राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | हमीरपुर, उत्तर प्रदेश | 12 अगस्त 2026
सड़क के लिए बच्चों का बड़ा कदम
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में मंगलवार को उस समय प्रशासन के सामने एक अलग तरह की चुनौती खड़ी हो गई, जब स्कूल जाने वाले बच्चों ने अपने गांवों को जोड़ने वाली बदहाल सड़क को लेकर खुद मोर्चा संभाल लिया। चंदूपुर और आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे कई किलोमीटर पैदल चलकर जिला कलेक्टरेट पहुंचे और मुख्य गेट पर प्रदर्शन किया। बच्चों के हाथों में तिरंगा, पोस्टर और बैनर थे और उनकी मांग बेहद सीधी थी—उनके गांव से स्कूल तक जाने के लिए एक ऐसी सड़क हो जिस पर बारिश के दिनों में चलना मुश्किल न हो।
बारिश ने सड़क को बनाया कीचड़ का रास्ता
ग्रामीणों के मुताबिक करीब 1.5 किलोमीटर लंबी सड़क कई बस्तियों के लिए मुख्य संपर्क मार्ग है। बारिश के बाद यह रास्ता कीचड़ और दलदल में बदल गया है। हालात ऐसे हैं कि बच्चों को स्कूल जाने में परेशानी होती है और बीमार लोगों को अस्पताल तक ले जाना भी मुश्किल हो जाता है। इस सड़क से चंदूपुर के अलावा आसपास के कई डेरों और बस्तियों के लोग जुड़े हुए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की बदहाली कोई एक-दो दिन की समस्या नहीं है। बरसात आते ही रास्ते की स्थिति और खराब हो जाती है और इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों पर पड़ता है।
करीब 3,000 लोगों की आवाज बने बच्चे
बताया गया है कि चंदूपुर और आसपास की बस्तियों में करीब 3,000 लोग रहते हैं। ब्रह्मा का डेरा, बनवासी का डेरा, अठभइयां का डेरा, बच्ची का डेरा, भिखुआ का डेरा, गुसाईं बाबा का डेरा और गंगवा का डेरा जैसे इलाके इसी सड़क से जुड़े हैं।
ऐसे में बच्चों का यह प्रदर्शन केवल स्कूल आने-जाने की समस्या तक सीमित नहीं है। सड़क खराब होने का असर पूरे ग्रामीण जीवन पर पड़ता है। खेती, रोजमर्रा का आवागमन, बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाना और बच्चों की पढ़ाई—सब कुछ प्रभावित होता है।
प्रशासन ने रोकने की कोशिश की, बच्चे कलेक्टरेट पहुंच गए
मंगलवार सुबह बच्चों और ग्रामीणों का समूह कलेक्टरेट की ओर बढ़ा तो SDM सदर अभिषेक कुमार और CO यशपाल सिंह पुलिसकर्मियों के साथ मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को रोकने और समझाने का प्रयास किया, लेकिन बच्चे पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हुए।
आखिरकार वे कलेक्टरेट पहुंचे और मुख्य गेट पर बैठ गए। इससे कुछ समय के लिए अंदर मौजूद अधिकारियों और कर्मचारियों के बाहर निकलने का रास्ता भी प्रभावित हुआ। प्रशासन की कोशिश थी कि प्रदर्शन समाप्त हो, लेकिन बच्चों ने अपनी मांग पूरी होने तक आवाज उठाने का फैसला किया।
तिरंगा हाथ में, मांग सिर्फ सड़क की
इस प्रदर्शन की सबसे खास बात यह रही कि बच्चों के हाथों में राजनीतिक झंडों की जगह तिरंगा और अपनी बुनियादी जरूरतों से जुड़े पोस्टर दिखाई दिए। उनकी मांग किसी बड़े राजनीतिक वादे की नहीं थी। वे केवल अपने गांव से स्कूल तक बेहतर रास्ता चाहते थे।
यही तस्वीर इस प्रदर्शन को अलग बनाती है। जिन बच्चों की उम्र आमतौर पर स्कूल, किताबों और खेल के बीच गुजरनी चाहिए, वे अपने इलाके की बुनियादी सुविधा के लिए प्रशासन के दरवाजे तक पहुंच गए।
CJP ने बच्चों के प्रदर्शन को दिया समर्थन
Cockroach Janta Party (CJP) ने हमीरपुर के बच्चों के इस प्रदर्शन का समर्थन किया। CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने प्रदर्शन का वीडियो साझा होने के बाद “Well done” कहते हुए बच्चों की पहल की सराहना की।
