राजनीति/ राजस्थान | ABC NATIONAL NEWS | जयपुर | 1 सितंबर 2026
जयपुर के आगामी नगर निगम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पिछली दो बड़ी चुनावी रणनीतियों से अलग रुख अपनाते हुए मुस्लिम समुदाय के 8 उम्मीदवारों को टिकट दिया है। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारे थे, लेकिन अब जयपुर के निकाय चुनाव में आठ मुस्लिम चेहरों को प्रत्याशी बनाकर भाजपा ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दिया है। पार्टी ने सोमवार को जयपुर के लिए कुल 146 उम्मीदवारों की सूची जारी की, जिसमें इन आठ उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं। इस बदलाव ने जयपुर की स्थानीय राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है कि आखिर दो चुनावों तक मुस्लिम उम्मीदवारों से दूरी बनाने के बाद भाजपा ने नगर निगम चुनाव में यह रणनीतिक बदलाव क्यों किया।
भाजपा के लिए यह बदलाव इसलिए भी खास है क्योंकि जयपुर के पिछले नगर निकाय चुनाव नवंबर 2020 में पार्टी ने मुस्लिम समुदाय से केवल एक उम्मीदवार, शबाब जहां, को टिकट दिया था। शबाब जहां चुनाव जीत नहीं सकीं, लेकिन इस बार पार्टी ने उन्हें फिर मौका देते हुए वार्ड 117 से दोबारा उम्मीदवार बनाया है। यानी भाजपा ने न केवल मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाया है, बल्कि अपने पिछले मुस्लिम प्रत्याशी पर भी फिर से भरोसा जताया है। 2020 में एक मुस्लिम उम्मीदवार से इस बार आठ उम्मीदवारों तक पहुंचना संख्या के लिहाज से भी उल्लेखनीय बदलाव है।
यह फैसला उस राजनीतिक तस्वीर से बिल्कुल अलग दिखाई देता है जो 2023 और 2024 के चुनावों में सामने आई थी। 2023 के राजस्थान विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने किसी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया था। लेकिन नगर निगम चुनाव का राजनीतिक गणित विधानसभा या लोकसभा चुनाव से अलग होता है। स्थानीय चुनावों में प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, वार्ड स्तर का सामाजिक समीकरण, स्थानीय संगठन से जुड़ाव और मतदाताओं के बीच उसकी स्वीकार्यता अक्सर पार्टी के व्यापक राजनीतिक समीकरणों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।
जयपुर जैसे शहर में यह बदलाव और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां अलग-अलग समुदायों और सामाजिक समूहों की बड़ी आबादी रहती है। नगर निगम चुनाव में हर वार्ड का अपना अलग राजनीतिक और सामाजिक समीकरण होता है। ऐसे में भाजपा द्वारा आठ मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारना इस बात का संकेत माना जा सकता है कि पार्टी स्थानीय स्तर पर अपने सामाजिक आधार को व्यापक बनाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, इन उम्मीदवारों की जीत और उनका प्रदर्शन चुनाव परिणाम आने के बाद ही इस रणनीति की वास्तविक सफलता को स्पष्ट करेगा।
सबसे अधिक ध्यान शबाब जहां की दोबारा उम्मीदवारी पर है। 2020 में भाजपा ने उन्हें मुस्लिम समुदाय से अपना एकमात्र उम्मीदवार बनाया था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद पार्टी ने इस बार वार्ड 117 से फिर उन पर विश्वास जताया है। यह फैसला इस मायने में महत्वपूर्ण है कि पार्टी ने पिछली हार के बावजूद उनके स्थानीय राजनीतिक आधार और संभावित चुनावी उपयोगिता को पूरी तरह खारिज नहीं किया।
भाजपा की ओर से जारी 146 उम्मीदवारों की सूची के बाद अब चुनावी मुकाबला और दिलचस्प होने की संभावना है। दूसरी प्रमुख पार्टी कांग्रेस ने सोमवार देर शाम तक जयपुर के लिए अपनी उम्मीदवार सूची जारी नहीं की थी। ऐसे में अभी यह तस्वीर साफ नहीं है कि कांग्रेस कितने मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारेगी और भाजपा के इस कदम का मुकाबला किस सामाजिक और राजनीतिक रणनीति से करेगी।
जयपुर के स्थानीय चुनाव में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने का मुद्दा केवल संख्या का मामला नहीं है। इसके पीछे वार्ड-दर-वार्ड चुनावी गणित छिपा है। किसी प्रत्याशी की जातीय, सामाजिक और सामुदायिक पहचान के साथ-साथ उसकी स्थानीय लोकप्रियता, संगठनात्मक सक्रियता और व्यक्तिगत संपर्क चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए भाजपा के आठ मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने को सीधे तौर पर किसी बड़े वैचारिक बदलाव के रूप में घोषित करना जल्दबाजी होगी। फिलहाल इसे जयपुर के स्थानीय चुनावी समीकरण के संदर्भ में लिया गया राजनीतिक फैसला कहना अधिक उचित होगा।
इस फैसले का एक और पहलू पार्टी के व्यापक राजनीतिक संदेश से जुड़ता है। भाजपा लंबे समय से अपने संगठन और चुनावी आधार को विभिन्न सामाजिक वर्गों तक पहुंचाने की कोशिश करती रही है। स्थानीय निकाय चुनाव में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देना उस प्रयास का एक हिस्सा हो सकता है। हालांकि, यह भी देखना होगा कि उम्मीदवारों को केवल टिकट देने से आगे पार्टी उनके लिए किस स्तर पर संगठनात्मक समर्थन और चुनावी अभियान तैयार करती है।
कुल मिलाकर जयपुर नगर निगम चुनाव में भाजपा का एक मुस्लिम उम्मीदवार से आठ मुस्लिम उम्मीदवारों तक पहुंचना निश्चित रूप से राजनीतिक रूप से ध्यान खींचने वाला बदलाव है। 2020 में शबाब जहां के बाद अब पार्टी ने मुस्लिम प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ाया है, जबकि 2023 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनावों में पार्टी ने मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारे थे। अब सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ जयपुर के स्थानीय चुनाव का रणनीतिक प्रयोग है या भाजपा की मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर चुनावी रणनीति में किसी व्यापक बदलाव की शुरुआत—इसका जवाब चुनाव प्रचार और नतीजों के बाद ही पूरी तरह सामने आएगा।




