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EVM पर सवालों के बीच ‘टोटलाइजर’ की एंट्री: क्या इससे बूथवार वोटिंग का राज छिप सकेगा?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 सितंबर 2026

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

चुनाव में इस्तेमाल होने वाली EVM को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ‘टोटलाइजर’ मशीनों के इस्तेमाल पर केंद्र सरकार का रुख पूछा है। टोटलाइजर ऐसी तकनीक है, जो एक साथ कई मतदान केंद्रों की EVM के वोटों को जोड़कर उम्मीदवारों का संयुक्त परिणाम देती है। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि किसी एक बूथ पर किस उम्मीदवार को कितने वोट मिले, इसका अलग-अलग आंकड़ा सामने न आए और केवल कई बूथों का मिला-जुला परिणाम दिखाई दे।

एक मशीन में 14 बूथों का वोट जुड़ सकता है

टोटलाइजर के जरिए 14 मतदान केंद्रों की EVM Control Units को एक साथ जोड़कर वोटों की गिनती की जा सकती है। इससे प्रत्येक उम्मीदवार को मिले वोटों का एक संयुक्त आंकड़ा सामने आएगा, लेकिन किसी एक बूथ का अलग परिणाम सार्वजनिक नहीं होगा। इसके समर्थकों का कहना है कि इससे मतदाता की गोपनीयता और उसकी पसंद की सुरक्षा मजबूत हो सकती है।

याचिका में मतदाता की सुरक्षा का मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका के जरिए पहुंचा है। उनका तर्क है कि बूथवार मतदान का आंकड़ा सामने आने से यह पता लगाया जा सकता है कि किसी इलाके या बूथ पर किस उम्मीदवार या दल को कितना समर्थन मिला। ऐसी स्थिति में कुछ मतदाताओं को राजनीतिक या सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है। टोटलाइजर के जरिए बूथवार आंकड़ा छिपाकर मतदाता की निजता को बेहतर तरीके से सुरक्षित किया जा सकता है।

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चुनाव आयोग ने जताई अपनी चिंता

हालांकि चुनाव आयोग ने टोटलाइजर को लेकर कुछ चिंताएं भी सामने रखी हैं। आयोग का कहना है कि ऐसे समय में, जब EVM को लेकर पहले से ही सार्वजनिक स्तर पर लगातार सवाल उठाए जाते हैं, टोटलाइजर को चुनाव प्रक्रिया में लाना शायद सही कदम न हो। आयोग की चिंता यह है कि नई तकनीक जोड़ने से मतदान और मतगणना की प्रक्रिया को लेकर आम लोगों के बीच भ्रम और संदेह और बढ़ सकता है।

EVM पर भरोसा बनाना सबसे बड़ी चुनौती

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू तकनीक से ज्यादा जनता का चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा है। लोकतंत्र में सिर्फ यह जरूरी नहीं कि मतदान और मतगणना निष्पक्ष हो, बल्कि आम मतदाता को भी यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी वोटिंग सुरक्षित, गोपनीय और पारदर्शी है। अगर किसी तकनीक से मतदाता की पहचान या उसकी राजनीतिक पसंद का अनुमान लगाने की संभावना कम होती है, तो उसके फायदे पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। लेकिन साथ ही नई व्यवस्था को इस तरह लागू करना जरूरी है कि पारदर्शिता और भरोसा कमजोर न हो।

टोटलाइजर से क्या बदलेगा?

मान लीजिए किसी मतदान केंद्र पर किसी पार्टी को 800 और दूसरी पार्टी को 200 वोट मिले। सामान्य बूथवार परिणाम में यह आंकड़ा साफ दिखाई देगा। लेकिन यदि कई बूथों को टोटलाइजर से जोड़ दिया जाए तो अलग-अलग बूथ का आंकड़ा छिप जाएगा और सभी जुड़े बूथों का संयुक्त परिणाम सामने आएगा। इससे यह पता लगाना मुश्किल होगा कि किस खास बूथ के मतदाताओं ने किस उम्मीदवार को कितना समर्थन दिया। यही वजह है कि इसके समर्थक इसे मतदाता की गोपनीयता के लिए उपयोगी मानते हैं।

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लेकिन पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी

दूसरी तरफ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि बूथवार परिणाम लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता का एक हिस्सा हैं। इसलिए अगर टोटलाइजर लागू किया जाता है तो यह सुनिश्चित करना होगा कि राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और मतगणना एजेंटों को प्रक्रिया की पर्याप्त जानकारी मिले और परिणामों की स्वतंत्र रूप से जांच की व्यवस्था बनी रहे। मतदाता की निजता और चुनावी पारदर्शिता—दोनों के बीच संतुलन बनाना सबसे जरूरी होगा।

अब केंद्र के जवाब पर नजर

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केवल केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि टोटलाइजर के इस्तेमाल का आदेश दे दिया गया है। आगे केंद्र का पक्ष, चुनाव आयोग की चिंताएं और याचिका में उठाए गए मतदाता की निजता से जुड़े सवाल सुनने के बाद अदालत इस मामले पर आगे निर्णय लेगी। फिलहाल यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा संबंध मतदाता की गोपनीयता, EVM पर भरोसे और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता—तीनों से है।

बड़ा सवाल: वोट किसे दिया, यह राज क्यों न रहे?

लोकतंत्र में मतदाता को अपनी पसंद बताने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। वह किसे वोट देता है, यह उसकी व्यक्तिगत पसंद और लोकतांत्रिक अधिकार है। इसलिए अगर बूथवार आंकड़ों से किसी मतदाता की राजनीतिक पसंद का अनुमान लगाने या उसके साथ भेदभाव करने की संभावना पैदा होती है, तो उस पर विचार होना चाहिए। लेकिन साथ ही ऐसी कोई व्यवस्था भी नहीं होनी चाहिए जिससे चुनाव परिणाम की विश्वसनीयता पर नए सवाल खड़े हों। सुप्रीम कोर्ट के सामने असली चुनौती यही है—मतदाता का वोट भी गोपनीय रहे और चुनाव का परिणाम भी पूरी तरह भरोसेमंद और पारदर्शी दिखाई दे।

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