महाराष्ट्र | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई/नई दिल्ली | 6 नवंबर 2026
चुनाव में हार का सामना करने के बाद क्या सत्ता पक्ष अब नियमों का सहारा लेकर जनादेश का गणित बदलने की कोशिश कर रहा है? महाराष्ट्र की प्रतिष्ठित गोकुल डेयरी को लेकर उठा विवाद अब केवल एक सहकारी संस्था के बोर्ड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने सहकारिता की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक चुनाव और सरकार के हस्तक्षेप पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। कांग्रेस ने महाराष्ट्र सरकार के उस फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई है, जिसके तहत 500 करोड़ रुपये से अधिक सालाना कारोबार और सरकारी सहायता प्राप्त करने वाली सहकारी संस्थाओं के बोर्ड में पांच सरकारी मनोनीत सदस्य शामिल करने का प्रस्ताव मंजूर किया गया है। इनमें चार सदस्यों को मतदान का अधिकार देने की बात है।
कांग्रेस का आरोप है कि गोकुल डेयरी के चुनाव में मनमाफिक नतीजा नहीं मिलने के बाद सरकार ने ऐसा रास्ता चुना है, जिससे निर्वाचित प्रतिनिधियों की ताकत का संतुलन बदला जा सके। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इस फैसले को लोकतांत्रिक जनादेश के साथ छेड़छाड़ बताते हुए महाराष्ट्र सरकार को घेरा है।
राहुल गांधी का सवाल—जनादेश स्वीकार क्यों नहीं?
राहुल गांधी ने इस पूरे घटनाक्रम को जनादेश को प्रभावित करने की कोशिश से जोड़ते हुए सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि जहां बीजेपी चुनाव जीतती है, वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान किया जाता है, लेकिन जहां उसे हार मिलती है, वहां नियमों और संस्थागत व्यवस्थाओं के जरिए नतीजों को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है।
गोकुल डेयरी के चुनावी नतीजों के बाद सहकारी कानून में प्रस्तावित बदलाव को राहुल गांधी ने इसी राजनीतिक प्रवृत्ति से जोड़कर देखा है। उनका सवाल है कि यदि जनता और संस्था के सदस्यों ने अपने प्रतिनिधि चुन लिए हैं, तो सरकार को उनके अधिकारों और बोर्ड के शक्ति-संतुलन में दखल देने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
राहुल गांधी की आपत्ति का मूल सवाल साफ है—क्या चुनाव में हारने के बाद सत्ता का इस्तेमाल नियम बदलकर राजनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए किया जा सकता है?
पवन खेड़ा की चेतावनी—मामला सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने भी महाराष्ट्र सरकार के फैसले पर कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने इसे सहकारी संस्थाओं की लोकतांत्रिक व्यवस्था और सदस्यों के अधिकारों के लिए गंभीर चुनौती बताया है। कांग्रेस का कहना है कि यदि निर्वाचित बोर्ड के ऊपर सरकारी मनोनीत सदस्यों को मतदान का अधिकार देकर राजनीतिक समीकरण बदलने की कोशिश की जाती है, तो यह सहकारिता की मूल भावना के खिलाफ होगा।
पवन खेड़ा ने इस फैसले को कानूनी चुनौती देने और सुप्रीम कोर्ट तक जाने की बात कही है। कांग्रेस का तर्क है कि सहकारी संस्थाओं का संचालन उनके सदस्यों और निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से होना चाहिए, न कि सरकार की ओर से मनोनीत ऐसे सदस्यों के जरिए जिनका चयन संस्था के मतदाताओं ने नहीं किया है।
गोकुल चुनाव में क्या हुआ था?
कोल्हापुर जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ यानी गोकुल डेयरी के 19 अक्टूबर को हुए चुनाव में कांग्रेस समर्थित सतेज पाटिल के नेतृत्व वाले पैनल ने 25 में से 13 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया था। वहीं महायुति समर्थित पैनल को 12 सीटें मिली थीं। यानी चुनावी मुकाबला बेहद करीबी रहा, लेकिन नतीजा स्पष्ट था—कांग्रेस समर्थित पैनल को एक सीट की बढ़त मिली।
इसके बाद 29 अक्टूबर को अध्यक्ष के चुनाव के लिए बुलाई गई बैठक में महायुति समर्थित सभी 12 निदेशक अनुपस्थित रहे। बैठक के लिए 14 सदस्यों का कोरम जरूरी था। पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो सका।
इसके बाद कांग्रेस समर्थित पैनल ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 2 नवंबर को कोल्हापुर पीठ ने 10 नवंबर को नई बैठक बुलाने और सभी 25 निदेशकों को नोटिस देने का निर्देश दिया।
यहीं से विवाद ने नया मोड़ लिया। जिस समय गोकुल में निर्वाचित बोर्ड के गठन और अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ रही थी, उसी दौरान महाराष्ट्र सरकार ने सहकारी कानून में बदलाव का प्रस्ताव मंजूर कर दिया।
चार सरकारी सदस्यों को वोटिंग का अधिकार क्यों?
