राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 अक्टूबर 2026
कला की अभिव्यक्ति पर रोक के सवाल ने राजनीतिक बहस छेड़ दी है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने बीकानेर हाउस में कला प्रदर्शनियों के नियमों को लेकर सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि राजनीतिक विषयों वाली कला को प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं है, तो सितंबर 2025 में इसी परिसर में प्रदर्शित उस कलाकृति को कैसे अनुमति मिली, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महात्मा गांधी को दर्शाया गया था?
खेड़ा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा किए गए अपने बयान में एक वीडियो का हवाला दिया। उनके मुताबिक, एक बीजेपी समर्थक बीकानेर हाउस की नीति का उल्लेख करते हुए दावा कर रहा है कि वहां कला प्रदर्शनियों में राजनीतिक सामग्री की अनुमति नहीं है। इसके जवाब में खेड़ा ने सितंबर 2025 में बीकानेर हाउस में प्रदर्शित कलाकृति का उदाहरण दिया और सवाल किया कि क्या वह कलाकृति राजनीतिक नहीं थी?
उनका तर्क है कि कला को राजनीतिक मानने या न मानने का पैमाना एक जैसा होना चाहिए। यदि किसी कलाकृति में प्रधानमंत्री का चित्रण स्वीकार किया जाता है, तो लोकतंत्र, संविधान और नागरिकों के विरोध करने के अधिकार को व्यक्त करने वाली कला को केवल राजनीतिक कहकर अस्वीकार करना सवालों के घेरे में आता है।
रायहान वाड्रा की प्रदर्शनी से 75 तस्वीरें हटाने पर विवाद
यह विवाद फोटोग्राफर रायहान राजीव वाड्रा की प्रदर्शनी ‘No Idea Is Final’ से जुड़ा है। रायहान, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा और कारोबारी रॉबर्ट वाड्रा के बेटे हैं। उनकी प्रदर्शनी में दिल्ली के युवाओं के विरोध प्रदर्शनों और नागरिक आंदोलनों की तस्वीरें शामिल थीं। रिपोर्टों के अनुसार, बीकानेर हाउस प्रबंधन ने राजनीतिक सामग्री से संबंधित अपनी नीति का हवाला देते हुए लगभग 75 तस्वीरें हटाने को कहा। रायहान ने कहा कि तस्वीरें विरोध प्रदर्शनों का दृश्य दस्तावेज थीं और उनमें कोई अतिरिक्त राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी।
बीकानेर हाउस प्रबंधन का पक्ष है कि प्रदर्शनी स्थल की नीति राजनीतिक सामग्री की अनुमति नहीं देती। प्रबंधन के मुताबिक, हटाने के लिए चिह्नित तस्वीरें निर्धारित नीति के अनुरूप नहीं थीं। बीजेपी की ओर से भी नियमों का हवाला देकर कार्रवाई का बचाव किया गया। दूसरी ओर, कांग्रेस नेताओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक विरोध की आवाज से जुड़ा मामला बताया है।
मोदी-गांधी वाली कलाकृति पर पवन खेड़ा का सवाल
पवन खेड़ा ने अपने एक्स पोस्ट में सितंबर 2025 में बीकानेर हाउस में प्रदर्शित उस कलाकृति का वीडियो साझा किया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महात्मा गांधी को साथ दिखाया गया था। खेड़ा का तर्क है कि प्रधानमंत्री की तस्वीर को सरकारी योजनाओं और लाभों के प्रचार से जोड़ना भी राजनीतिक संदेश देता है। उनके मुताबिक, मोदी को गांधी के समान स्तर पर प्रस्तुत करना भी एक राजनीतिक अभिव्यक्ति है। ऐसे में सवाल उठता है कि एक कलाकृति को जगह मिली, जबकि विरोध प्रदर्शनों को दर्ज करने वाली तस्वीरों पर आपत्ति क्यों हुई?
खेड़ा ने इस स्थिति को बीकानेर हाउस और सरकार के दोहरे मापदंड का सवाल बताया। उनका कहना है कि समस्या राजनीतिक कला से नहीं, बल्कि उस राजनीति से है जो तय करती है कि किस तरह की अभिव्यक्ति स्वीकार की जाएगी। उनके अनुसार, यदि सत्ता का महिमामंडन करने वाली कलाकृति प्रदर्शित हो सकती है, तो लोकतंत्र, संविधान और नागरिकों के विरोध के अधिकार को दिखाने वाली तस्वीरों पर रोक क्यों?
कला की स्वतंत्रता और नियमों की निष्पक्षता पर बहस
इस विवाद का केंद्रीय सवाल यह है कि सार्वजनिक संस्थानों में कला प्रदर्शनियों के नियम किस तरह लागू किए जाते हैं। यदि नीति राजनीतिक सामग्री पर रोक लगाती है, तो उसका इस्तेमाल सभी कलाकृतियों और कलाकारों के लिए एक समान होना चाहिए। साथ ही, यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि राजनीतिक सामग्री की परिभाषा क्या है और किसी प्रदर्शनी को मंजूरी देने के बाद किन परिस्थितियों में उसके काम हटाए जा सकते हैं।
बीकानेर हाउस का कहना है कि कार्रवाई निर्धारित नीति के तहत की गई, जबकि पवन खेड़ा और कांग्रेस नेताओं ने उसके समान रूप से लागू होने पर सवाल उठाए हैं। इस विवाद का समाधान स्पष्ट नियमों, पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया और सभी कलाकारों के साथ समान व्यवहार में है।
बहस केवल रायहान वाड्रा की तस्वीरों तक सीमित नहीं है। यह सवाल कला की स्वतंत्रता, नागरिकों के विरोध के अधिकार और सरकारी संस्थानों की निष्पक्षता से जुड़ा है। क्या राजनीतिक सामग्री पर रोक का नियम हर तरह की राजनीतिक अभिव्यक्ति पर समान रूप से लागू होगा, या अभिव्यक्ति का मूल्यांकन उसके संदेश के आधार पर अलग-अलग किया जाएगा? यही वह सवाल है जिसका जवाब बीकानेर हाउस प्रबंधन को स्पष्ट रूप से देना चाहिए।



