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शेयर बाजार में ₹39 लाख करोड़ की चोट, महंगाई की मार से आम आदमी परेशान—आखिर अर्थव्यवस्था किस दिशा में?

ओपिनियन/ व्यापार | प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | नई दिल्ली | 2 अक्टूबर 2026

शेयर बाजार में बड़ी गिरावट, निवेशकों की संपत्ति पर असर

भारत की अर्थव्यवस्था इस समय एक अजीब दबाव से गुजर रही है। एक तरफ रोजमर्रा की चीजों की कीमतें बढ़ रही हैं, दूसरी तरफ शेयर बाजार में बड़ी गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। जनवरी से सितंबर 2026 के बीच भारतीय शेयर बाजार के कुल बाजार पूंजीकरण में अनुमानित ₹39 लाख करोड़ की कमी आई है। इसका मतलब यह नहीं है कि अर्थव्यवस्था से ₹39 लाख करोड़ नकद गायब हो गए हैं। इसका अर्थ है कि शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों की बाजार कीमत और उनके शेयर रखने वालों की संपत्ति के अनुमानित मूल्य में इतनी बड़ी गिरावट आई है। लेकिन आम आदमी के लिए इसका असर केवल कागज पर नहीं है। जिन लोगों का पैसा म्यूचुअल फंड, शेयर या रिटायरमेंट से जुड़े निवेश में लगा है, उनकी संपत्ति का मूल्य घटा है। कंपनियों के लिए पूंजी जुटाना महंगा हो सकता है और नए निवेश के फैसले भी प्रभावित हो सकते हैं।

सितंबर में बाजार पर सबसे ज्यादा दबाव

सितंबर शेयर बाजार के लिए खासा मुश्किल महीना रहा। 30 सितंबर तक निफ्टी 50 करीब 6.1 प्रतिशत गिरकर 22,620.45 पर पहुंच गया, जबकि सेंसेक्स 5.8 प्रतिशत गिरकर 72,480.29 पर बंद हुआ। दोनों सूचकांकों में मार्च के बाद यह सबसे बड़ी मासिक गिरावट बताई गई। इस दौरान विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से करीब 2.7 अरब डॉलर निकाले। इससे 2026 में विदेशी निवेशकों की कुल शुद्ध निकासी लगभग 26.8 अरब डॉलर तक पहुंच गई। यह आंकड़ा बताता है कि भारतीय बाजार पर केवल घरेलू घटनाओं का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में बदल रही आर्थिक परिस्थितियों का भी दबाव है।

महंगा तेल भारत के लिए बड़ी चिंता

भारत अपनी जरूरत के बड़े हिस्से के लिए कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो उसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन महंगा होता है, माल ढुलाई की लागत बढ़ती है और फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाले कई कच्चे माल की कीमत बढ़ सकती है। सितंबर में पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अनिश्चितता के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 14 प्रतिशत बढ़ी और महीने के अंत तक यह लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर बनी रही। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति आयात बिल, व्यापार संतुलन और महंगाई—तीनों पर दबाव डाल सकती है।

कमजोर रुपया बढ़ा सकता है महंगाई का दबाव

तेल के साथ रुपये की कमजोरी भी चिंता बढ़ाती है। 1 अक्टूबर को रुपया 96.31 रुपये प्रति डॉलर तक कमजोर हुआ। जब रुपया कमजोर होता है, तो डॉलर में खरीदी जाने वाली वस्तुओं के लिए भारत को ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं। तेल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लेकिन असर यहीं खत्म नहीं होता। रसायन, उर्वरक, इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी और कई औद्योगिक कच्चे माल के आयात की लागत भी बढ़ सकती है। कंपनियां अगर यह बढ़ी हुई लागत ग्राहकों तक पहुंचाती हैं तो वस्तुओं की कीमत बढ़ सकती है। अगर वे कीमत नहीं बढ़ातीं तो उनके मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। यानी कमजोर रुपया आम आदमी और कारोबार—दोनों के लिए चुनौती बन सकता है।

महंगाई के सरकारी आंकड़े और जमीन पर महसूस होने वाली महंगाई

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अगस्त में खुदरा महंगाई 4.82 प्रतिशत रही। लेकिन आम परिवार की परेशानी केवल इस एक आंकड़े से पूरी तरह नहीं समझी जा सकती। परिवार अपने बजट में आटा, दाल, सब्जी, दूध, ईंधन, परिवहन, शिक्षा और दूसरी जरूरी चीजों का खर्च देखता है। किसी एक वस्तु की कीमत में तेज वृद्धि भी परिवार के बजट को प्रभावित कर सकती है। इसी तरह थोक महंगाई अगस्त में 9.92 प्रतिशत तक पहुंची, जिसमें ईंधन और बिजली की कीमतों का भी योगदान रहा। इसका मतलब यह हो सकता है कि कंपनियों की लागत पर दबाव उपभोक्ता कीमतों की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है और उसका कुछ असर आगे चलकर दिखाई दे सकता है।

पकौड़े और समोसे की कीमत का उदाहरण क्यों महत्वपूर्ण है?