महाराष्ट्र मंत्रिमंडल ने 4 नवंबर को महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम, 1960 में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दी। इसके तहत 500 करोड़ रुपये से अधिक सालाना कारोबार और सरकारी सहायता प्राप्त करने वाली सहकारी संस्थाओं के बोर्ड में पांच सरकारी मनोनीत सदस्य शामिल किए जा सकेंगे। इनमें चार विशेषज्ञ सदस्यों को मतदान का अधिकार देने का प्रस्ताव है, जबकि पांचवें सदस्य के रूप में सहायक निबंधक से नीचे के पद का अधिकारी नहीं होगा और उसे मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा। ये मनोनीत सदस्य संस्था के पदाधिकारी पदों के चुनाव में भी हिस्सा नहीं ले सकेंगे।
सरकार का दावा है कि इस व्यवस्था से बड़ी सहकारी संस्थाओं में पेशेवर प्रबंधन, पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही बढ़ेगी। सरकार यह भी कह रही है कि बोर्ड में गतिरोध और प्रशासनिक अव्यवस्था रोकने के लिए विशेषज्ञों की भागीदारी जरूरी है।
लेकिन विपक्ष का सवाल है कि जब इन विशेषज्ञों को मतदान का अधिकार दिया जा रहा है, तो उनकी नियुक्ति का आधार क्या होगा और क्या इससे निर्वाचित निदेशकों की वास्तविक ताकत प्रभावित नहीं होगी?
गोकुल पर ही क्यों उठ रहे हैं सवाल?
गोकुल डेयरी महाराष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण सहकारी संस्थाओं में से एक है। वित्त वर्ष 2024-25 में इसका कारोबार लगभग 3,966 करोड़ रुपये बताया गया था। संस्था से करीब 4.41 लाख दुग्ध उत्पादक और 8,009 गांव स्तरीय दुग्ध समितियां जुड़ी हैं। ऐसे में इसके बोर्ड में होने वाला कोई भी बदलाव हजारों गांवों के किसानों और लाखों दुग्ध उत्पादकों के हितों से जुड़ा है।
विवाद का सबसे अहम पहलू यही है कि प्रस्तावित संशोधन का दायरा केवल गोकुल तक सीमित नहीं है, लेकिन इसके राजनीतिक प्रभाव की चर्चा गोकुल के चुनावी नतीजों के संदर्भ में हो रही है। विपक्ष का आरोप है कि कानून में बदलाव का समय और उसका संभावित असर कई सवाल खड़े करता है।
सहकारिता बनाम सरकारी नियंत्रण
सहकारी संस्थाओं की बुनियादी अवधारणा यह है कि उनके सदस्य अपने प्रतिनिधि चुनें और संस्था का संचालन लोकतांत्रिक तरीके से हो। सरकार वित्तीय सहायता, नियमन और जवाबदेही सुनिश्चित कर सकती है, लेकिन क्या उसे बोर्ड के भीतर मतदान की ताकत भी अपने मनोनीत सदस्यों के जरिए बदलने का अधिकार होना चाहिए? यही इस विवाद का केंद्रीय प्रश्न बन गया है।
यदि सरकार का उद्देश्य वास्तव में पारदर्शिता और पेशेवर प्रबंधन है, तो विपक्ष पूछ रहा है कि इसके लिए निर्वाचित बोर्ड में मतदान का अधिकार रखने वाले सरकारी सदस्यों को शामिल करना ही क्यों जरूरी है? क्या विशेषज्ञ सलाहकारों या गैर-मतदानकारी सदस्यों के जरिए यह उद्देश्य पूरा नहीं किया जा सकता?
महाराष्ट्र सरकार को देना होगा जवाब
गोकुल का विवाद अब महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़े टकराव का रूप ले चुका है। एक तरफ सरकार इसे सहकारी संस्थाओं के बेहतर प्रबंधन की दिशा में सुधार बता रही है, दूसरी तरफ कांग्रेस इसे चुनावी जनादेश के बाद नियमों के जरिए शक्ति-संतुलन बदलने की कोशिश मान रही है।
राहुल गांधी और पवन खेड़ा के आरोपों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब सरकार के सामने केवल संशोधन का बचाव करने की चुनौती नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट करने की जिम्मेदारी भी है कि लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधियों के ऊपर सरकारी मनोनीत सदस्यों को मतदान का अधिकार देने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी।
गोकुल के चुनाव में 13-12 का फैसला आ चुका है। सवाल यह है कि क्या इस फैसले को उसी रूप में स्वीकार किया जाएगा, या सहकारिता के नियमों में बदलाव के जरिए निर्वाचित बोर्ड के भीतर नई राजनीतिक गणित तैयार होगी?
इस पूरे विवाद का अंतिम जवाब कानून, न्यायिक समीक्षा और आने वाली बोर्ड बैठक से सामने आएगा। लेकिन एक बात साफ है—सहकारिता के नाम पर होने वाले किसी भी बदलाव की कसौटी सत्ता की सुविधा नहीं, बल्कि संस्था के सदस्यों का लोकतांत्रिक अधिकार होना चाहिए।



