अपराध/ राष्ट्रीय/ मध्यप्रदेश | ABC NATIONAL NEWS | भोपाल | 30 अक्टूबर 2026
भोपाल में नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण के एक गंभीर मामले में विशेष पॉक्सो अदालत ने पूर्व अखबार संचालक प्यारे मियां को 10 अलग-अलग उम्रकैद की सजाएं सुनाई हैं। अदालत ने उस पर 77 लाख 64 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। मामले में उसकी सहयोगी राबिया बी को 20 साल के कारावास की सजा सुनाई गई है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पांच नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण से जुड़े इस मामले में आरोप साबित होने के बाद 27 अक्टूबर 2026 को अदालत ने फैसला सुनाया।
यह मामला केवल एक आपराधिक घटना और अदालत के फैसले तक सीमित नहीं है। यह समाज के सामने बच्चों की सुरक्षा, नौकरी के नाम पर दिए जाने वाले लालच, भरोसे का दुरुपयोग और समय रहते संदिग्ध गतिविधियों को पहचानने जैसे कई जरूरी सवाल खड़े करता है।
11 जुलाई 2020 को सामने आया मामला
घटना का खुलासा 11 जुलाई 2020 को हुआ। अभियोजन के अनुसार, भोपाल के शाहपुरा इलाके में पुलिस को पांच नाबालिग बच्चियां नशे की हालत में मिलीं। बाद में काउंसलिंग के दौरान एक बच्ची ने बताया कि उसे जन्मदिन मनाने के बहाने एक फ्लैट में बुलाया गया था, जहां शराब पिलाने के बाद उसका यौन शोषण किया गया।
जांच आगे बढ़ी तो दूसरी बच्चियों ने भी इसी तरह के शोषण से जुड़ी जानकारी दी। पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और प्यारे मियां का नाम सामने आया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, बच्चियों को नौकरी और हर महीने 10 हजार रुपये वेतन देने का लालच दिया जाता था। आरोपों की जांच के बाद पुलिस ने मुकदमा चलाया और अदालत में साक्ष्य प्रस्तुत किए।
लालच के जाल में फंसाने का तरीका
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नौकरी और नियमित आमदनी का वादा बच्चियों को अपने जाल में फंसाने के लिए इस्तेमाल किया गया। आर्थिक जरूरत, बेहतर जीवन की उम्मीद और किसी परिचित के भरोसे पर बच्चे तथा उनके परिवार कभी-कभी ऐसे प्रस्तावों पर विश्वास कर लेते हैं, जिनकी पूरी जांच नहीं की गई होती।
अभियोजन के मुताबिक, राबिया बी इस मामले में प्यारे मियां की सहयोगी थी। अदालत ने उसके खिलाफ भी दोष सिद्ध होने पर 20 साल की कैद की सजा सुनाई। हालांकि, बच्चों की सुरक्षा के संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति का परिचित होना, प्रभावशाली होना या नौकरी दिलाने का दावा करना अपने आप में उसकी नीयत का प्रमाण नहीं है। हर प्रस्ताव की विश्वसनीयता और परिस्थितियों की जांच जरूरी है।
10 बार उम्रकैद का क्या मतलब है?
अदालत ने प्यारे मियां को अलग-अलग कानूनी प्रावधानों के तहत 10 उम्रकैद की सजाएं दीं। इनमें आठ सजाएं उसके शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास की हैं, जबकि दो अन्य उम्रकैद की सजाएं हैं। रिपोर्टों के अनुसार, सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी। इसलिए यह कहना कि उसे 10 सजाएं एक के बाद एक पूरी करनी होंगी, सही नहीं होगा। अदालत ने कुल 77.64 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
यह फैसला बताता है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों को कानून कितनी गंभीरता से लेता है। पॉक्सो कानून बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षा देने और ऐसे अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष कानूनी व्यवस्था प्रदान करता है।
बच्चों को जागरूक करना क्यों जरूरी है?
बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल पुलिस, अदालत या स्कूल की नहीं है। परिवार, समाज और संस्थानों की भी इसमें अहम भूमिका है। बच्चों को उम्र के अनुरूप सरल भाषा में समझाना चाहिए कि कोई व्यक्ति उन्हें नौकरी, पैसे, उपहार, पार्टी या किसी अन्य आकर्षण का लालच देकर ऐसी जगह बुलाए जहां वे असहज या असुरक्षित महसूस करें, तो उन्हें अपने अभिभावक या किसी विश्वसनीय वयस्क को जरूर बताना चाहिए।
बच्चों को यह भी समझाया जाना चाहिए कि किसी व्यक्ति को उनकी इच्छा के विरुद्ध छूने, डराने, धमकाने या किसी बात को गुप्त रखने के लिए मजबूर करने का अधिकार नहीं है। यदि बच्चा किसी घटना के बारे में बताता है, तो उसे डांटने, दोष देने या उसकी बात पर संदेह जताने के बजाय शांति से सुनना चाहिए और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
समाज क्या कर सकता है?
* नौकरी या प्रशिक्षण का प्रस्ताव देने वाले व्यक्ति और संस्था की पहचान की पुष्टि करें।
* नाबालिग बच्चों को किसी अपरिचित व्यक्ति के साथ अकेले भेजने से पहले पूरी जानकारी लें।
* बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव, डर या किसी खास व्यक्ति से मिलने की अनिच्छा को गंभीरता से लें।
* किसी संदिग्ध गतिविधि या शोषण की जानकारी मिलने पर पुलिस अथवा बाल संरक्षण तंत्र को सूचित करें।
* बच्चे की पहचान, तस्वीर या ऐसी जानकारी सार्वजनिक न करें जिससे उसकी पहचान उजागर हो सके।
भारत में बाल सहायता के लिए चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 और आपात स्थिति में 112 पर संपर्क किया जा सकता है।
बच्चों की सुरक्षा समाज की सामूहिक जिम्मेदारी
प्यारे मियां मामले में आया फैसला उन परिवारों और बच्चों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है, जो लालच, दबाव या भरोसे के दुरुपयोग के कारण शोषण का सामना करते हैं। अपराध की जिम्मेदारी हमेशा अपराध करने वाले की होती है—बच्चे की नहीं। पीड़ित को चुप रहने के लिए मजबूर करना या उसे दोषी ठहराना उसकी पीड़ा को और बढ़ाता है।
बच्चों को सुरक्षित वातावरण देना, उनकी बात सुनना, उनकी शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करना और कानून के प्रति जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। केवल सख्त सजा से ही हर अपराध नहीं रुकता; समय पर पहचान, शिकायत, जांच और सामाजिक सतर्कता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
किसी भी समाज की असली जिम्मेदारी सिर्फ अपराध होने के बाद न्याय की मांग करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें हर बच्चा बिना डर के जी सके, अपनी बात कह सके और उसे भरोसा हो कि जरूरत पड़ने पर कोई उसकी मदद के लिए खड़ा होगा।



