राष्ट्रीय | अमरनाथ प्रसाद | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 13 मई 2026
महाराष्ट्र समेत देश के कई हिस्सों में पड़ रही भीषण गर्मी ने आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है, लेकिन सबसे कठिन हालात उन लाखों गिग वर्कर्स के सामने हैं जो रोज़ाना सड़कों पर काम करने को मजबूर हैं। फूड डिलीवरी एजेंट, बाइक टैक्सी चालक, ई-कॉमर्स डिलीवरी बॉय और ऐप आधारित सेवाओं से जुड़े कर्मचारी 42 से 45 डिग्री तापमान में घंटों काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि “एल्गोरिदम और ऐप सिस्टम हमारा दर्द नहीं समझ सकते।”
मुंबई, पुणे, नागपुर और नासिक जैसे शहरों में दोपहर के समय सड़कें तप रही हैं। गर्म हवाओं और उमस के बीच गिग वर्कर्स लगातार ऑर्डर पूरे करने के दबाव में काम कर रहे हैं। कई कर्मचारियों ने बताया कि अगर वे कुछ देर के लिए भी ऑफलाइन होते हैं या डिलीवरी में देरी होती है तो ऐप उनका इंसेंटिव घटा देता है और रेटिंग खराब हो जाती है। यही कारण है कि खराब स्वास्थ्य और तेज गर्मी के बावजूद उन्हें लगातार काम करना पड़ता है।
एक डिलीवरी एजेंट ने कहा, “मोबाइल ऐप को सिर्फ समय पर डिलीवरी चाहिए। उसे फर्क नहीं पड़ता कि बाहर कितनी गर्मी है या हम किस हालत में हैं।” कई गिग वर्कर्स का कहना है कि कंपनियों के एल्गोरिदम इंसानों की शारीरिक सीमाओं को नहीं समझते। उन्हें लगातार नए ऑर्डर मिलते रहते हैं और समय सीमा पूरी करने का दबाव बना रहता है।
हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब गिग वर्कर्स की समस्याएं राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनी हों। करीब दो महीने पहले देश के कई शहरों में गिग वर्कर्स ने बड़े स्तर पर हड़ताल और विरोध प्रदर्शन किए थे। उस दौरान डिलीवरी समय को लेकर कर्मचारियों में भारी नाराजगी थी। खासकर “10 मिनट डिलीवरी मॉडल” को लेकर यह आरोप लगाए गए कि इससे कर्मचारियों पर असुरक्षित तरीके से तेज गति में वाहन चलाने और लगातार दबाव में काम करने की मजबूरी बढ़ रही है।
विरोध के बाद कई कंपनियों को अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ा। “10 मिनट में सामान पहुंचाने” जैसी बाध्यकारी व्यवस्था को कई क्षेत्रों में नरम किया गया और डिलीवरी समय को अधिक व्यावहारिक बनाया गया। श्रमिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे गिग वर्कर्स के संघर्ष की बड़ी जीत बताया था। उनका कहना था कि इससे सड़क दुर्घटनाओं का खतरा कम होगा और कर्मचारियों को मानसिक दबाव से कुछ राहत मिलेगी।
इसके बावजूद मौजूदा भीषण गर्मी ने गिग वर्कर्स की मुश्किलें फिर बढ़ा दी हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार गर्मी में काम करने से डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक, चक्कर आना और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। महाराष्ट्र में इस बार अप्रैल और मई के दौरान तापमान सामान्य से काफी ऊपर दर्ज किया गया है। मौसम विभाग ने कई जिलों में हीटवेव अलर्ट जारी किया है। ऐसे में सड़क पर घंटों रहने वाले गिग वर्कर्स सबसे ज्यादा जोखिम में हैं।
कई डिलीवरी कर्मचारियों ने बताया कि वे दिन में 10 से 14 घंटे तक काम करते हैं, क्योंकि कमाई पूरी तरह डिलीवरी की संख्या पर निर्भर करती है। पेट्रोल की बढ़ती कीमतें, वाहन की ईएमआई और घर का खर्च उन्हें आराम करने का मौका नहीं देता। कुछ वर्कर्स ने कहा कि अगर वे एक-दो दिन काम बंद कर दें तो घर चलाना मुश्किल हो जाता है।
सामाजिक संगठनों और श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस स्थिति पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि गिग इकोनॉमी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसमें काम करने वाले कर्मचारियों के लिए सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े नियम अभी भी कमजोर हैं। कई विशेषज्ञों ने मांग की है कि सरकार और कंपनियां मिलकर गर्मी के दौरान विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू करें।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि:
1. दोपहर के सबसे गर्म समय में डिलीवरी समय सीमाओं में छूट दी जाए
2. गिग वर्कर्स को मुफ्त पानी, ORS और आराम स्थल उपलब्ध कराए जाएं
3. हीटवेव के दौरान इंसेंटिव आधारित दबाव कम किया जाए
4. मेडिकल बीमा और स्वास्थ्य सहायता को अनिवार्य बनाया जाए
महाराष्ट्र के कुछ श्रमिक संगठनों ने यह भी मांग उठाई है कि गिग वर्कर्स को औपचारिक श्रमिक का दर्जा दिया जाए, ताकि उन्हें सामाजिक सुरक्षा, बीमा और न्यूनतम कार्य सुरक्षा मिल सके। उनका कहना है कि ऐप आधारित कंपनियां तकनीक और एल्गोरिदम के जरिए काम तो ले रही हैं, लेकिन कर्मचारियों के स्वास्थ्य और मानवीय जरूरतों की अनदेखी की जा रही है।
हाल के वर्षों में भारत में गिग इकोनॉमी तेजी से बढ़ी है। लाखों युवा रोजगार के लिए ऐप आधारित सेवाओं पर निर्भर हैं। लेकिन भीषण गर्मी, बारिश और प्रदूषण जैसी परिस्थितियों में काम करने वाले इन कर्मचारियों की चुनौतियां अक्सर चर्चा से बाहर रह जाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी आने वाले वर्षों में इस समस्या को और गंभीर बना सकती है।
गिग वर्कर्स की यह पीड़ा केवल मजदूरी का मुद्दा नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और श्रमिक अधिकारों का सवाल भी बनती जा रही है। तेज धूप में घंटों सड़क पर दौड़ते ये कर्मचारी शहरों की रफ्तार बनाए रखते हैं, लेकिन उनके अपने जीवन की कठिनाइयों को अक्सर सिस्टम और समाज दोनों नजरअंदाज कर देते हैं।




