अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 नवंबर 2026
अमेरिका में मध्यावधि चुनावों के नतीजों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के सामने गंभीर राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। डेमोक्रेटिक पार्टी के हाथों सीनेट और प्रतिनिधि सभा—दोनों का नियंत्रण गंवाने के बाद अब ट्रंप प्रशासन के भीतर ही हार के कारणों को लेकर बहस तेज हो गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने खुले तौर पर स्वीकार किया है कि ईरान के साथ युद्ध ने रिपब्लिकन पार्टी को भारी राजनीतिक नुकसान पहुंचाया। उन्होंने महंगाई, बढ़ती जीवन-यापन लागत और इजरायल के साथ अमेरिका के संबंधों को भी मतदाताओं की नाराजगी के प्रमुख कारणों में शामिल किया।
लेकिन इस स्वीकारोक्ति पर ईरान ने अमेरिका को घेरने का मौका नहीं छोड़ा। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने वेंस के बयान पर कटाक्ष करते हुए कहा कि अमेरिकी प्रशासन जंग के परिणामों की जिम्मेदारी लेने के बजाय हार के बाद भी अगले युद्ध की तैयारी में लगा है। गालिबाफ ने ट्रंप प्रशासन को निशाने पर लेते हुए लिखा कि उसका रवैया ऐसे जुआरी जैसा है, जो लगातार हारने के बावजूद दांव की मेज छोड़ने को तैयार नहीं।
इस बयान ने अमेरिका-ईरान टकराव को एक नया राजनीतिक आयाम दे दिया है। अब यह संघर्ष केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है। इसके आर्थिक परिणाम अमेरिकी जनता की जेब तक पहुंचे हैं और चुनावी नतीजों ने ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति को घरेलू राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है।
वेंस ने माना—युद्ध की कीमत चुका रही है रिपब्लिकन पार्टी
3 नवंबर को हुए मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने बड़ी बढ़त हासिल करते हुए कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण स्थापित किया। यह परिणाम ट्रंप के लिए इसलिए भी बड़ा झटका है क्योंकि 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में उनके साथ खड़े रहे कई मतदाताओं ने इस बार रिपब्लिकन उम्मीदवारों का साथ छोड़ दिया।
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने चुनावी हार की समीक्षा करते हुए कहा कि समस्या केवल मतदान प्रतिशत की नहीं थी। असली समस्या यह थी कि 2024 में ट्रंप और वेंस को समर्थन देने वाले मतदाताओं का एक हिस्सा इस बार डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर चला गया।
वेंस ने अपनी टिप्पणी में चार प्रमुख मुद्दे गिनाए—ईरान के साथ युद्ध समाप्त करना, महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत पर ध्यान देना, ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति की ओर लौटना और इजरायल के साथ अमेरिका के संबंधों की समीक्षा करना।
उन्होंने साफ कहा कि रिपब्लिकन पार्टी की हार की एक बड़ी वजह ईरान युद्ध था। वेंस ने यह भी सवाल उठाया कि क्या इस सैन्य कार्रवाई की राजनीतिक कीमत इतनी बड़ी थी कि उसके बदले पार्टी को अगले छह वर्षों के लिए सीनेट का नियंत्रण गंवाना पड़े?
