भागलपुर 6 नवंबर 2025
बिहार में चुनावी सरगर्मी बढ़ते ही राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप और भी तीखे होते जा रहे हैं। इसी कड़ी में कांग्रेस ने NDA सरकार पर बड़ा हमला बोला है। पार्टी का कहना है कि भाजपा–जेडीयू गठबंधन ने पिछले कई चुनावों में विकास की बड़ी-बड़ी बातें कीं, मगर नीती आयोग की ताज़ा रिपोर्ट इस दावे को झुठलाती है। रिपोर्ट साफ तौर पर यह बताती है कि बिहार अब भी देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार है — और यह कोई तात्कालिक स्थिति नहीं, बल्कि वर्षों की राजनीतिक उपेक्षा और कुप्रबंधन का परिणाम है। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक, सत्ता पक्ष के नेताओं ने विकास के नाम पर वोट तो हासिल कर लिए, मगर उन वादों को पूरा करने की मंशा ही नहीं दिखाई। आठ–दस वर्षों से लगातार NDA शासन में रहने के बावजूद बिहार गरीबी, बेरोज़गारी, महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा में अभी भी तलहटी में है। कांग्रेस ने इसे “विकास का विज्ञापन” बताया है — जिसमें चमकीले होर्डिंग हैं, लेकिन धरातल पर जर्जर ज़िंदगी का सच जस का तस बना हुआ है।
कांग्रेस ने विशेष रूप से सीमांचल और भागलपुर का मुद्दा उठाया है, यह कहते हुए कि इन क्षेत्रों के साथ दशकों से आर्थिक भेदभाव किया गया है। सीमांचल के जिले — किशनगंज, मदरपुरा, अररिया, पूर्णिया — देश के सबसे पिछड़े जिलों की सूची में शामिल हैं। यहाँ आज भी बाढ़ से तबाही, स्वास्थ्य केंद्रों की कमी, स्कूली शिक्षा में गिरावट, और युवाओं के पास रोजगार के अवसर लगभग न के बराबर हैं। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि यह वही इलाका है जो देश की सुरक्षा, सीमा संरक्षण और रणनीतिक महत्त्व के लिहाज़ से बेहद अहम है, फिर भी यहां आधारभूत ढांचा सबसे कमजोर है। वहीं भागलपुर जैसे ऐतिहासिक और शैक्षणिक पहचान वाले क्षेत्र को भी लम्बे समय से बड़े औद्योगिक निवेश और उच्च शिक्षा संस्थानों से दूर रखा गया है, जिसके कारण वहां आर्थिक प्रगति थम गई है। कांग्रेस का सवाल है कि अगर केंद्र और राज्य की एक ही सरकार होते हुए भी क्षेत्रीय असमानता नहीं मिटाई जा सकी — तो फिर विकास मॉडल की सफलता कहाँ दर्ज की जाए?
कांग्रेस ने कहा कि सरकार जब भी चुनाव आता है, तो बिहार के सपनों और उम्मीदों का बाज़ार सज जाता है। बड़ी घोषणाएँ, विशेष पैकेज, उद्योग लगाने के वादे, स्मार्ट सिटी, मेडिकल कॉलेज, आईटी पार्क — हर चीज़ का इंद्रधनुष जनता के सामने पेश किया जाता है। लेकिन चुनाव बीतते ही इन सपनों का आसमान बिखर कर गिर जाता है, और जनता फिर अपने संघर्ष में अकेली रह जाती है। नीती आयोग की रिपोर्ट यही चेतावनी दे रही है कि बिहार में “विकास दिखाने की राजनीति” तो खूब हुई, लेकिन विकास पहुँचाने की राजनीति आज भी लापता है। आंकड़ों में साफ दिखाई देता है कि जहां बिहार में स्वास्थ्य ढांचा राष्ट्रीय औसत से कई गुना नीचे है, वहीं स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी और छात्रों का भविष्य अँधेरे में डूबा है। महिला और बच्चों की पोषण स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। कांग्रेस का कहना है कि यह सिर्फ संख्याओं का संकट नहीं — यह एक राज्य के सपनों की कुर्बानी है।
चुनाव के इस मौसम में कांग्रेस यह भी संदेश देना चाहती है कि यह लड़ाई केवल सत्ता बदलने की नहीं, बल्कि नीतियों को बदलने की है। पार्टी यह दावा कर रही है कि वह बिहार को विशेष दर्जा दिलाने, सीमांचल और भागलपुर में केंद्र-प्रेरित भारी निवेश में तेजी लाने और किसानों व युवाओं के लिए रोजगार आधारित योजनाओं को लागू करने के लिए ठोस रोडमैप के साथ मैदान में है। कांग्रेस का कहना है — “बिहार किसी का पिछलग्गू नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक रीढ़ बन सकता है, यदि उसे उसका हक दिया जाए।” वहीं NDA को वह “घोषणाओं और झूठ की मशीन” बताते हुए कह रही है कि बिहार की जनता अब इन नारों और छलावों को पहचान चुकी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव में इस बार पारंपरिक जातीय समीकरणों के साथ-साथ विकास और असमानता के मुद्दे बहुत तेज़ी से उभर रहे हैं। सीमांचल और भागलपुर — जहाँ काफी संख्या में मुस्लिम, पिछड़े और युवा मतदाता हैं — इस नैरेटिव के केंद्र में दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि इन इलाकों में उसकी आवाज़ सुनकर जनता परिवर्तन की दिशा चुनेगी। अब देखने की बात यह होगी कि क्या नीती आयोग जैसी अधिकारिक रिपोर्ट का असर मतदान पर पड़ेगा? क्या जनता विकास के वास्तविक पैमाने पर सरकार का मूल्यांकन करेगी या फिर एक बार फिर वादों के जाल में राजनीति जीत जाएगी?




