राष्ट्रीय / पश्चिम बंगाल | अरिंदम बनर्जी ABC NATIONAL NEWS | 11 मई 2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अब विपक्षी दलों से भी बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता की अपील करने वाली ममता बनर्जी के प्रस्ताव को कांग्रेस और वाम दलों ने खुलकर खारिज कर दिया है। इससे बंगाल की राजनीति में नया सियासी घमासान शुरू हो गया है।
दरअसल बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी ने शनिवार को वीडियो संदेश जारी कर भाजपा के खिलाफ सभी विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों से एकजुट होने की अपील की थी। उन्होंने कांग्रेस, वाम दलों और यहां तक कि अति-वामपंथी संगठनों को भी साझा मंच पर आने का न्योता दिया था। ममता ने कहा था कि भाजपा को रोकने के लिए “सभी विरोधी ताकतों” को एक साथ आना होगा।
लेकिन ममता की इस अपील पर सबसे पहले कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी। पश्चिम बंगाल कांग्रेस प्रवक्ता सौम्य आइच राय ने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर “अति-वामपंथी” से ममता बनर्जी का क्या मतलब है। उन्होंने माओवादियों का जिक्र करते हुए कहा कि जिन संगठनों पर कांग्रेस नेताओं की हत्या के आरोप लगे, उनके साथ मंच साझा करने की बात चौंकाने वाली है।
इसके बाद वाम दलों ने भी ममता बनर्जी के प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया। सीपीआई (एम) नेताओं ने साफ कहा कि वे किसी ऐसी पार्टी के साथ नहीं जाएंगे जिस पर भ्रष्टाचार, जबरन वसूली और राजनीतिक हिंसा के आरोप लगते रहे हों। वाम नेताओं का कहना है कि बंगाल में टीएमसी शासन के दौरान उनके कार्यकर्ताओं पर हमले हुए और जमीनी स्तर पर संघर्ष की लंबी पृष्ठभूमि रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह स्थिति ममता बनर्जी की बदलती राजनीतिक मजबूरी को दिखाती है। कभी कांग्रेस और वाम दलों के खिलाफ आक्रामक राजनीति करके सत्ता तक पहुंचने वाली ममता अब उन्हीं दलों से सहयोग मांगने को मजबूर दिखाई दे रही हैं। पिछले डेढ़ दशक में बंगाल की राजनीति पूरी तरह टीएमसी बनाम बीजेपी के इर्द-गिर्द घूमती रही, लेकिन हालिया चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत ने राज्य का राजनीतिक समीकरण बदल दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बंगाल में भाजपा के उभार ने विपक्षी राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। ममता बनर्जी अब भाजपा के खिलाफ व्यापक मोर्चा बनाना चाहती हैं, लेकिन कांग्रेस और वाम दलों के साथ उनका पुराना टकराव इस रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बनता दिख रहा है।
वहीं कांग्रेस और लेफ्ट के इस रुख से यह भी संकेत मिला है कि विपक्षी एकता की राष्ट्रीय राजनीति में अभी भी भारी अविश्वास बना हुआ है। बंगाल में वाम दलों और टीएमसी के बीच लंबे समय तक हिंसक राजनीतिक संघर्ष रहा है, जिसकी यादें अभी भी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच मौजूद हैं। ऐसे में जमीनी स्तर पर दोनों के साथ आने की संभावना फिलहाल बेहद कमजोर मानी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी अब अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की रणनीति बना रही हैं। लेकिन कांग्रेस और वाम दलों के इनकार ने साफ कर दिया है कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता का रास्ता अभी आसान नहीं दिख रहा।