उनकी टिप्पणी ट्रंप प्रशासन के लिए असहज करने वाली है, क्योंकि यह केवल विपक्ष की आलोचना नहीं, बल्कि सरकार के शीर्ष नेतृत्व के भीतर से उठी स्वीकारोक्ति है कि युद्ध ने घरेलू राजनीतिक समर्थन को कमजोर किया है।
गालिबाफ का तंज—हार के बाद भी युद्ध का जुनून खत्म नहीं
ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने वेंस के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी नेतृत्व की रणनीति पर सवाल उठाए। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि ट्रंप प्रशासन हारने वाले जुआरी की तरह व्यवहार कर रहा है, जो नुकसान के बावजूद दांव की मेज छोड़ने को तैयार नहीं।
गालिबाफ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि एक तरफ अमेरिका राजनीतिक और आर्थिक दबाव से जूझ रहा है, दूसरी तरफ उसका नेतृत्व युद्ध के अगले चरण की तैयारी कर रहा है। उन्होंने वेंस को सीधे निशाने पर लेते हुए सवाल किया कि यदि उपराष्ट्रपति वास्तव में इस नीति से असहमत हैं, तो उन्हें अपनी बात राष्ट्रपति ट्रंप के सामने रखनी चाहिए।
गालिबाफ का यह बयान केवल चुनावी हार पर टिप्पणी नहीं था। इसके जरिए ईरान यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि अमेरिका की सैन्य नीति ने उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अपने ही देश में राजनीतिक संकट के सामने खड़ा कर दिया है।
ईरानी अधिकारियों ने अमेरिकी चुनाव परिणामों को युद्ध के खिलाफ जनता के असंतोष के संकेत के रूप में पेश किया है। हालांकि, चुनावी नतीजों को केवल ईरान युद्ध का परिणाम मानना भी सही नहीं होगा। महंगाई, आर्थिक दबाव और घरेलू नीतियों को लेकर असंतोष जैसे कई मुद्दे मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य से अमेरिकी परिवारों की जेब तक पहुंची जंग
ईरान युद्ध का सबसे बड़ा आर्थिक असर ऊर्जा बाजार पर दिखाई दिया। अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान पर सैन्य हमले किए थे। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या किए जाने का दावा भी सामने आया। इसके जवाब में तेहरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और ऊर्जा उत्पादों की आपूर्ति इसी मार्ग से गुजरती है। यहां तनाव या आवाजाही में रुकावट का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर पड़ता है।
ईरान की जवाबी कार्रवाई और क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण कच्चे तेल तथा ईंधन की कीमतों में उछाल आया। इसका असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी पड़ा। पेट्रोल और ऊर्जा की बढ़ती कीमतों ने पहले से महंगाई से परेशान परिवारों की मुश्किलें बढ़ा दीं।
यही वह आर्थिक दबाव था, जिसने युद्ध को अमेरिकी मतदाताओं के लिए दूर देश में चल रहे सैन्य अभियान से निकालकर उनके रोजमर्रा के जीवन का मुद्दा बना दिया। जब ईंधन महंगा होता है तो उसका असर केवल वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। परिवहन, खाद्य पदार्थों, वस्तुओं की ढुलाई और अन्य सेवाओं की लागत भी प्रभावित होती है।
इस तरह ईरान के साथ युद्ध का असर अमेरिकी जनता की जेब तक पहुंचा और ट्रंप प्रशासन को घरेलू मोर्चे पर इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी।
ट्रंप ने स्वीकारा असर, लेकिन सैन्य कार्रवाई का बचाव जारी
चुनावी हार के बाद ट्रंप ने भी माना कि ईरान युद्ध ने रिपब्लिकन पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित किया। हालांकि उन्होंने सैन्य कार्रवाई के फैसले को गलत मानने से इनकार कर दिया।
व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान युद्ध चुनावी नुकसान के कारणों में शामिल हो सकता है, लेकिन उनके अनुसार ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
ट्रंप का तर्क है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती और इस खतरे को रोकने के लिए सैन्य कार्रवाई जरूरी थी। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने मतदाताओं को प्रभावित किया।
इस तरह राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के बयानों में एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। वेंस युद्ध की राजनीतिक कीमत और मतदाताओं की नाराजगी को स्वीकार कर रहे हैं, जबकि ट्रंप इस कीमत के बावजूद सैन्य कार्रवाई को रणनीतिक रूप से जरूरी बता रहे हैं।
ईरान की चेतावनी—अगला हमला हुआ तो युद्ध का दायरा बढ़ेगा
ईरान की ओर से केवल गालिबाफ ने ही प्रतिक्रिया नहीं दी। सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने भी अमेरिकी चुनावी नतीजों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वाशिंगटन में सत्ता किसी भी पार्टी के हाथ में हो, ईरान के प्रति अमेरिका की शत्रुता जारी रह सकती है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका ने दोबारा हमला किया तो युद्ध का दायरा और व्यापक हो सकता है। ईरान का संदेश साफ है कि वह सैन्य दबाव के आगे झुकने के लिए तैयार नहीं है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव पहले से गंभीर है। अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर इजरायल, लेबनान और यमन तक फैल चुका है। इजरायल ने हिज्बुल्लाह की गतिविधियों का हवाला देते हुए लेबनान में हमले किए, जबकि यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब में ऊर्जा प्रतिष्ठानों, हवाई अड्डों और अन्य ठिकानों को निशाना बनाया।
इससे स्पष्ट है कि ईरान और अमेरिका के बीच टकराव अब केवल दो देशों का सैन्य संघर्ष नहीं रह गया है। इसमें क्षेत्रीय शक्तियां और कई अलग-अलग मोर्चे शामिल हो चुके हैं।
क्या ट्रंप के लिए 2028 की राह भी मुश्किल होगी?
