टेक्नोलॉजी/डिजिटल सुरक्षा | ABC NATIONAL NEWS | कैनबरा | 11 सितंबर 2026
एल्गोरिदम के कब्जे से यूजर को मिलेगी आजादी? ऑस्ट्रेलिया ला रहा नया कानून
सोशल मीडिया पर आप जो वीडियो, पोस्ट और खबरें देखते हैं, उनमें से बहुत कुछ आपके हाथ में नहीं होता। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम आपके पुराने व्यवहार, पसंद और क्लिक के आधार पर तय करता है कि अगली बार आपकी स्क्रीन पर क्या दिखाई देगा। अब ऑस्ट्रेलिया इस व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रहा है। सरकार की योजना है कि सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले लोगों को एल्गोरिदम से चलने वाली फीड से बाहर निकलने का विकल्प दिया जाए। यानी यूजर के पास यह चुनने की ताकत होगी कि उसे प्लेटफॉर्म द्वारा चुनी गई सामग्री दिखे या वह अपनी फीड को किसी दूसरे तरीके से देखना चाहता है।
डिजिटल ड्यूटी ऑफ केयर कानून का प्रस्ताव
ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने मंगलवार, 8 सितंबर 2026 को अपने प्रस्तावित डिजिटल ड्यूटी ऑफ केयर कानून का मसौदा जारी किया है। फिलहाल इस पर संबंधित पक्षों से राय ली जा रही है। सरकार का कहना है कि सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी केवल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें अपने यूजर्स के लिए सुरक्षित ऑनलाइन वातावरण बनाने के लिए भी कदम उठाने चाहिए।
हालांकि, इस कानून का अंतिम रूप अभी सामने नहीं आया है। सरकार की सलाह-मशविरा प्रक्रिया पूरी होने और संसद में कानून पेश होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि एल्गोरिदम से बाहर निकलने का विकल्प वास्तव में कैसा दिखाई देगा और यूजर को कितनी आजादी मिलेगी।
एल्गोरिदम आखिर करता क्या है?
आज फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, यूट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यूजर को हर पोस्ट एक जैसे क्रम में नहीं दिखाई जाती। सिस्टम यह समझने की कोशिश करता है कि व्यक्ति किस तरह की सामग्री ज्यादा देखता है, किस पोस्ट पर रुकता है, किसे लाइक या शेयर करता है और किन विषयों पर ज्यादा प्रतिक्रिया देता है। इसके बाद उसी तरह की सामग्री ज्यादा दिखाई जाने लगती है।
इसका फायदा यह है कि यूजर को उसकी पसंद की सामग्री जल्दी मिल जाती है। लेकिन समस्या यह भी है कि व्यक्ति एक ही तरह की सामग्री के घेरे में फंस सकता है। अगर कोई लगातार गुस्सा पैदा करने वाली, सनसनीखेज या विवादित सामग्री देखता है, तो एल्गोरिदम उसे वैसी ही और सामग्री दिखा सकता है। यही वजह है कि दुनिया भर में सोशल मीडिया एल्गोरिदम के प्रभाव को लेकर बहस बढ़ रही है।
ऑस्ट्रेलिया का सवाल—फैसला मशीन करेगी या इंसान?
ऑस्ट्रेलिया का प्रस्ताव इसी मूल सवाल को सामने लाता है—आखिर सोशल मीडिया पर यूजर क्या देखे, इसका फैसला यूजर करेगा या कंपनी का एल्गोरिदम?
सरकार का तर्क है कि लोगों को अपनी ऑनलाइन दुनिया पर ज्यादा नियंत्रण मिलना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति एल्गोरिदम द्वारा चुनी गई फीड नहीं चाहता, तो उसके पास दूसरा विकल्प होना चाहिए। इससे यूजर को यह तय करने की ज्यादा स्वतंत्रता मिल सकती है कि वह सोशल मीडिया पर जानकारी किस तरीके से देखना चाहता है।
सोशल मीडिया कंपनियों पर बढ़ेगी जिम्मेदारी
इस प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी से जुड़ा है। सरकार चाहती है कि कंपनियां ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर ज्यादा जवाबदेह हों। यानी अगर किसी प्लेटफॉर्म की तकनीक लोगों को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री की तरफ लगातार धकेलती है, तो कंपनी से यह सवाल पूछा जा सके कि उसने उसे रोकने के लिए क्या किया।
हालांकि, यहां सबसे बड़ी चुनौती भी यही है कि सुरक्षित इंटरनेट और व्यक्तिगत आजादी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। सरकार अगर बहुत ज्यादा नियंत्रण लगाएगी तो अभिव्यक्ति की आजादी पर सवाल उठ सकते हैं, और अगर कंपनियों को पूरी छूट दी गई तो यूजर की सुरक्षा और निजता प्रभावित हो सकती है।
क्या दूसरे देश भी ऑस्ट्रेलिया का रास्ता अपनाएंगे?
ऑस्ट्रेलिया का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सोशल मीडिया अब सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं है। लोग इसी के जरिए समाचार, राजनीति, शिक्षा, कारोबार और सार्वजनिक बहस से जुड़ते हैं। ऐसे में यह तय करना कि कौन-सी जानकारी किस व्यक्ति तक पहुंचेगी, एक बड़ा सामाजिक और लोकतांत्रिक सवाल बन चुका है।
अभी ऑस्ट्रेलिया का प्रस्ताव कानून नहीं बना है। आगे होने वाली सलाह-मशविरा प्रक्रिया और संसद में पेश होने वाले अंतिम विधेयक से इसकी वास्तविक तस्वीर साफ होगी।
लेकिन सवाल बड़ा है—अगर सोशल मीडिया का एल्गोरिदम हर दिन यह तय कर रहा है कि करोड़ों लोग क्या देखें, क्या पढ़ें और किस मुद्दे पर ध्यान दें, तो उस फैसले पर यूजर का नियंत्रण कितना होना चाहिए? क्या ऑस्ट्रेलिया का यह प्रयोग दुनिया के दूसरे देशों को भी सोशल मीडिया एल्गोरिदम पर नए नियम बनाने के लिए मजबूर करेगा?



