राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | पीलीभीत, उत्तर प्रदेश | 22 अक्टूबर 2026
उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया पूरी होने और अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद भी वोटर लिस्ट को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र से सामने आए दावों ने चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दावा किया जा रहा है कि कुछ मतदाताओं के EPIC नंबर यानी मतदाता पहचान पत्र नंबर तो वही हैं, लेकिन अंतिम सूची में उनके नाम बदल गए हैं। यदि ये शिकायतें सही पाई जाती हैं, तो यह मामूली टंकण त्रुटि का मामला नहीं, बल्कि मतदाता पहचान और चुनावी अधिकारों से जुड़ी गंभीर गड़बड़ी होगी।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि SIR के नाम पर मतदाता सूची की जांच और सुधार की पूरी प्रक्रिया आखिर किस तरह पूरी हुई? जिस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना और गलतियों को दूर करना था, उसी के बाद यदि मतदाता अपने नाम को लेकर परेशान हैं, तो जवाबदेही किसकी होगी? चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को इन सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
EPIC नंबर वही, नाम बदले होने का दावा
पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र के संबंध में साझा की गई जानकारी के अनुसार, कुछ मतदाताओं ने अंतिम मतदाता सूची में अपना नाम जांचने पर कथित तौर पर अलग नाम दर्ज पाया। उदाहरण के तौर पर आशीष राज का नाम बदलकर मिलिन पटेल और अखलाक का नाम अकील अहमद दर्ज होने का दावा किया गया है। इन उदाहरणों ने इस आशंका को जन्म दिया है कि कहीं मतदाता पहचान से जुड़ा डेटा गलत तरीके से तो नहीं बदला गया।
हालांकि, इन उदाहरणों और हजारों मतदाताओं के नाम बदले जाने के दावे की स्वतंत्र पुष्टि तथा आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच जरूरी है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित नामों के साथ EPIC नंबर वास्तव में मेल खाते हैं या नहीं, बदलाव किस चरण में हुआ और इसके पीछे तकनीकी त्रुटि, डेटा मिलान की गलती या कोई दूसरी वजह थी। लेकिन इन सवालों का जवाब देने की जिम्मेदारी संबंधित चुनाव अधिकारियों की है।
हजारों नामों की गड़बड़ी है तो जिम्मेदार कौन?
इस मामले में सबसे गंभीर दावा यह है कि ऐसी गड़बड़ी से हजारों मतदाता प्रभावित हो सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति के पहचान पत्र का नंबर तो वही रहे, लेकिन मतदाता सूची में उसके सामने किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज हो जाए, तो मतदान केंद्र पर उसकी पहचान को लेकर समस्या पैदा हो सकती है। ऐसी स्थिति में पात्र मतदाता को मतदान करने में परेशानी हो सकती है और उसके लोकतांत्रिक अधिकार पर सीधा असर पड़ सकता है।
यही वजह है कि इस मामले को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। चुनाव आयोग को पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र की अंतिम मतदाता सूची की जांच करानी चाहिए। शिकायत करने वाले मतदाताओं के EPIC नंबर, नाम, पते और संबंधित रिकॉर्ड का मिलान होना चाहिए। यदि गड़बड़ी मिलती है, तो उसे समय रहते ठीक किया जाए और यह भी बताया जाए कि गलती कैसे हुई।
SIR के बाद भी सवाल, चुनाव आयोग को देना होगा जवाब
SIR जैसी व्यापक प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना है। ऐसे में अंतिम सूची प्रकाशित होने के बाद नामों की अदला-बदली की शिकायतें सामने आना प्रशासनिक व्यवस्था की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है। मतदाता को बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। यह चुनावी व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि मतदाता का सही नाम और पहचान रिकॉर्ड में सुरक्षित रहे।
यदि शिकायतों में दम है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। यह भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए कि कितने मतदाताओं ने नाम या पहचान संबंधी शिकायतें दर्ज कराई हैं, कितनी शिकायतों का निपटारा हुआ है और कितने मामलों में सुधार किया गया है। पारदर्शिता के बिना जनता का भरोसा कायम करना मुश्किल होगा।
2027 के चुनाव से पहले गड़बड़ी दूर करना जरूरी
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की शुद्धता बेहद महत्वपूर्ण है। किसी भी पात्र नागरिक का वोट केवल इसलिए प्रभावित नहीं होना चाहिए कि सरकारी रिकॉर्ड में उसका नाम गलत दर्ज हो गया। यदि पीलीभीत में नामों की अदला-बदली के दावे सही हैं, तो यह गंभीर चेतावनी है और तत्काल जांच की जरूरत है।
अब चुनाव आयोग के सामने सीधा सवाल है: क्या पीलीभीत की अंतिम मतदाता सूची में नाम और EPIC नंबर का सही मिलान हुआ है? यदि नहीं, तो गलती किसकी है और उसे ठीक करने की समयसीमा क्या होगी? इन सवालों पर चुप्पी या केवल औपचारिक जवाब पर्याप्त नहीं होगा। मतदाता का नाम, उसकी पहचान और उसका वोट लोकतंत्र की बुनियाद हैं। इनसे जुड़ी किसी भी गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच और समयबद्ध सुधार अनिवार्य है।



