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कर्नाटक में बीजेपी को 15 दिन, तमिलनाडु में TVK को इंतजार! विपक्ष ने उठाए “भाजपाई राज्यपालों” के ‘डबल स्टैंडर्ड’ पर सवाल

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 मई 2026

तमिलनाडु में सरकार गठन को लेकर जारी सियासी घमासान अब राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनता जा रहा है। सोशल मीडिया पर कर्नाटक 2018 और तमिलनाडु 2026 की राजनीतिक परिस्थितियों की तुलना करते हुए बीजेपी और राज्यपाल की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए जा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि जब बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होती है तो संवैधानिक नियम बदल जाते हैं, लेकिन जब कोई गैर-बीजेपी दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरता है, तब राजभवन का रवैया पूरी तरह बदल जाता है।

सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट में कर्नाटक के 2018 विधानसभा चुनाव का उदाहरण दिया जा रहा है। उस समय बीजेपी 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, जबकि कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया था। इसके बावजूद तत्कालीन राज्यपाल वजुभाई वाला ने बीएस येदियुरप्पा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया और बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय भी दे दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद फ्लोर टेस्ट जल्द कराने का आदेश हुआ और येदियुरप्पा ने विश्वास मत से पहले इस्तीफा दे दिया।

अब तमिलनाडु की स्थिति को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है। TVK प्रमुख Thalapathy Vijay की पार्टी 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है। कांग्रेस ने भी समर्थन पत्र दिया है, लेकिन इसके बावजूद अभी तक सरकार गठन का निमंत्रण नहीं मिला है। राज्यपाल की ओर से 118 विधायकों के हस्ताक्षर वाले समर्थन पत्र की मांग को लेकर विवाद और बढ़ गया है।

कांग्रेस नेता और वरिष्ठ वकील Gurdeep Singh Sappal ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राज्यपाल अल्पमत सरकार की संवैधानिक व्यवस्था को ही नकार रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि देश में पी.वी. नरसिम्हा राव समेत कई अल्पमत सरकारें चल चुकी हैं। उनका कहना है कि किसी भी विधायक के पास समर्थन, विरोध या मतदान से दूर रहने का संवैधानिक अधिकार होता है और बहुमत का फैसला सदन के फ्लोर टेस्ट में होना चाहिए, न कि राजभवन के अंदर।

इसी बीच कांग्रेस सांसद Rahul Gandhi ने भी चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं को लेकर बीजेपी पर बड़ा हमला बोला है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि “वोट चोरी” के जरिए कभी सीटें तो कभी पूरी सरकारें कब्जाई जा रही हैं। विपक्ष अब इसे सिर्फ तमिलनाडु का मुद्दा नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता का सवाल बताने लगा है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे पोस्ट में सवाल पूछा जा रहा है कि “जब बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होती है तो फ्लोर टेस्ट लोकतंत्र का सबसे बड़ा हथियार बन जाता है, लेकिन जब बीजेपी नहीं होती तो राजभवन ही नया फ्लोर बन जाता है?” विपक्षी नेताओं का दावा है कि संविधान, सरकारिया आयोग और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों की व्याख्या भी अब राजनीतिक सुविधा के हिसाब से की जा रही है।

तमिलनाडु में TVK समर्थकों के बीच भी गुस्सा बढ़ता दिखाई दे रहा है। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि जनता ने स्पष्ट जनादेश देकर TVK को सबसे बड़ी पार्टी बनाया है, इसलिए सरकार बनाने का पहला मौका मिलना चाहिए। वहीं बीजेपी और उसके समर्थकों का कहना है कि स्थिर सरकार के लिए स्पष्ट बहुमत जरूरी है और राज्यपाल संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही काम कर रहे हैं।

फिलहाल तमिलनाडु का सियासी संकट अब केवल सरकार गठन तक सीमित नहीं रह गया है। यह बहस अब संविधान, राज्यपाल की भूमिका और लोकतांत्रिक परंपराओं की निष्पक्षता तक पहुंच चुकी है। विपक्ष इसे “लोकतंत्र बनाम सत्ता” की लड़ाई बताकर राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में जुट गया है।

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