राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 सितंबर 2026
संसद में विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच बोलने के समय को लेकर चल रही बहस के बीच अब सत्तारूढ़ NDA के भीतर से भी एक महत्वपूर्ण आवाज सामने आई है। केंद्रीय मंत्री और हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) के प्रमुख जीतन राम मांझी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर कहा है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से आने वाले सांसदों को महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा के दौरान अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल रहा है।
जीतन राम मांझी ने अपने पत्र में उस चिंता को सामने रखा है, जो एक BJP सांसद ने NDA सांसदों की बैठक के दौरान उठाई थी। मांझी ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए इसे लोकसभा अध्यक्ष के सामने रखा। उनका कहना है कि SC और ST समुदायों से आने वाले सांसदों को संसद में महत्वपूर्ण मुद्दों और विधेयकों पर बोलने के लिए पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
मांझी खुद NDA के सहयोगी दल के प्रमुख हैं और केंद्र सरकार में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री हैं। ऐसे में उनकी ओर से लोकसभा अध्यक्ष को सीधे पत्र लिखना इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाता है। यह शिकायत विपक्ष की ओर से नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ गठबंधन के एक वरिष्ठ सहयोगी की ओर से सामने आई है।
सवाल केवल बोलने के समय का नहीं है। संसद में किसी सांसद को किसी महत्वपूर्ण विधेयक पर अपनी बात रखने का कितना अवसर मिलता है, यह सीधे संसदीय प्रतिनिधित्व से जुड़ा मुद्दा है। खासकर SC और ST समुदायों से आने वाले सांसदों के मामले में यह सवाल और संवेदनशील हो जाता है, क्योंकि उनके जरिए बड़ी आबादी की आवाज संसद में पहुंचती है।
मांझी ने अपने पत्र में यह चिंता ऐसे समय जताई है जब संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों और नीतिगत मुद्दों पर लगातार चर्चा हो रही है। ऐसे में यदि किसी वर्ग के सांसदों को पर्याप्त समय नहीं मिलता, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि संसद में सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का समान अवसर किस तरह सुनिश्चित किया जाए।
इस मामले की खास बात यह है कि शिकायत NDA सांसदों की बैठक में उठी और उसके बाद मांझी ने इसे औपचारिक रूप से लोकसभा अध्यक्ष तक पहुंचाया। यानी यह केवल विपक्ष और सरकार के बीच टकराव का मुद्दा नहीं रह गया है। सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर भी यह सवाल उठ रहा है कि संसद की कार्यवाही में अलग-अलग सामाजिक समूहों से आने वाले सांसदों को अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त समय मिल रहा है या नहीं।
जीतन राम मांझी लंबे समय से दलित और वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक बहस में उठाते रहे हैं। अब संसद के भीतर SC और ST सांसदों को बोलने का पर्याप्त समय नहीं मिलने की शिकायत सामने रखकर उन्होंने संसदीय प्रक्रिया के एक ऐसे पहलू पर ध्यान खींचा है, जो अक्सर विधेयकों और राजनीतिक टकराव की खबरों के बीच पीछे छूट जाता है।
लोकसभा अध्यक्ष को भेजे गए इस पत्र के बाद अब निगाह इस बात पर रहेगी कि इस शिकायत पर क्या व्यवस्था बनाई जाती है। क्या SC और ST सांसदों को महत्वपूर्ण विधेयकों पर बोलने के लिए अतिरिक्त या सुनिश्चित समय दिया जाएगा? क्या सभी दलों के सांसदों के लिए बोलने के समय के बंटवारे की प्रक्रिया में कोई बदलाव होगा? और क्या NDA के भीतर उठी इस चिंता पर संसद में कोई ठोस पहल होगी?
मांझी की शिकायत ने संसद के भीतर प्रतिनिधित्व के एक सीधे सवाल को सामने ला दिया है—सांसद चुनकर संसद तक पहुंचना एक बात है, लेकिन उन्हें अपनी बात पूरी ताकत और पर्याप्त समय के साथ सदन में रखने का अवसर मिलना दूसरी। अब यह सवाल लोकसभा अध्यक्ष के सामने है कि संसद में SC और ST सांसदों की आवाज को पर्याप्त समय और स्थान कैसे दिया जाए।



