मनोरंजन | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 22 अक्टूबर 2026
फिल्मों में कलाकारों की सहमति, उनकी निजी सीमाओं और पर्दे पर उनके चित्रण को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। अभिनेता विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना ने अपने शो ‘कॉफी विद करण 9’ में बताया कि कई बार कलाकार ऐसे कपड़े पहनने या सीन करने के दबाव में आ जाते हैं, जिनसे वे सहज नहीं होते। उनके मुताबिक, किसी कलाकार को अपनी असहजता जाहिर करने और किसी सीन के लिए मना करने की आजादी मिलनी चाहिए। ऐसा करने पर उसे गैर-पेशेवर समझे जाने का डर नहीं होना चाहिए।
यह चर्चा तेलुगु फिल्म ‘पेड्डी’ में जाह्नवी कपूर के किरदार को लेकर उठे विवाद के बीच हुई। फिल्म के कुछ दृश्यों में कैमरे के एंगल और एक ऐसे दृश्य को लेकर दर्शकों ने सवाल उठाए, जिसमें कहानी के अनुसार बिजली जाने के दौरान पुरुष किरदार महिला किरदार को उसकी सहमति के बिना चूमता है।
रश्मिका मंदाना ने बताई अपनी सीमाएं
करण जौहर से बातचीत में रश्मिका मंदाना ने कहा कि व्यावसायिक फिल्मों में कई बार ऐसे परिधान पहनने पड़ते हैं, जिनमें कलाकार पूरी तरह सहज महसूस नहीं करते। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें हर मांग स्वीकार करनी चाहिए।
रश्मिका ने कहा कि वह समझती हैं कि कुछ किरदारों के लिए विशेष तरह के कपड़ों की जरूरत हो सकती है, लेकिन शरीर को जरूरत से ज्यादा दिखाने वाले परिधानों को लेकर उनकी अपनी सीमाएं हैं।
उन्होंने बताया कि वह उन निर्देशकों के साथ काम करना पसंद करती हैं, जो कलाकार की असहजता को समझते हैं और उसकी सीमाओं का सम्मान करते हैं।
‘मुझे यह सीन नहीं करना’ कहना भी आसान नहीं
रश्मिका ने स्वीकार किया कि कई बार उन्हें भी अपनी बात रखने में मुश्किल होती है। उन्होंने बताया कि किसी सीन को लेकर असहज होने पर वह विजय से बात करती हैं और उनसे पूछती हैं कि क्या उन्हें अपनी बात स्पष्ट रूप से रखनी चाहिए।
रश्मिका के मुताबिक, कलाकारों के लिए ऐसा माहौल होना जरूरी है, जहां वे बिना डर के कह सकें कि वे कोई विशेष सीन नहीं करना चाहते। उन्होंने माना कि कई बार किसी चीज के लिए मना करने का फैसला लेने से पहले उन्हें भी काफी बातचीत और हिम्मत की जरूरत पड़ती है।
विजय देवरकोंडा ने भी कहा कि इस तरह की बातचीत करना आसान नहीं होता, यहां तक कि उन कलाकारों के लिए भी जो लंबे समय से फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं।
विजय बोले—‘ना’ कहने के लिए कलाकारों को सहारे की जरूरत
विजय ने कहा कि फिल्म साइन करने के बाद कलाकारों को कई बार यह महसूस कराया जाता है कि उन्हें तय की गई हर चीज स्वीकार करनी चाहिए, क्योंकि वह उनका काम है। ऐसे दबाव में कलाकार खुद पर सवाल उठाने लगते हैं कि कहीं किसी सीन से इनकार करना उनके गैर-पेशेवर होने का संकेत तो नहीं।
उन्होंने कहा कि कलाकारों के पास ऐसा सहयोगी माहौल और समर्थन होना चाहिए, जो उन्हें अपनी सीमाएं तय करने का भरोसा दे। यदि कोई कलाकार किसी दृश्य को लेकर असहज है, तो उसकी बात सुनी जानी चाहिए, न कि उसे अपने फैसले पर शर्मिंदा महसूस कराया जाना चाहिए।
रश्मिका ने उनकी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि कई बार कलाकार उस समय अपनी असहजता जाहिर नहीं कर पाते और बाद में उन्हें लगता है कि उन्हें उसी वक्त अपनी बात रख देनी चाहिए थी।
‘पेड्डी’ में जाह्नवी कपूर के चित्रण पर विवाद
राम चरण और जाह्नवी कपूर अभिनीत फिल्म ‘पेड्डी’ में जाह्नवी के किरदार अचियम्मा को पेश करने के तरीके पर दर्शकों ने सवाल उठाए थे। कुछ दृश्यों में कैमरे का ध्यान उनके शरीर के खास हिस्सों पर केंद्रित होने को लेकर आलोचना हुई।
एक अन्य दृश्य में पुरुष किरदार द्वारा बिना सहमति महिला किरदार को चूमने के चित्रण पर भी सवाल उठे। इसके बाद सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर बहस हुई कि फिल्मों में महिला किरदारों को किस तरह दिखाया जाता है और ऐसे दृश्यों में सहमति के महत्व को किस तरह प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
रिपोर्ट के अनुसार, जाह्नवी के कथित निजी संदेशों के स्क्रीनशॉट भी ऑनलाइन सामने आए, जिनमें उन्होंने कुछ खास कैमरा शॉट्स पर आपत्ति जताई थी। इन संदेशों की स्वतंत्र पुष्टि स्पष्ट नहीं है। फिल्म के निर्देशक बुच्ची बाबू सना ने विवाद के बाद माफी मांगी और दृश्यों में बदलाव करने का आश्वासन दिया।
कलाकार की सहमति भी पेशेवर सम्मान का हिस्सा
फिल्म निर्माण में निर्देशक की रचनात्मक सोच और कहानी की जरूरतें महत्वपूर्ण होती हैं। लेकिन कलाकार की सहमति, गरिमा और निजी सीमाओं का सम्मान भी उतना ही जरूरी है। किसी फिल्म को साइन करने का अर्थ यह नहीं कि कलाकार हर परिस्थिति में अपनी असहजता को नजरअंदाज करने के लिए बाध्य है।
विजय और रश्मिका की बातचीत ने इसी सवाल को सामने रखा है कि फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों के लिए अपनी बात कहना कितना सहज है। खासकर उन परिस्थितियों में, जहां किसी सीन से इनकार करने पर काम, छवि या भविष्य के अवसरों पर असर पड़ने का डर हो।
किसी कलाकार का ‘ना’ कहना अपने काम से पीछे हटना नहीं, बल्कि अपनी सीमाएं स्पष्ट करना भी हो सकता है। फिल्म की रचनात्मक जरूरतों और कलाकार की सहमति के बीच संतुलन बनाना ही एक जिम्मेदार और सम्मानजनक कार्यस्थल की पहचान है।