पकौड़े की कीमत में करीब 40 प्रतिशत और समोसे की कीमत में लगभग 33 प्रतिशत वृद्धि का उदाहरण इस बहस को आम आदमी की भाषा में समझाता है। यह केवल पकौड़े या समोसे की कहानी नहीं है। इनके पीछे तेल, आटा, सब्जी, गैस, बिजली, किराया, मजदूरी और परिवहन जैसे कई खर्च जुड़े हैं। जब इनपुट लागत बढ़ती है तो छोटी दुकान से लेकर बड़े उद्योग तक सभी पर असर पड़ता है। यही वजह है कि महंगाई को केवल सरकारी आंकड़ों से नहीं, बल्कि परिवारों की वास्तविक खरीद क्षमता से भी समझना जरूरी है। यदि आमदनी उसी गति से नहीं बढ़ती जिस गति से जरूरी खर्च बढ़ रहे हैं, तो व्यक्ति की वास्तविक क्रय शक्ति कम हो जाती है।

विदेशी निवेशक पैसा क्यों निकाल रहे हैं?

विदेशी निवेशकों का पैसा भारत से निकलना केवल भारत की किसी एक समस्या का परिणाम नहीं है। अमेरिका में ब्याज दरों और बॉन्ड यील्ड में बदलाव भी दुनिया भर के निवेश को प्रभावित करते हैं। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5.34 प्रतिशत तक पहुंची, जो 2002 के बाद का ऊंचा स्तर बताया गया। जब अमेरिका जैसे बाजार में सुरक्षित माने जाने वाले डॉलर आधारित निवेश पर ज्यादा रिटर्न मिलने लगे तो उभरते बाजारों से कुछ पूंजी बाहर जाना स्वाभाविक दबाव पैदा कर सकता है। इसके अलावा पश्चिम एशिया का तनाव, तेल की कीमत, रुपये की कमजोरी और भारतीय शेयरों के अपेक्षाकृत ऊंचे मूल्यांकन ने भी निवेशकों के जोखिम को बढ़ाया है।

केवल विदेशी निवेशकों को दोष देना सही तस्वीर नहीं

शेयर बाजार की गिरावट को केवल विदेशी निवेशकों की बिकवाली से समझना भी अधूरा होगा। भारतीय शेयरों के कुछ हिस्सों में पहले से मूल्यांकन काफी ऊंचा था। ऐसे बाजार में जब वैश्विक ब्याज दरें बढ़ें, तेल महंगा हो और भू-राजनीतिक तनाव बढ़े, तो निवेशक मुनाफा निकालने लगते हैं। सितंबर में Reuters के बाजार आकलन के अनुसार सभी 16 प्रमुख सेक्टरों में गिरावट दर्ज की गई। आईटी सेक्टर करीब 11.2 प्रतिशत गिरा। इसका संबंध अमेरिकी ग्राहकों की मांग और टेक कंपनियों के खर्च को लेकर बढ़ी चिंताओं से भी जोड़ा गया। मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों में भी गिरावट आई। यानी दबाव केवल कुछ बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहा।

शेयर बाजार गिरना मतलब अर्थव्यवस्था खत्म होना नहीं

यह बात समझना भी जरूरी है कि शेयर बाजार में गिरावट और पूरी अर्थव्यवस्था के कमजोर होने को एक ही चीज नहीं माना जा सकता। शेयर बाजार भविष्य की कमाई, ब्याज दरों, निवेशकों की उम्मीदों और वैश्विक परिस्थितियों को भी कीमतों में शामिल करता है। किसी कंपनी का शेयर गिरने का मतलब यह जरूरी नहीं कि कंपनी बंद होने वाली है। उसी तरह शेयर बाजार का रिकॉर्ड स्तर पर होना भी भविष्य में मुनाफे की गारंटी नहीं देता। सितंबर में भारत का मैन्युफैक्चरिंग PMI 55.1 रहा, यानी औद्योगिक गतिविधि पूरी तरह ठप होने की तस्वीर नहीं दिखती। लेकिन इसकी रफ्तार और आगे की दिशा पर नजर रखना जरूरी है।

