राष्ट्रीय/ ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 सितंबर 2026
इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों का खुलासा हुआ और उसके ठीक बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। दिल्ली के वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ स्वतंत्र जांच, SIT और कानूनी कार्रवाई की मांग की है। याचिका में उन फैसलों, दिशा-निर्देशों और सॉफ्टवेयर बदलावों की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं, जिन्हें याचिकाकर्ता के अनुसार पूरी चुनाव आयोग की सहमति के बिना शुरू या लागू किया गया।
लेकिन कहानी सिर्फ ज्ञानेश कुमार की नहीं है। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है। अगर एक CEC चला भी जाता है तो क्या चुनावी व्यवस्था बदल जाएगी? क्या ECINet और ERONet की कार्यप्रणाली बदल जाएगी? क्या Form 6 में किए गए बदलाव वापस होंगे? क्या SIR में मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच होगी? और क्या उन लोगों की जवाबदेही तय होगी जिनके फैसलों से यह पूरी व्यवस्था आगे बढ़ी? यही वजह है कि राहुल गांधी लगातार इस मुद्दे को किसी एक अधिकारी तक सीमित करने के बजाय सत्ता के शीर्ष स्तर तक ले जा रहे हैं।
24 सितंबर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने अमित शाह का वीडियो चलाकर चुनावी प्रक्रिया को लेकर सीधे उन पर निशाना साधा। राहुल गांधी ने कहा कि मामला केवल CEC ज्ञानेश कुमार तक सीमित नहीं है और उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सीधे सवाल उठाए। उन्होंने ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा देने और बाद में ‘अप्रूवर’ बनने की मांग भी की। राहुल गांधी के अनुसार अगर चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो जांच सिर्फ चुनाव आयोग के अधिकारी तक रुकनी नहीं चाहिए, बल्कि उस पूरी राजनीतिक और प्रशासनिक श्रृंखला तक जानी चाहिए जहां से फैसले प्रभावित हुए।
राहुल गांधी ने इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने पुराने ‘वोट चोरी’ आरोपों को दोहराते हुए कहा कि मामला ‘वोट चोरी’ से आगे ‘कानून चोरी’ और ‘संस्था चोरी’ तक पहुंच गया है। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव और कई विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। यह राहुल गांधी और विपक्ष के राजनीतिक आरोप हैं, लेकिन अब इन आरोपों की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग के भीतर दर्ज दस्तावेजी आपत्तियां और सुप्रीम कोर्ट में दाखिल नई याचिका भी बहस का हिस्सा बन गई हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के भीतर विभिन्न फैसलों पर आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, SIR से जुड़ी प्रक्रिया, अपीलों और चुनावी सॉफ्टवेयर तक पहुंच जैसे मुद्दों से था। कुछ मामलों में आपत्तियों में फैसलों को ‘अनधिकृत’ और ‘गैरकानूनी’ बताया गया।
सबसे गंभीर सवाल चुनावी सॉफ्टवेयर को लेकर है। याचिका में ECINet और ERONet का तकनीकी, फॉरेंसिक और प्रशासनिक ऑडिट कराने की मांग की गई है। ERONet लंबे समय से मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया में इस्तेमाल होता रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार दोनों चुनाव आयुक्तों ने डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीकरण और सॉफ्टवेयर तक राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच से जुड़े सवाल उठाए थे। ऐसे में सवाल सीधा है—मतदाता सूची का अंतिम नियंत्रण किसके हाथ में है और सॉफ्टवेयर के भीतर लिए गए फैसलों की जवाबदेही किसकी है?
