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छत्तीसगढ़ में जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए सख्त कानून लाने की तैयारी, 52 बैठकें हो चुकीं

रायपुर, 5 अगस्त 2025

छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार राज्य में धर्मांतरण की बढ़ती घटनाओं पर सख्त रुख अपनाने जा रही है। राज्य के उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री विजय शर्मा ने रविवार को संकेत दिया कि राज्य सरकार “छत्तीसगढ़ फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट” को और अधिक कठोर बनाने जा रही है और आगामी विंटर सेशन (शीतकालीन सत्र) में इसके लिए नया विधेयक लाया जा सकता है।

विजय शर्मा ने बताया कि इस उद्देश्य को लेकर अब तक 52 से अधिक बैठकों का आयोजन किया जा चुका है। उनका कहना है कि वर्तमान कानून में सुधार कर उसे और प्रभावी बनाया जाएगा ताकि राज्य में बलपूर्वक या छलपूर्वक धर्मांतरण की घटनाओं को रोका जा सके। उन्होंने कहा, “हम शीतकालीन सत्र में ऐसा कानून लाने की योजना बना रहे हैं जो मौजूदा कानून को और मजबूती दे और जबरन धर्मांतरण की घटनाओं पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करे।”

यह बयान उस वक्त आया है जब एक सप्ताह पहले ही राज्य के दुर्ग रेलवे स्टेशन से दो केरल की नन और एक आदिवासी महिला को कथित जबरन धर्मांतरण और मानव तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। यह गिरफ्तारी बजरंग दल के एक कार्यकर्ता की शिकायत पर की गई थी, जिसने आरोप लगाया कि ये लोग बस्तर के नारायणपुर जिले की तीन आदिवासी लड़कियों को आगरा ले जाकर धर्म बदलवाने की कोशिश कर रहे थे।

हालांकि इस गिरफ्तारी ने राष्ट्रीय स्तर पर भारी विरोध भी झेला। मामला जब बिलासपुर की एनआईए की विशेष अदालत में पहुंचा तो अदालत ने शनिवार को तीनों को जमानत दे दी। सूत्रों की मानें तो सरकार जिन संशोधनों पर विचार कर रही है उनमें से एक यह है कि जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है, उसे दो महीने पहले स्थानीय प्रशासन को सूचना देना अनिवार्य होगा। साथ ही प्रस्तावित कानून के तहत जबरन धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति को 10 साल तक की सजा भी हो सकती है।

यह कदम छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार की हिंदू मतदाताओं के बीच मजबूत पकड़ बनाए रखने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है, खासकर तब जब आदिवासी क्षेत्रों में धर्मांतरण के मुद्दे पर लंबे समय से बहस होती रही है। निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह प्रस्तावित विधेयक विधानसभा से पारित होगा और क्या यह राज्य में धार्मिक स्वतंत्रता और संविधानिक अधिकारों को संतुलन में रखते हुए लागू किया जा सकेगा। विपक्षी दल इस प्रस्ताव को राजनीतिक ध्रुवीकरण की चाल करार दे सकते हैं, जबकि सरकार इसे “सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा” का विषय मान रही है।

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