आम परिवार पर दो तरफ से दबाव

सबसे बड़ी चिंता उस परिवार की है जिसे एक साथ दो तरफ से दबाव झेलना पड़ रहा है। एक तरफ रोजमर्रा की चीजों का खर्च बढ़ रहा है और दूसरी तरफ अगर उसकी बचत शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड से जुड़ी है तो निवेश का मूल्य घट सकता है। जिन परिवारों के पास शेयर बाजार में पैसा नहीं है, वे भी महंगाई से बच नहीं सकते। उनके लिए तो बढ़ती कीमतों का सीधा अर्थ है कि उसी आय में कम सामान खरीदना। अगर वेतन और रोजगार की स्थिति कीमतों के साथ नहीं बढ़ती, तो परिवार को बचत कम करनी पड़ सकती है, खर्च घटाना पड़ सकता है या कर्ज पर निर्भरता बढ़ सकती है।

सरकार के सामने चुनौती केवल महंगाई रोकना नहीं

सरकार के सामने चुनौती अब केवल महंगाई का एक आंकड़ा नीचे लाने की नहीं है। चुनौती यह है कि तेल के बाहरी झटके, रुपये की कमजोरी, विदेशी पूंजी की निकासी और शेयर बाजार की गिरावट एक-दूसरे को प्रभावित करके घरेलू अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव न बना दें। इसके लिए महंगाई पर भरोसेमंद नियंत्रण, कर और नियमन में स्थिरता, समझदारी वाला सरकारी खर्च और ऐसे कदम जरूरी हैं जो उत्पादन तथा रोजगार को मजबूत करें। कमजोर वर्गों को राहत देना भी जरूरी है, लेकिन ऐसी नीतियों का खर्च कितना होगा और लंबे समय में उसका बोझ किस पर पड़ेगा, इसका भी हिसाब रखना होगा।

तेल पर निर्भरता कम करना होगा

भारत के लिए सबसे बड़ी लंबी अवधि की चुनौतियों में ऊर्जा सुरक्षा शामिल है। दुनिया में कहीं भी बड़ा तनाव होता है और तेल की आपूर्ति या कीमत प्रभावित होती है, तो उसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पहुंचता है। इसलिए सार्वजनिक परिवहन को बेहतर करना, ऊर्जा की बचत बढ़ाना, ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना और घरेलू उत्पादन को मजबूत करना महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन ऊर्जा बदलाव इतना महंगा भी नहीं होना चाहिए कि उसका बोझ सीधे आम परिवार पर आ जाए। आर्थिक नीति की असली परीक्षा यही है कि बदलाव भी हो और उसका खर्च समाज के कमजोर वर्ग पर disproportionate तरीके से न पड़े।

असली सवाल ₹39 लाख करोड़ नहीं, उसका आगे का असर है

₹39 लाख करोड़ का आंकड़ा बहुत बड़ा दिखाई देता है, लेकिन असली सवाल केवल यह नहीं है कि शेयर बाजार का कितना मूल्य घटा। असली सवाल यह है कि इसका असर आगे निवेश, रोजगार, वेतन और खपत पर कितना पड़ता है। यदि बाजार की गिरावट केवल वित्तीय सुधार तक सीमित रहती है तो उसका असर एक तरह का होगा। लेकिन अगर कंपनियों की लागत बढ़ती है, मुनाफा घटता है, निवेश रुकता है और रोजगार पर दबाव आता है, तो तस्वीर कहीं ज्यादा गंभीर हो सकती है।

अब जरूरत साफ और ईमानदार आर्थिक जवाब की

भारत की अर्थव्यवस्था के सामने इस समय कई दबाव एक साथ मौजूद हैं—महंगा कच्चा तेल, कमजोर रुपया, विदेशी पूंजी की निकासी, ऊंची इनपुट लागत और शेयर बाजार में गिरावट। इनमें से किसी एक को अलग करके देखने से पूरी तस्वीर समझ में नहीं आएगी। महंगा तेल आयात बिल बढ़ाता है, कमजोर रुपया आयात को और महंगा करता है, बढ़ी लागत कंपनियों के मुनाफे पर असर डाल सकती है, कमजोर मुनाफे की उम्मीद शेयर बाजार को दबा सकती है और बाजार की कमजोरी निवेशकों के भरोसे को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए आज सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि सेंसेक्स कल कितना ऊपर जाएगा या निफ्टी कितना नीचे जाएगा। असली सवाल यह है कि आम आदमी की जेब कितनी सुरक्षित रहेगी, रोजगार कितना मजबूत रहेगा, निवेश कितना बढ़ेगा और महंगाई के बीच परिवार की खरीदने की क्षमता कितनी बची रहेगी। वैश्विक संकट हमेशा भारत के नियंत्रण में नहीं होते, लेकिन उनके असर को कम करने वाली नीतियां भारत के अपने हाथ में जरूर होती हैं। यही वह जगह है जहां आर्थिक नीति की असली परीक्षा होती है।

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