Form 6 का विवाद भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यही फॉर्म किसी वयस्क को नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने के लिए इस्तेमाल होता है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक विवेक जोशी ने Form 6 में बदलाव को लेकर सवाल उठाया था और कहा था कि नियम बदले बिना ऐसा बदलाव नहीं होना चाहिए। बाद में सुखबीर संधू ने भी इस बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज की। अब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में भी Form 6 से जुड़े बदलावों को जांच के दायरे में लाने की मांग की गई है।
SIR का आंकड़ा इस पूरे विवाद को और बड़ा बना देता है। 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट मतदाता सूची से करीब 13 करोड़ नाम बाहर किए जाने की प्रक्रिया को लेकर याचिका में तकनीकी और प्रशासनिक जांच की मांग की गई है। यहां यह फर्क महत्वपूर्ण है कि ड्राफ्ट सूची से नाम बाहर होना हर मामले में अंतिम रूप से मतदाता सूची से नाम हटना नहीं है। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर नामों के बाहर होने के बाद सत्यापन, अपील, सॉफ्टवेयर और अधिकारियों के फैसलों की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक रूप से इस विवाद का केंद्रीय हिस्सा बन गया है।
गोवा का 97 मतदाताओं वाला मामला इस सवाल को और तीखा करता है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार इन मतदाताओं को संबंधित ERO ने शामिल किए जाने योग्य माना था, लेकिन सॉफ्टवेयर में उस फैसले को लागू करने से जुड़ी समस्या सामने आई और ये नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके। याचिका में ऐसे तकनीकी मामलों की फॉरेंसिक जांच की मांग इसलिए की गई है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि चुनावी फैसले अधिकारियों के हाथ में हैं या सॉफ्टवेयर की संरचना भी वास्तविक निर्णय को प्रभावित कर रही है।
याचिका में ज्ञानेश कुमार के अलावा वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग, सूचना प्रौद्योगिकी महानिदेशक सीमा खन्ना और अन्य संबंधित अधिकारियों के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत शिकायत दर्ज कराने और जांच के बाद कार्रवाई की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग या SIT बनाने की मांग भी की है। यानी अब सवाल सिर्फ चुनाव आयोग के अंदर उठी आपत्तियों का नहीं रहा; मांग यह है कि उन आपत्तियों की स्वतंत्र जांच हो और जिम्मेदारी तय की जाए।
और यहीं राहुल गांधी की राजनीति का वह हिस्सा सामने आता है जहां ज्ञानेश कुमार सिर्फ एक नाम बनकर रह जाते हैं। राहुल गांधी का सवाल है कि अगर चुनावी व्यवस्था में गड़बड़ी है तो केवल CEC को हटाने से क्या होगा? कौन अधिकारी अगली कुर्सी पर आएगा, यह उससे बड़ा सवाल है कि किस व्यवस्था के तहत वह अधिकारी काम करेगा। अगर वही सॉफ्टवेयर रहेगा, वही डेटाबेस रहेगा, वही प्रक्रिया रहेगी और वही राजनीतिक नियंत्रण रहेगा, तो केवल चेहरा बदलने से चुनावी व्यवस्था को लेकर उठे सवाल खत्म नहीं होंगे।
राहुल गांधी ने अमित शाह का वीडियो चलाकर जिस तरह सीधे गृह मंत्री को निशाने पर लिया, उससे यह साफ है कि उनका राजनीतिक आरोप चुनाव आयोग की सीमा पर रुकता नहीं है। विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी अमित शाह और ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। लेकिन अब इस राजनीतिक आरोप का असली परीक्षण दस्तावेजों, जांच और न्यायिक प्रक्रिया में होगा—किसने क्या फैसला लिया, किसके आदेश पर लिया, किस सॉफ्टवेयर में क्या बदलाव हुआ, किस अधिकारी ने आपत्ति की और उन आपत्तियों के बाद क्या हुआ।
इस पूरे विवाद में एक और सवाल बेहद अहम है—क्या ज्ञानेश कुमार सिर्फ चेहरा हैं या निर्णयों की पूरी श्रृंखला उन्हीं तक जाती है? अगर जिम्मेदारी सिर्फ एक अधिकारी तक सीमित कर दी जाती है तो उन सभी स्तरों की जांच कौन करेगा जहां चुनावी डेटा, सॉफ्टवेयर, मतदाता सूची और प्रशासनिक निर्देश तैयार होते हैं? और अगर राहुल गांधी के आरोपों में सत्ता के शीर्ष स्तर की भूमिका का सवाल उठाया जा रहा है, तो क्या उस सवाल का जवाब भी किसी स्वतंत्र जांच में तलाशा जाएगा?
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने ECINet, ERONet, Form 6, SIR, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया जैसे कई बड़े सवाल एक साथ हैं। याचिका में इन्हीं मुद्दों को लेकर SIT और फॉरेंसिक ऑडिट की मांग की गई है। आगे अदालत इस याचिका पर क्या आदेश देती है, यह अभी सामने आना बाकी है। लेकिन राजनीतिक बहस अब एक बिंदु पर आकर टिक गई है—मुद्दा सिर्फ ज्ञानेश कुमार को हटाने का नहीं, बल्कि यह पता लगाने का है कि चुनावी व्यवस्था में फैसले आखिर कौन ले रहा है और उसकी जवाबदेही किसकी है।