मध्यावधि चुनावों में मिली हार ने ट्रंप प्रशासन के सामने केवल तत्काल राजनीतिक संकट नहीं खड़ा किया है, बल्कि 2028 के राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी को लेकर भी सवाल बढ़ा दिए हैं। जेडी वेंस को ट्रंप के संभावित राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन अब युद्ध, महंगाई और इजरायल नीति पर उनकी टिप्पणियां उन्हें एक कठिन राजनीतिक स्थिति में खड़ा कर सकती हैं।
जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या वेंस 2028 में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ेंगे, तो उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा कि कई लोग चुनाव लड़ सकते हैं और यह भी संभव है कि वेंस चुनाव न लड़ें।
यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब रिपब्लिकन पार्टी को अपनी नीतियों और राजनीतिक रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है। पार्टी के सामने चुनौती है कि वह अपने पारंपरिक समर्थकों का भरोसा कैसे वापस हासिल करे और युद्ध तथा महंगाई से नाराज मतदाताओं को किस तरह फिर अपने साथ जोड़े।
अमेरिका के लिए सबसे बड़ा सवाल: युद्ध की कीमत कौन चुकाएगा?
ईरान युद्ध ने ट्रंप प्रशासन के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है—क्या विदेश नीति में सैन्य ताकत का प्रदर्शन घरेलू अर्थव्यवस्था और जनता के हितों से ऊपर रखा जा सकता है? क्या किसी दूसरे देश में युद्ध का फैसला लेते समय अमेरिकी परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को नजरअंदाज किया जा सकता है?
वेंस की स्वीकारोक्ति बताती है कि रिपब्लिकन नेतृत्व के भीतर भी इस सवाल को लेकर बेचैनी है। गालिबाफ का तंज इसी राजनीतिक कमजोरी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उभारने की कोशिश है। वहीं ट्रंप अब भी अपनी सैन्य नीति को सही ठहराते हुए पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहे।
अमेरिकी चुनाव का संदेश केवल इतना नहीं है कि डेमोक्रेटिक पार्टी को जीत मिली और रिपब्लिकन पार्टी को हार। इसका बड़ा संदेश यह है कि युद्ध का असर अंततः जनता की जिंदगी, अर्थव्यवस्था और मतपेटी तक पहुंचता है। सत्ता में बैठी सरकारें सैन्य सफलता के दावे कर सकती हैं, लेकिन जब ईंधन महंगा हो, जीवन-यापन कठिन हो और युद्ध का अंत दिखाई न दे, तो मतदाता अपना फैसला सुना सकते हैं।
ईरान ने इसी राजनीतिक संदेश को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ट्रंप प्रशासन चुनावी झटके से सबक लेकर तनाव कम करने की दिशा में आगे बढ़ेगा या फिर युद्ध के अगले चरण की तैयारी अमेरिका और पूरे पश्चिम एशिया को एक और बड़े संकट की ओर धकेलेगी।



