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CJP का 5 सितंबर मार्च अचानक वापस: क्या BRICS सम्मेलन से पहले ही सरकार डर गई थी?

ओपिनियन/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 सितंबर 2026

दिल्ली में 5 सितंबर को होने वाला कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक प्रस्तावित मार्च अचानक वापस ले लिया गया है। CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि केंद्र सरकार की ओर से अदालत में दिए गए सकारात्मक आश्वासन और अदालत के आदेश के बाद संगठन ने मार्च वापस लेने का फैसला किया है। पहली नजर में यह सरकार और आंदोलनकारी संगठन के बीच बातचीत से निकला एक शांतिपूर्ण रास्ता दिखाई देता है, लेकिन इस फैसले का समय कई सवाल जरूर खड़े करता है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस मार्च की घोषणा 24 अगस्त को की गई थी और जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सीधे रोक लगाने से इनकार कर दिया था, उसे अगले ही दिन वापस ले लिया गया? क्या सरकार ने कोई ऐसा आश्वासन दिया जिसे CJP ने अपनी मांगों के लिहाज से पर्याप्त माना, या फिर इसके पीछे दिल्ली में होने वाले एक बेहद महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आयोजन की चिंता भी थी?

सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि सामने BRICS है

CJP का मार्च 5 सितंबर को होना था, जबकि नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को BRICS शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। यानी दोनों घटनाओं के बीच महज सात दिन का अंतर है। BRICS भारत के लिए कोई सामान्य अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम नहीं है। दुनिया के कई महत्वपूर्ण देशों के नेता और प्रतिनिधिमंडल राजधानी में जुटने वाले हैं और इस दौरान दिल्ली की सुरक्षा, व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय छवि पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार चाहती थी कि BRICS सम्मेलन से पहले राजधानी में किसी भी बड़े आंदोलन, प्रदर्शन या टकराव की स्थिति न बने। क्या सरकार को आशंका थी कि इंडिया गेट जैसे बेहद महत्वपूर्ण स्थान से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक होने वाले मार्च की तस्वीरें और वीडियो अंतरराष्ट्रीय मीडिया में पहुंच सकते हैं और BRICS में आने वाले विदेशी प्रतिनिधियों के सामने दिल्ली में कानून-व्यवस्था को लेकर अनावश्यक चर्चा शुरू हो सकती है? यह कहना अभी संभव नहीं है कि मार्च वापस कराने के पीछे BRICS ही कारण था, क्योंकि सरकार ने ऐसा कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन घटनाक्रम का समय इस सवाल को जरूर जन्म देता है।

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सबसे दिलचस्प बात: सुप्रीम कोर्ट ने मार्च रोका ही नहीं था

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को CJP के प्रस्तावित मार्च पर कोई रोक नहीं लगाई थी। अदालत ने कानून-व्यवस्था से जुड़े इंतजामों का फैसला केंद्र और दिल्ली सरकार पर छोड़ते हुए सभी पक्षों से शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से आगे बढ़ने की अपेक्षा जताई थी। इसका सीधा मतलब यह था कि केवल अदालत के आदेश के कारण CJP को अपना मार्च रद्द करने की मजबूरी नहीं थी। फिर मंगलवार को अचानक संगठन ने अपना फैसला बदल दिया। CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने अदालत में कहा कि केंद्र सरकार के सकारात्मक आश्वासन और अदालत के आदेश के बाद संगठन मार्च वापस ले रहा है। यहीं से पूरा मामला और दिलचस्प हो जाता है। अगर सरकार के आश्वासन इतने प्रभावी थे कि आंदोलन वापस लेना पड़ा, तो सवाल यह है कि ये आश्वासन पहले क्यों नहीं दिए गए? क्या 24 अगस्त से 1 सितंबर के बीच सरकार और CJP के बीच बातचीत का कोई ऐसा दौर चला, जिसके बाद समाधान सामने आया? और क्या सरकार ने महसूस किया कि इस समय किसी भी बड़े आंदोलन को टालना उसके व्यापक हित में होगा?

क्या सरकार पहले से ही दबाव में थी?

