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‘ऑपरेशन टाइगर’ से महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल: शेर, भेड़िए, कुत्ते और वफादारी की लड़ाई में बदल गया शिवसेना का संकट

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 20 जून 2026

महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना के भीतर चल रहा सत्ता संघर्ष अब केवल राजनीतिक बगावत तक सीमित नहीं रह गया है। यह लड़ाई अब प्रतीकों, भावनाओं और बालासाहेब ठाकरे की विरासत पर दावे की जंग में बदल चुकी है। शिवसेना की स्थापना के 60 वर्ष पूरे होने के मौके पर एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे खेमों के बीच छिड़ी राजनीतिक लड़ाई में “शेर”, “भेड़िया” और “कुत्ते” जैसे रूपकों का इस्तेमाल इस संघर्ष की तीव्रता को और उजागर कर रहा है।

दरअसल, शिवसेना की राजनीति में ‘टाइगर’ यानी शेर हमेशा से बालासाहेब ठाकरे की पहचान और पार्टी के प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है। यही वजह है कि अब जब शिवसेना दो हिस्सों में बंट चुकी है, तो दोनों गुट खुद को असली राजनीतिक उत्तराधिकारी साबित करने की कोशिश में लगे हैं।

“यह टाइगर आपके सामने खड़ा है”: शिंदे का शक्ति प्रदर्शन

शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपने भाषण के दौरान खुद को “टाइगर” बताते हुए विपक्षी खेमे पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि “यह टाइगर आपके सामने खड़ा है।”

शिंदे ने अपने राजनीतिक विरोधियों पर निशाना साधते हुए कहा कि “कुत्ते झुंड में भौंकते हैं, लेकिन शेर अकेला चलता है।” इसके साथ ही उन्होंने 2022 में उद्धव ठाकरे के खिलाफ की गई बगावत को सही ठहराते हुए दावा किया कि जनता ने उनके फैसले का समर्थन किया है।

उन्होंने आगे कहा कि “बाघ की खाल पहन लेने से कोई भेड़िया बाघ नहीं बन जाता।” शिंदे का यह बयान सीधे तौर पर उद्धव ठाकरे और उनके समर्थकों पर राजनीतिक हमला माना जा रहा है।

संजय राउत का पलटवार: “कुछ लोग कुत्ते हैं, लेकिन वफादार नहीं”

एकनाथ शिंदे के बयान के बाद शिवसेना (यूबीटी) की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। राज्यसभा सांसद संजय राउत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं, लेकिन वफादार नहीं होते।”

राउत का यह जवाब सीधे उन सांसदों और नेताओं की ओर संकेत माना गया जो हाल के दिनों में उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर शिंदे खेमे की ओर बढ़ रहे हैं। इस बयान ने दोनों गुटों के बीच चल रही जुबानी जंग को और तेज कर दिया।

‘ऑपरेशन टाइगर’ और छह सांसदों की बगावत

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसद जल्द ही शिंदे गुट में शामिल हो सकते हैं। इस पूरी राजनीतिक कवायद को “ऑपरेशन टाइगर” नाम दिया गया है। यदि यह कदम सफल होता है तो 2022 के बाद यह उद्धव ठाकरे के लिए दूसरा बड़ा झटका होगा।

इन सांसदों की नाराजगी के पीछे मुख्य कारण कांग्रेस के साथ बढ़ती नजदीकियों और भविष्य में संभावित राजनीतिक विलय की आशंका को बताया जा रहा है। हालांकि उद्धव ठाकरे ने साफ कहा है कि शिवसेना का गठन मराठी मानुष और हिंदुत्व की रक्षा के लिए हुआ था तथा पार्टी किसी भी दल में विलय नहीं करेगी।

बालासाहेब की विरासत पर असली लड़ाई

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा संघर्ष केवल सांसदों और विधायकों की संख्या का नहीं, बल्कि बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत पर अधिकार का है। एकनाथ शिंदे लगातार दावा कर रहे हैं कि उन्होंने हिंदुत्व की मूल विचारधारा को बचाने के लिए बगावत की थी, जबकि उद्धव ठाकरे खुद को शिवसेना की मूल आत्मा और संगठन का वास्तविक उत्तराधिकारी बताते हैं।

यही कारण है कि दोनों पक्ष बार-बार हिंदुत्व, बालासाहेब ठाकरे और शिवसेना की मूल पहचान का हवाला दे रहे हैं। आने वाले दिनों में यदि सांसदों की बगावत औपचारिक रूप लेती है तो महाराष्ट्र की राजनीति में शक्ति संतुलन एक बार फिर बदल सकता है।

महाराष्ट्र की राजनीति के लिए बड़ा संकेत

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह संकट केवल शिवसेना तक सीमित नहीं है। यह भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के सामने खड़े अस्तित्व के संकट की भी कहानी है। एक तरफ सत्ता के केंद्र की ओर झुकाव है, दूसरी तरफ क्षेत्रीय पहचान और राजनीतिक स्वायत्तता को बचाने की चुनौती।

फिलहाल इतना तय है कि महाराष्ट्र में “टाइगर” की यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। असली सवाल यह है कि बालासाहेब ठाकरे की विरासत का असली उत्तराधिकारी कौन साबित होगा—एकनाथ शिंदे या उद्धव ठाकरे? इसका जवाब आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम तय करेंगे।

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