अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 नवंबर 2026
सत्ता की चाबी अब किसके हाथ में?
इजरायल की 120 सदस्यीय संसद में बहुमत के लिए 61 सदस्यों का समर्थन जरूरी है। नेतन्याहू का गठबंधन 53 सीटों पर है, जबकि आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के पास 48 सीटें हैं। अरब नेतृत्व वाले जॉइंट लिस्ट और राम के पास 19 सीटें हैं। यानी सत्ता का पूरा गणित अब इन दलों के रुख पर निर्भर करता दिखाई दे रहा है।
ताजा घटनाक्रम में अरब नेतृत्व वाले दलों ने नेतन्याहू को हटाने के लिए विपक्ष के साथ सहयोग करने की इच्छा जताई है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने भी आइजेनकोट को सरकार बनाने का मौका देने के समर्थन का ऐलान किया है। इससे विपक्ष की उम्मीदें बढ़ी हैं, लेकिन सरकार बनाने का रास्ता अभी भी मुश्किल है।
आइजेनकोट के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा
आइजेनकोट के सामने चुनौती केवल नेतन्याहू को सत्ता से हटाने की नहीं, बल्कि अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों को एक साथ रखने की भी है।
अरब दलों का समर्थन मिलने पर विपक्ष के पास संसद में बहुमत का रास्ता खुल सकता है। लेकिन यहां एक बड़ी राजनीतिक अड़चन है। आइजेनकोट और विपक्ष के कई नेता पहले ही अरब दलों के साथ औपचारिक गठबंधन को लेकर आपत्ति जता चुके हैं।
अरब दलों ने संकेत दिया है कि वे सरकार में शामिल हुए बिना भी संसद में बाहर से समर्थन दे सकते हैं। ऐसा हुआ तो आइजेनकोट अल्पमत सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन क्या विपक्ष के सभी सहयोगी इस व्यवस्था को स्वीकार करेंगे? यही इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे अहम सवाल है।
नेतन्याहू के पास भी अभी रास्ते बंद नहीं
नेतन्याहू के लिए स्थिति मुश्किल जरूर है, लेकिन उनकी राजनीतिक पारी अभी खत्म नहीं हुई है। वे विपक्षी खेमे में सेंध लगाने, छोटे दलों को अपने साथ लाने या किसी तरह नया गठबंधन तैयार करने की कोशिश कर सकते हैं।
अगर आइजेनकोट अरब दलों के समर्थन से सरकार बनाने में सफल नहीं होते, तो इसका राजनीतिक फायदा नेतन्याहू को मिल सकता है। विपक्ष के भीतर मतभेद जितने बढ़ेंगे, नेतन्याहू के लिए सत्ता में बने रहने की संभावना उतनी ही मजबूत हो सकती है।
यही वजह है कि आने वाले दिनों में केवल सीटों का गणित नहीं, बल्कि राजनीतिक समझौते और नेताओं के फैसले निर्णायक होंगे।
तीन संभावित रास्ते, लेकिन कोई आसान नहीं
पहला रास्ता है—आइजेनकोट अरब दलों के बाहरी समर्थन से अल्पमत सरकार बनाने की कोशिश करें। इससे नेतन्याहू को सत्ता से हटाने का रास्ता खुल सकता है, लेकिन सरकार को हर बड़े फैसले पर समर्थन जुटाना होगा।
दूसरा रास्ता है—विपक्ष और नेतन्याहू के खेमे के बीच किसी तरह की साझा सरकार या राजनीतिक समझौता। हालांकि, नेतन्याहू के खिलाफ विपक्ष का मौजूदा रुख देखते हुए यह विकल्प फिलहाल बेहद कठिन दिखाई देता है।
तीसरा रास्ता है—अगर कोई भी गठबंधन सरकार बनाने में नाकाम रहता है तो संसद भंग हो सकती है और इजरायल को फिर चुनाव में जाना पड़ सकता है। Axios +1
अब आगे क्या होगा?
चुनाव परिणामों को आधिकारिक रूप से प्रमाणित कर 4 नवंबर तक राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग के सामने पेश किया जाना है। नई संसद 10 नवंबर को शपथ लेगी। राष्ट्रपति राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श के बाद 11 नवंबर तक किसी सांसद को सरकार बनाने का न्योता दे सकते हैं।
पहले उम्मीदवार को सरकार बनाने के लिए 28 दिन मिलेंगे। जरूरत पड़ने पर 14 दिन का अतिरिक्त समय भी दिया जा सकता है। अगर वह असफल रहता है तो दूसरे उम्मीदवार को मौका मिल सकता है। तमाम कोशिशें नाकाम होने पर संसद भंग कर 90 दिनों के भीतर नए चुनाव कराने की नौबत आ सकती है। तब तक नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे।
इजरायल की राजनीति का निर्णायक मोड़
इस चुनाव ने नेतन्याहू के सामने सत्ता बचाने की चुनौती खड़ी कर दी है, लेकिन विपक्ष के लिए भी यह आसान जीत नहीं है। आइजेनकोट को अरब दलों का समर्थन मिल सकता है, मगर उस समर्थन को स्वीकार करने की राजनीतिक कीमत भी चुकानी पड़ सकती है।
अब असली सवाल यह नहीं कि किस गठबंधन के पास कितनी सीटें हैं, बल्कि यह है कि कौन अपने राजनीतिक वादों से समझौता करने को तैयार होगा।
क्या अरब दलों के समर्थन से नेतन्याहू की लंबी सत्ता का अंत होगा? क्या आइजेनकोट विरोधी दलों को एकजुट कर नई सरकार बना पाएंगे? या फिर इजरायल की जनता को एक बार फिर मतदान केंद्रों पर लौटना पड़ेगा?
इजरायल में सत्ता का फैसला अभी बाकी है—और अगला कदम पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति पर असर डाल सकता है।