CJP के संस्थापक अभिजीत डिपके ने भी बच्चों के प्रदर्शन का समर्थन किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर बच्चों के भविष्य और ग्रामीण सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के लिए बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए।
गांव के स्कूलों को बेहतर बनाने का अभियान
हमीरपुर की घटना ऐसे समय सामने आई है जब अभिजीत डिपके ने ग्रामीण सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने को लेकर अभियान शुरू करने की घोषणा की है। उनका कहना है कि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों के कई सरकारी स्कूल बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
इस अभियान के तहत गांवों के सरपंचों और अभिभावकों से अपने-अपने क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने की पहल करने की अपील की गई है। डिपके ने कहा है कि बच्चों को लंबी दूरी तय करके स्कूल जाना पड़ता है और कई जगह पीने के पानी तथा शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पर्याप्त नहीं हैं।
आंदोलन की राजनीति से आगे बढ़ता CJP
CJP की गतिविधियां पिछले कुछ समय में छात्र और युवा मुद्दों के आसपास तेजी से बढ़ी हैं। शुरुआत में ऑनलाइन व्यंग्यात्मक मंच के रूप में सामने आए इस समूह ने बाद में सड़क पर छात्र आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। NEET पेपर लीक और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में भी CJP से जुड़े लोग सक्रिय रहे थे।
अब संगठन का फोकस केवल बड़े राष्ट्रीय मुद्दों तक सीमित नहीं दिख रहा। हमीरपुर जैसे स्थानीय मामले को समर्थन देना इस बात का संकेत है कि वह ग्रामीण शिक्षा, स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं और स्थानीय समस्याओं को भी अपने अभियान का हिस्सा बनाना चाहता है।
बच्चों का सवाल प्रशासन के लिए आईना
हमीरपुर के बच्चों का प्रदर्शन प्रशासन के लिए एक असहज लेकिन जरूरी सवाल छोड़ गया है—अगर स्कूल जाने वाले बच्चों को अपनी सड़क के लिए कलेक्टरेट तक पैदल मार्च करना पड़े, तो विकास की प्राथमिकताओं पर सवाल क्यों न उठें?
सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं होती। ग्रामीण इलाके में सड़क का मतलब स्कूल तक पहुंच, अस्पताल तक पहुंच, रोजगार तक पहुंच और बाकी दुनिया से जुड़ने का रास्ता है। इसलिए बच्चों की मांग को केवल एक स्थानीय सड़क की शिकायत मानकर खत्म करना पर्याप्त नहीं होगा।
अब गेंद प्रशासन के पाले में
बच्चों ने अपनी बात प्रशासन तक पहुंचा दी है। अब असली परीक्षा प्रशासन की है। यदि सड़क वास्तव में लंबे समय से खराब है और हजारों लोगों के आवागमन का प्रमुख मार्ग है, तो संबंधित विभाग को मौके का निरीक्षण कर स्थिति का आकलन करना चाहिए और निर्माण या मरम्मत की स्पष्ट कार्ययोजना सामने रखनी चाहिए।
क्योंकि बच्चों ने जो सवाल उठाया है, उसका जवाब सिर्फ आश्वासन से नहीं, सड़क बनाकर दिया जाना चाहिए।
तिरंगे के साथ उठी एक सीधी मांग
हमीरपुर में बच्चों का यह प्रदर्शन भले ही छोटा स्थानीय आंदोलन हो, लेकिन इसकी तस्वीर बड़ी है। हाथ में तिरंगा लिए स्कूल के बच्चे अपने अधिकार और सुविधा की मांग लेकर सरकारी दफ्तर के दरवाजे पर पहुंचे हैं।
उन्हें राजनीति नहीं चाहिए, उन्हें स्कूल तक पहुंचने का रास्ता चाहिए। उन्हें भाषण नहीं चाहिए, उन्हें सड़क चाहिए। और शायद यही इस पूरे आंदोलन की सबसे मजबूत आवाज है।




