राष्ट्रीय / अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 11 मई 2026
ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते संकट के बीच दुनिया एक नए ऊर्जा आपातकाल की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित होने के बाद कई देशों ने ईंधन बचाने के लिए कठोर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देशवासियों से “वर्क फ्रॉम होम”, कम ईंधन इस्तेमाल और सोने की खरीद टालने जैसी अपीलों ने भारत में नई बहस छेड़ दी है। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि भारत से पहले दुनिया के करीब 70 देश पहले ही ऐसी नीतियां लागू कर चुके हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में तेल संकट और बढ़ती वैश्विक अस्थिरता का जिक्र करते हुए लोगों से पेट्रोल-डीजल का संयमित इस्तेमाल करने की अपील की थी। उन्होंने मेट्रो, कार पूल, ऑनलाइन मीटिंग, वर्चुअल कॉन्फ्रेंस और वर्क फ्रॉम होम को प्राथमिकता देने की बात कही थी। पीएम ने इसे केवल आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि “राष्ट्रीय जिम्मेदारी” बताया।
दरअसल ईरान युद्ध के बाद दुनिया के सबसे अहम तेल मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसी रास्ते से दुनिया के बड़े हिस्से तक तेल और गैस की सप्लाई पहुंचती है। सप्लाई चेन प्रभावित होने के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है और कई देशों में ईंधन संकट गहराने लगा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान, श्रीलंका, वियतनाम, इंडोनेशिया, फिलीपींस, इटली, स्पेन और जर्मनी समेत कई देशों ने पहले ही ईंधन बचत नीतियां लागू कर दी हैं। चीन और जापान में भी आंशिक रूप से ऐसी व्यवस्थाएं शुरू हो चुकी हैं। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार अब तक करीब 70 देश किसी न किसी रूप में ऊर्जा बचत और सीमित आवाजाही की नीति अपना चुके हैं।
इन देशों में केवल वर्क फ्रॉम होम ही नहीं, बल्कि एसी के तापमान पर भी नियंत्रण लगाया गया है। कई देशों में सार्वजनिक भवनों और दफ्तरों के लिए न्यूनतम और अधिकतम तापमान सीमा तय की गई है ताकि बिजली की खपत कम हो सके। स्कूलों और संस्थानों में ऑनलाइन क्लास को बढ़ावा दिया जा रहा है, जबकि सरकारी बैठकों और आधिकारिक दौरों में कटौती की गई है।
कुछ देशों ने निजी वाहनों के उपयोग को सीमित करने के लिए विशेष ट्रैफिक नियम भी लागू किए हैं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने, रेलवे माल ढुलाई बढ़ाने और इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल को प्राथमिकता देने जैसे कदम तेजी से बढ़ रहे हैं। कई जगहों पर सरकारें ईंधन पर टैक्स कम कर रही हैं ताकि कीमतें नियंत्रण से बाहर न जाएं।
भारत फिलहाल अपने बड़े स्ट्रेटेजिक ऑयल रिजर्व की वजह से तत्काल बड़े संकट से बचा हुआ है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर होर्मुज संकट लंबा खिंचता है तो भारत पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में हर उछाल सीधे आम लोगों की जेब पर असर डालता है।
पीएम मोदी की अपील के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में भी बहस तेज हो गई है। विपक्ष इसे सरकार की आर्थिक और विदेश नीति की विफलता बता रहा है, जबकि सरकार समर्थक इसे राष्ट्रीय संकट के समय सामूहिक जिम्मेदारी का संदेश बता रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया अब केवल युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि ऊर्जा, सप्लाई चेन और आर्थिक संसाधनों के स्तर पर भी संघर्ष देख रही है। ऐसे में आने वाले समय में वर्क फ्रॉम होम, सीमित ईंधन उपयोग और ऊर्जा बचत जैसी नीतियां केवल अस्थायी कदम नहीं, बल्कि नई वैश्विक जीवनशैली का हिस्सा बन सकती हैं।




