शिक्षा/ ओपिनियन | मोहम्मद आलमुल्लाह, पत्रकार | ABC NATIONAL NEWS | लंदन/ नई दिल्ली | 2 नवंबर 2026
जामिया मिल्लिया इस्लामिया अपनी स्थापना के इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान और साझा भारतीय विरासत पर गर्व करता है। लेकिन इसी विश्वविद्यालय के इतिहास से जुड़ा एक सवाल अब प्रशासन के सामने खड़ा है—क्या जामिया अपने ही संस्थापकों में शामिल मौलाना मोहम्मद अली जौहर को धीरे-धीरे सार्वजनिक स्मृति से बाहर कर रहा है?
लंदन से मोहम्मद आलमुल्लाह ने अपने लेख में जामिया प्रशासन की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर पूरे उत्साह के साथ कार्यक्रम आयोजित करता है। कुलपति स्वयं एकता की शपथ दिलाते हैं, खेल परिसर में आयोजन होते हैं और आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियां जारी की जाती हैं। यह सब होना चाहिए। पटेल देश के पहले गृह मंत्री थे और स्वतंत्रता के बाद भारत के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
लेकिन सवाल यह है कि जामिया इसी उत्साह के साथ अपने संस्थापकों में शामिल मौलाना मोहम्मद अली जौहर को क्यों याद नहीं करता?
पटेल के लिए आयोजन, जौहर की जयंती पर खामोशी क्यों?
मौलाना मोहम्मद अली जौहर की जयंती 10 दिसंबर और पुण्यतिथि 4 जनवरी को पड़ती है। लेख में आरोप लगाया गया है कि पिछले कई वर्षों से इन अवसरों पर जामिया में कोई बड़ा या सार्थक आयोजन देखने को नहीं मिला। न उनकी विचारधारा पर गंभीर अकादमिक चर्चा होती है और न ही विद्यार्थियों को उनके योगदान से परिचित कराने के लिए कोई विशेष पहल दिखाई देती है।
यह सवाल किसी एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व को दूसरे से बड़ा साबित करने का नहीं है। सरदार पटेल का सम्मान होना चाहिए और उनकी जयंती मनाई जानी चाहिए। लेकिन क्या ऐसा करते हुए जामिया अपने संस्थापकों को भूल सकता है?
जिस विश्वविद्यालय की पहचान ही उसके संस्थापकों के संघर्ष, विचार और शैक्षणिक स्वायत्तता की भावना से बनी हो, वहां उनकी स्मृति को जीवित रखना प्रशासन की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
कुलपति कार्यालय के बाहर से जौहर की प्रतिमा क्यों हटाई गई?
मोहम्मद आलमुल्लाह ने अपने लेख में एक और गंभीर सवाल उठाया है। उनके मुताबिक, मौलाना मोहम्मद अली जौहर की प्रतिमा कभी कुलपति कार्यालय के बाहर स्थापित थी। इसे पूर्व कुलपति प्रो. मुशीरुल हसन के कार्यकाल में लगाया गया था, लेकिन बाद में इसे वहां से हटा दिया गया।
लेख में पूछा गया है कि प्रतिमा हटाने का फैसला किसने लिया? इसके पीछे प्रशासनिक कारण क्या थे? क्या विश्वविद्यालय ने इस फैसले के बारे में अपने विद्यार्थियों, शिक्षकों और पूर्व छात्रों को कोई स्पष्ट जानकारी दी?
किसी संस्थापक की प्रतिमा केवल पत्थर या धातु की बनी आकृति नहीं होती। वह उस इतिहास की याद दिलाती है, जिसके संघर्ष और समर्पण से कोई संस्थान खड़ा होता है। ऐसे में प्रतिमा हटाने के फैसले पर पारदर्शिता जरूरी है।
कुलपति प्रो. मजहर आसिफ से सीधे सवाल
लेखक ने जामिया के कुलपति प्रो. मजहर आसिफ के सामने कई सवाल रखे हैं:
* विश्वविद्यालय हर साल 10 दिसंबर और 4 जनवरी को मौलाना मोहम्मद अली जौहर की स्मृति में बड़े कार्यक्रम क्यों नहीं आयोजित करता?
* उनके जीवन, स्वतंत्रता आंदोलन और शैक्षणिक योगदान पर गंभीर संगोष्ठियां और अकादमिक चर्चाएं क्यों नहीं होतीं?
* कुलपति कार्यालय के बाहर से उनकी प्रतिमा हटाने का आदेश किसने दिया और इसके पीछे क्या कारण था?
* क्या मौजूदा प्रशासन मौलाना जौहर की विरासत को जामिया की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है?
* 10 दिसंबर 2026 को उनकी जयंती पर क्या विश्वविद्यालय कोई विशेष कार्यक्रम आयोजित करेगा?
ये सवाल विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक जिम्मेदारी और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े हैं। इनका जवाब दिया जाना चाहिए।
जामिया किसी कुलपति या विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं
मोहम्मद आलमुल्लाह अपने लेख में एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं—जामिया मिल्लिया इस्लामिया किसी एक कुलपति, प्रशासन या विचारधारा की संपत्ति नहीं है। यह उन लोगों के संघर्ष, त्याग और संकल्प से बना संस्थान है, जिन्होंने शिक्षा को स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाने का सपना देखा था।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर और उनके सहयोगियों ने जिस संस्था की नींव रखी, आज उसका संचालन करने वाले लोग उस इतिहास के मालिक नहीं, बल्कि उसके संरक्षक हैं। उनकी जिम्मेदारी है कि वे संस्थान की विरासत को पूरी ईमानदारी से अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं।
जामिया अगर राष्ट्रीय एकता और साझा संस्कृति की बात करता है, तो उसे उन स्वतंत्रता सेनानियों और शिक्षाविदों को भी बराबर सम्मान देना चाहिए, जिन्होंने देश की आजादी और शिक्षा की स्वतंत्र पहचान के लिए संघर्ष किया।
10 दिसंबर पर अब सबकी नजर
मौलाना मोहम्मद अली जौहर की अगली जयंती 10 दिसंबर 2026 को है। ऐसे में अब निगाहें जामिया प्रशासन पर हैं। क्या विश्वविद्यालय इस बार अपने संस्थापक की स्मृति में कोई बड़ा कार्यक्रम आयोजित करेगा? क्या उनकी प्रतिमा को परिसर में उचित स्थान पर फिर से स्थापित किया जाएगा? क्या विद्यार्थियों को उनके जीवन और विचारों से जोड़ने के लिए कोई स्थायी अकादमिक पहल शुरू होगी?
इस पूरे विवाद का मूल सवाल बिल्कुल सीधा है—सरदार पटेल की जयंती मनाने पर किसी को आपत्ति नहीं, लेकिन मौलाना मोहम्मद अली जौहर को याद करने में आखिर परेशानी क्या है?
किसी संस्थान की महानता केवल उसके भवनों, डिग्रियों और उपलब्धियों से नहीं मापी जाती। उसकी पहचान इस बात से भी बनती है कि वह अपने इतिहास और उसे बनाने वाले लोगों के साथ कितना न्याय करता है।
जिस शख्स ने जामिया की नींव रखने में योगदान दिया, उसकी यादों के लिए उसी परिसर में जगह और सम्मान क्यों नहीं होना चाहिए?
यह खबर लंदन से मोहम्मद आलमुल्लाह द्वारा लिखे गए मूल लेख पर आधारित है। प्रतिमा हटाए जाने और आयोजनों की कमी से जुड़े आरोपों पर जामिया प्रशासन का पक्ष उपलब्ध कराए गए लेख में शामिल नहीं है।



