[the_ad id="179"]
Home » Opinion » कब बाज आएंगे सुवेंदु अधिकारी? मां दुर्गा के नाम पर विवाद क्यों?

कब बाज आएंगे सुवेंदु अधिकारी? मां दुर्गा के नाम पर विवाद क्यों?

धार्मिक आस्था के नाम पर दूसरे धर्मों की पहचान को मुद्दा बनाने की जरूरत क्या है? प्रतिमाओं को छूने पर पाबंदी का निर्देश देने से पहले मुख्यमंत्री बताएं—आखिर शिकायत किससे है और समस्या क्या है?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 21 अक्टूबर 2026

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी का यह बयान कि हुगली नदी में दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन के दौरान उन्हें केवल सनातन धर्म के अनुयायी ही छू सकेंगे, कई सवाल खड़े करता है। धार्मिक परंपराओं का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस घोषणा की जरूरत क्यों पड़ी? क्या किसी सिख, मुस्लिम या ईसाई व्यक्ति द्वारा दुर्गा प्रतिमा को छूने को लेकर कोई विवाद सामने आया था? क्या किसी ने ऐसी शिकायत की थी? उपलब्ध जानकारी में ऐसी किसी घटना का उल्लेख नहीं है। फिर धार्मिक पहचान को लेकर इस तरह का निर्देश देने का औचित्य क्या है?

मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह समाज में शांति और विश्वास बनाए रखने वाली भाषा का इस्तेमाल करें। अगर कोई वास्तविक समस्या है, तो उसके तथ्य सामने रखे जाने चाहिए। बिना स्पष्ट वजह धार्मिक पहचान को मुद्दा बनाने से अनावश्यक संदेह और तनाव पैदा होने की आशंका रहती है।

प्रतिमा को छूने का सवाल या धार्मिक पहचान की राजनीति?

दुर्गा पूजा बंगाल की संस्कृति, परंपरा और आस्था का अभिन्न हिस्सा है। प्रतिमाओं को उठाने, जुलूस में ले जाने और विसर्जन करने की जिम्मेदारी आयोजन समितियां अपनी धार्मिक परंपराओं और व्यवस्थाओं के अनुसार तय कर सकती हैं। यदि इसके लिए कोई विशेष नियम है, तो उसे स्पष्ट रूप से समझाया जाना चाहिए।

लेकिन धार्मिक आयोजन की व्यवस्था और दूसरे धर्मों के लोगों को संदेह की नजर से देखने में फर्क है। मुख्यमंत्री को बताना चाहिए कि उनका निर्देश किसी खास धार्मिक परंपरा पर आधारित है, किसी प्रशासनिक जरूरत से जुड़ा है या किसी विशेष घटना के बाद दिया गया है। बिना यह स्पष्ट किए धार्मिक पहचान पर जोर देने से सवाल उठना स्वाभाविक है।

मां दुर्गा के सामने सिर झुकाने के लिए धर्म की जांच क्यों?

बहुत-से श्रद्धालु मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं, जबकि प्रतिमा को उठाने और विसर्जन के लिए ले जाने का काम कुछ निर्धारित लोग करते हैं। पूजा करने और प्रतिमा को छूने की जिम्मेदारी निभाने में अंतर है। हर व्यक्ति का पूजा करने का तरीका भी एक जैसा नहीं होता।

ऐसे में यदि कोई सिख, मुस्लिम या ईसाई व्यक्ति मां दुर्गा के प्रति सम्मान जताते हुए दूर से प्रणाम करता है, तो उससे किसी की आस्था को क्या नुकसान पहुंचता है? किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति का श्रद्धापूर्वक सिर झुकाना अपने आप में विवाद का विषय क्यों बने?

यह कहना भी सही नहीं होगा कि सभी हिंदू श्रद्धालु प्रतिमाओं से दूर रहकर ही पूजा करते हैं। पूजा-पद्धतियां और परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं। लेकिन इतना जरूर है कि किसी की धार्मिक पहचान के आधार पर उसकी श्रद्धा को संदेह की नजर से देखना उचित नहीं।

भगदड़ में 19 मौतें हुईं, प्राथमिकता सुरक्षा होनी चाहिए

कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ के दौरान 19 लोगों की मौत और 25 लोगों के घायल होने की खबर बेहद दुखद है। ऐसे हादसे के बाद प्रशासन की प्राथमिकता भीड़ को नियंत्रित करना, घाटों पर सुरक्षित व्यवस्था करना, बचाव दल तैनात रखना और विसर्जन के दौरान लोगों की जान की रक्षा करना होनी चाहिए।

अगर प्रतिमाओं को उठाने या विसर्जन के दौरान कोई वास्तविक समस्या है, तो प्रशासन उसके समाधान के लिए स्पष्ट नियम बना सकता है। लेकिन मुख्यमंत्री को यह भी बताना चाहिए कि धार्मिक पहचान पर आधारित निर्देश से कौन-सी समस्या हल होगी और उसका आधार क्या है।

धर्म के नाम पर सवाल उठाना आसान, जवाब देना भी जरूरी

सुवेंदु अधिकारी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि प्रतिमाओं को छूने को लेकर उनका निर्देश किस आधार पर है। यदि कोई घटना हुई है, तो उसके तथ्य सामने रखे जाएं। यदि यह धार्मिक परंपरा का मामला है, तो उसका संदर्भ बताया जाए। और यदि यह प्रशासनिक व्यवस्था है, तो उसे सुरक्षा और जिम्मेदारी के नजरिए से समझाया जाए।

मां दुर्गा के नाम पर विवाद खड़ा करने से उनकी आस्था मजबूत नहीं होती। धार्मिक परंपराओं का पालन और दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान साथ-साथ चल सकते हैं। किसी भी मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी है कि वह लोगों को जोड़े, न कि बिना स्पष्ट कारण ऐसा संदेश दे जिससे धार्मिक पहचान के आधार पर दूरी बढ़ने की आशंका हो।

सुवेंदु अधिकारी से सीधा सवाल है—आखिर समस्या क्या है, शिकायत किससे है और इस घोषणा की जरूरत क्यों पड़ी? जनता को नारों और बयानों से ज्यादा स्पष्ट तथ्यों और जिम्मेदार नेतृत्व की जरूरत है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *