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ईरान पर ट्रंप की बड़ी रणनीति में नया मोड़! परमाणु समझौते की उम्मीद पर अमेरिकी मंत्री बोले—‘डील शायद हो ही न’

कूटनीति से दूरी या लगातार हमले की तैयारी? अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट के बयान ने बढ़ाई चिंता, बोले—ईरान की परमाणु क्षमता को खत्म करना ही रास्ता हो सकता है

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 7 सितंबर 2026

परमाणु समझौते पर अमेरिका का भरोसा डगमगाया?

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अब परमाणु समझौते की उम्मीद भी कमजोर होती दिखाई दे रही है। अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने रविवार को एबीसी न्यूज के कार्यक्रम में कहा कि ईरान के साथ परमाणु समझौता शायद हो ही न। उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान की परमाणु हथियार बनाने की क्षमता को कमजोर कर रहा है और जरूरत पड़ी तो उसकी परमाणु क्षमताओं को नष्ट करना भी विकल्प हो सकता है। यह बयान इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शुरुआती लक्ष्यों में ईरान के साथ ऐसा समझौता करना भी शामिल था, जिससे उसके परमाणु कार्यक्रम पर रोक लग सके। अब अमेरिका के ही एक शीर्ष अधिकारी का यह कहना कि समझौता शायद न हो, इस बात का संकेत माना जा रहा है कि वॉशिंगटन में कूटनीतिक समाधान को लेकर भरोसा कमजोर पड़ रहा है।

‘ईरान की क्षमता को खत्म करना पड़ सकता है’

क्रिस राइट ने ईरान के परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिशों को लेकर कहा कि अमेरिका के सामने एक रास्ता उसकी क्षमता को नष्ट करना भी हो सकता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान के पास मिसाइल विकसित करने की पहले जैसी क्षमता नहीं रह गई है और अमेरिकी कार्रवाई उसकी परमाणु हथियार विकसित करने तथा भविष्य में उन्हें पहुंचाने की क्षमता को कमजोर कर रही है। हालांकि ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह परमाणु हथियार बनाने की योजना नहीं रखता। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका सैन्य दबाव के जरिए ईरान को समझौते के लिए मजबूर करना चाहता है या दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता धीरे-धीरे बंद होता जा रहा है।

अमेरिकी अधिकारी ने खुद माना—डील के लिए शायद ईरान में नई सरकार का इंतजार

राइट ने बातचीत के दौरान यह संभावना भी जताई कि ईरान के साथ कोई समझौता वहां अगली सरकार आने के बाद हो सकता है। उन्होंने साफ कहा कि अभी यह पता नहीं कि ऐसा होगा या नहीं। इस बयान का राजनीतिक मतलब काफी बड़ा है, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका शायद मौजूदा ईरानी नेतृत्व के साथ समझौते की संभावनाओं को सीमित मान रहा है। अगर वॉशिंगटन की रणनीति वास्तव में ईरान में नेतृत्व परिवर्तन का इंतजार करने या सैन्य दबाव बनाए रखने की ओर जाती है, तो यह संघर्ष और लंबा खिंच सकता है। लेकिन यह भी स्पष्ट नहीं है कि अमेरिकी प्रशासन की आधिकारिक नीति वास्तव में यही है या राइट का बयान उनकी व्यक्तिगत आकलन की सीमा तक है।

जुलाई में समझौता टूटा, फिर हमले और होर्मुज संकट बढ़ा

अमेरिका और ईरान के बीच पहले हुए समझौते का ढांचा जुलाई में टूट गया था। इसके बाद कुछ समय के लिए हमले रुके, लेकिन फिर दोनों पक्षों के बीच सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू हो गई। इसी दौरान ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही पर रोक लगाई और अमेरिका ने वहां नौसैनिक नाकाबंदी लागू कर दी। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में शामिल होर्मुज में बढ़ता तनाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। इसका असर तेल आपूर्ति, वैश्विक व्यापार और खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा पर पड़ सकता है। ऐसे में परमाणु समझौते की संभावनाएं कमजोर पड़ना पूरे क्षेत्र के लिए एक और गंभीर संकेत है।

ट्रंप कहते रहे ‘छोटी बात’, लेकिन जमीन पर तनाव कम नहीं

दिलचस्प बात यह है कि व्हाइट हाउस की सार्वजनिक भाषा और जमीन पर दिखाई दे रहे घटनाक्रम में अंतर नजर आ रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने शुक्रवार को ईरान में चल रहे संघर्ष को ‘छोटी बात’ बताकर उसके प्रभाव को कम करके पेश करने की कोशिश की थी। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कुछ दिन पहले कहा था कि वह इसे युद्ध नहीं कहेंगे और उस समय सक्रिय गोलीबारी नहीं हो रही थी। लेकिन दूसरी तरफ अमेरिकी और ईरानी सेनाओं के बीच हमले, आर्थिक दबाव, होर्मुज में तनाव और अब परमाणु समझौते की संभावनाओं पर अमेरिकी मंत्री का निराशाजनक बयान एक अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं।

क्या अब बातचीत से ज्यादा भरोसा सैन्य कार्रवाई पर है?

क्रिस राइट ने कहा कि अमेरिका ईरान में अपना काम पूरा करेगा और क्षेत्र के सहयोगी देश भी इस प्रयास में शामिल होंगे। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर परमाणु समझौते की संभावना कमजोर पड़ती है और सैन्य कार्रवाई को विकल्प बनाया जाता है, तो यह संकट आखिर कहां जाकर रुकेगा? ईरान पहले ही अमेरिकी दबाव और सैन्य कार्रवाई का जवाब देने की बात कर चुका है। ऐसे में कूटनीति कमजोर और सैन्य दबाव मजबूत होता है तो तनाव कम होने के बजाय और बढ़ने का खतरा है। फिलहाल न तो किसी समझौते की पुष्टि हुई है और न ही यह कहा जा सकता है कि कोई पक्ष इस संघर्ष में जीत चुका है। असली चिंता यही है कि परमाणु मुद्दे का समाधान बातचीत से होगा या फिर मध्य-पूर्व एक और लंबे और खतरनाक टकराव की तरफ बढ़ेगा।

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