा को लेकर गंभीर सवाल उठाते हैं। यह बहस लोकतंत्र में होनी चाहिए और इतिहास की कक्षाओं में भी तथ्यात्मक रूप से समझी जानी चाहिए।
विशेष रूप से प्राथमिक स्तर पर बच्चों को किसी राजनीतिक विचारधारा से जोड़ना उचित नहीं है। उन्हें यह बताने की जरूरत नहीं कि सावरकर सही थे या गलत। उन्हें इतना जरूर बताया जाना चाहिए कि सावरकर के बारे में इतिहास में एक से अधिक दृष्टिकोण मौजूद हैं और किसी भी दावे को समझने के लिए प्रमाण देखना जरूरी है।
‘सैफ्रनाइजेशन’ के आरोप को भी तथ्यों पर परखना होगा
केरल में वामपंथी दलों और छात्र संगठनों ने इस सवाल को शिक्षा के ‘सैफ्रनाइजेशन’ से जोड़ते हुए आरोप लगाए हैं कि बच्चों के बीच संघ परिवार की विचारधारा को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। दूसरी ओर भाजपा ने सावरकर को स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण व्यक्तित्व बताते हुए इसे राजनीतिक विवाद न बनाने की बात कही है।
इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि शिक्षा विभाग ने स्वयं कहा है कि क्विज उसकी अधिकृत गतिविधि नहीं थी और प्रश्न की ऐतिहासिक शुद्धता की जांच की जा रही है। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच की रिपोर्ट का इंतजार करना जरूरी है। लेकिन यदि जांच में यह सामने आता है कि बच्चों के सामने सावरकर की भूमिका को एकतरफा और महिमामंडित तरीके से पेश किया गया, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल होगा।
विचारधारा किसी भी रंग की हो, बच्चों पर नहीं थोपी जानी चाहिए
यह केवल सावरकर की बात नहीं है। स्कूलों में किसी भी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार नहीं होना चाहिए। न दक्षिणपंथी विचारधारा को बच्चों पर थोपा जाए और न वामपंथी विचारधारा को। न किसी नेता को देवता बनाया जाए और न किसी को खलनायक घोषित करके इतिहास से बाहर कर दिया जाए।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि हर ऐतिहासिक व्यक्तित्व को समान रूप से ‘महान’ बताकर विवादों को दबा दिया जाए। जहां ऐतिहासिक विवाद हैं, वहां बच्चों को उम्र के अनुसार तथ्य और संदर्भ देना ही सबसे ईमानदार शिक्षा है।
बच्चों को सवाल करने दीजिए, जवाब थोपिए मत
आज जरूरत इस बात की है कि बच्चों को सावरकर के बारे में पढ़ने से रोका न जाए, बल्कि उन्हें पूरा इतिहास पढ़ाया जाए। उनकी जेल यात्रा पढ़ाई जाए, ब्रिटिश सरकार के साथ उनका पत्राचार पढ़ाया जाए, क्षमादान याचिकाओं का संदर्भ समझाया जाए, उनकी हिंदुत्व संबंधी विचारधारा पढ़ाई जाए और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका पर इतिहासकारों के अलग-अलग मत भी बताए जाएं।
इसी तरह गांधी, नेहरू, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और पटेल समेत हर ऐतिहासिक व्यक्तित्व को आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ाया जाना चाहिए। बच्चों को तैयार जवाब देने के बजाय सवाल करने की क्षमता देना ही शिक्षा का असली उद्देश्य है।
केरल का यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल सावरकर से जुड़ा मामला नहीं है। यह इस बड़े सवाल को सामने लाता है कि आने वाली पीढ़ी को हम कैसा इतिहास देना चाहते हैं—ऐसा इतिहास जिसमें राजनीतिक दल अपने-अपने नायक चुनकर बच्चों को सौंप दें, या ऐसा इतिहास जिसमें बच्चे तथ्य पढ़ें, दस्तावेज देखें, अलग-अलग दृष्टिकोण समझें और खुद निष्कर्ष निकालें।
सावरकर का महिमामंडन नहीं होना चाहिए, लेकिन उनके इतिहास को छिपाना भी समाधान नहीं है। उनकी भूमिका, उनकी विचारधारा, उनकी क्षमादान याचिकाएं और ब्रिटिश शासन के साथ उनके संबंध—हर पहलू को प्रमाण और संदर्भ के साथ सामने रखना चाहिए। क्योंकि इतिहास का काम किसी विचारधारा को मजबूत करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को सच और दावे के बीच फर्क करना सिखाना है।