इसे सीधे तौर पर यह कहना सही नहीं होगा कि सरकार डर गई थी। लेकिन लोकतंत्र में सरकार के फैसलों का राजनीतिक और परिस्थितिजन्य विश्लेषण करना पूरी तरह जायज है। एक तरफ CJP का घोषित मार्च था, दूसरी तरफ उसके कुछ ही दिनों बाद दिल्ली में होने वाला अंतरराष्ट्रीय BRICS सम्मेलन। बीच में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई हुई और उसके तुरंत बाद केंद्र के आश्वासन के आधार पर आंदोलन वापस हो गया। इन घटनाओं को एक साथ रखकर देखने पर यह सवाल जरूर उठता है कि क्या सरकार किसी संभावित अप्रिय स्थिति को पहले ही टाल देना चाहती थी? क्या उसे लगा कि BRICS जैसे महत्वपूर्ण आयोजन से ठीक पहले राजधानी में किसी आंदोलन को लेकर विवाद पैदा करना भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि के लिए अच्छा नहीं होगा? क्या सरकार ने यह सोचा कि आंदोलन को रोकने या प्रतिबंधित करने के बजाय अदालत में आश्वासन देकर रास्ता निकालना ज्यादा बेहतर और कम विवादित होगा? इन सवालों के जवाब अभी सरकार को देने हैं।

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आंदोलन वापस हुआ है, मुद्दे खत्म नहीं हुए

CJP ने 5 सितंबर का मार्च वापस जरूर ले लिया है, लेकिन इसके पीछे जिन मुद्दों को लेकर संगठन आंदोलन करना चाहता था, उनका क्या होगा, यह अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। संगठन ने 24 अगस्त को आरोप लगाया था कि सरकार ने 25 जुलाई को किए गए अपने commitments को पूरा नहीं किया। अब केंद्र ने अदालत में आश्वासन दिया है, इसलिए गेंद पूरी तरह सरकार के पाले में है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत में दिए गए आश्वासन कितनी तेजी से जमीन पर लागू होते हैं। अगर सरकार अपने वादों को पूरा करती है और CJP की शिकायतों का समाधान होता है, तो इस पूरे घटनाक्रम को बातचीत और लोकतांत्रिक समाधान की सफलता माना जाएगा। लेकिन अगर आश्वासन केवल तत्काल संकट टालने तक सीमित रहे और बाद में पुराने सवाल फिर सामने आ गए, तो CJP के मार्च वापस लेने का फैसला नए विवाद को जन्म दे सकता है।

BRICS से पहले दिल्ली शांत, लेकिन सवाल बाकी

फिलहाल एक बड़ा आंदोलन टल गया है और दिल्ली को कुछ राहत मिली है। BRICS सम्मेलन से पहले राजधानी में किसी बड़े प्रदर्शन की संभावना भी खत्म हो गई है। लेकिन लोकतंत्र में केवल सड़कों को शांत कर देना पर्याप्त नहीं होता; उन सवालों को भी शांत करना पड़ता है जिनकी वजह से लोग सड़क पर उतरना चाहते हैं। इसलिए आने वाले दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं। सरकार को यह साबित करना होगा कि उसने अदालत में जो आश्वासन दिए हैं, वे सिर्फ 5 सितंबर के मार्च को टालने के लिए नहीं बल्कि समस्या के स्थायी समाधान के लिए हैं। दूसरी ओर CJP को भी यह स्पष्ट करना होगा कि वह सरकार के आश्वासनों की निगरानी किस तरह करेगा और जरूरत पड़ने पर आगे क्या कदम उठाएगा।

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क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 5 सितंबर का मार्च क्यों रद्द हुआ। असली सवाल यह है कि क्या सरकार ने समस्या का समाधान किया है या सिर्फ BRICS सम्मेलन से पहले दिल्ली की सड़कों को शांत किया है?

BRICS से पहले दिल्ली शांत जरूर हो गई है—लेकिन क्या सरकार ने उन सवालों का जवाब भी दे दिया है, जिनके लिए CJP इंडिया गेट से पुलिस मुख्यालय तक जाने वाला था?

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