राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 अक्टूबर 2026
विधायक जनता के वोट से जीतें, फिर कुछ ही समय बाद इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी में चले जाएं और दोबारा चुनाव लड़ें—क्या इसकी कीमत जनता के पैसे से चुकाई जानी चाहिए? इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। याचिका में मांग की गई है कि विधायकों को राजनीतिक निष्ठा बदलने के लिए इस्तीफा देकर उपचुनाव कराने और उसका आर्थिक बोझ सरकारी खजाने पर डालने से रोका जाए।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने अधिवक्ता के. सुथान की अपील पर केंद्र सरकार को औपचारिक नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मर्लिन रेचल जे. पेश हुईं।
जनता के जनादेश का सवाल
याचिका में दलील दी गई है कि विधायक जब चुनाव जीतते हैं, तो उन्हें मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी मिलती है। यदि कोई विधायक बिना किसी ठोस कारण के कुछ ही सप्ताह में इस्तीफा देकर राजनीतिक पाला बदलता है और फिर उपचुनाव लड़ता है, तो यह केवल एक सीट छोड़ने का मामला नहीं रह जाता। इससे मतदाताओं के भरोसे और उनके दिए गए जनादेश पर भी सवाल उठता है।
याचिका में कहा गया है कि राजनीतिक निष्ठा बदलने के लिए सीट छोड़ने और फिर चुनाव कराने की प्रक्रिया पर सार्वजनिक धन खर्च होता है। ऐसे मामलों में यह विचार किया जाना चाहिए कि क्या जनता को उस राजनीतिक फैसले की आर्थिक कीमत चुकानी चाहिए, जिसे विधायक ने स्वयं लिया है।
तमिलनाडु के विधायकों से जुड़ा मामला
यह अपील मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दाखिल की गई है, जिसमें AIADMK के विधायकों के इस्तीफे और सत्तारूढ़ तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) में जाने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी गई थी।
इस मामले में विधायकों के पार्टी बदलने और उसके बाद उपचुनाव की स्थिति को लेकर कानूनी सवाल उठाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट से अपील की गई है कि ऐसे मामलों में मतदाताओं के अधिकारों, राजनीतिक जवाबदेही और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को ध्यान में रखते हुए कानूनी स्थिति स्पष्ट की जाए।
जनता के पैसे से चुनाव का खर्च क्यों?
उपचुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं और रिक्त सीटों को भरने के लिए जरूरी हो सकते हैं। लेकिन यदि कोई विधायक राजनीतिक कारणों से इस्तीफा देता है और उसके चलते उपचुनाव कराना पड़ता है, तो उस पर होने वाले सार्वजनिक खर्च को लेकर जवाबदेही का सवाल उठना स्वाभाविक है।
याचिका इसी मुद्दे को अदालत के सामने रखती है। इसमें यह मांग की गई है कि राजनीतिक निष्ठा बदलने के लिए इस्तीफा देने वाले विधायकों के मामलों में सार्वजनिक धन के इस्तेमाल पर स्पष्ट नियम बनाए जाएं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी याचिका पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। केंद्र सरकार और चुनाव आयोग का जवाब आने के बाद ही आगे की सुनवाई और संभावित कानूनी दिशा स्पष्ट होगी।
अब केंद्र और चुनाव आयोग के जवाब पर नजर
सुप्रीम कोर्ट का नोटिस इस मुद्दे पर कानूनी बहस को आगे बढ़ाने वाला कदम है। मामला केवल विधायकों के इस्तीफे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की राजनीतिक स्वतंत्रता और मतदाताओं के जनादेश के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
यदि विधायक पार्टी बदलने के लिए इस्तीफा देते हैं, तो क्या हर स्थिति में उपचुनाव का खर्च सार्वजनिक खजाने से ही उठाया जाना चाहिए? क्या ऐसे मामलों में अतिरिक्त जवाबदेही तय की जा सकती है? इन सवालों पर अदालत के सामने विचार होना बाकी है।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। अंतिम निर्णय आने तक यह कहना उचित नहीं होगा कि अदालत ने विधायकों के इस्तीफे या उपचुनाव के खर्च को लेकर कोई नया नियम लागू कर दिया है।



