अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | मैगडेबर्ग | 8 सितंबर 2026
जर्मनी की राजनीति में बड़ा भूचाल
जर्मनी के पूर्वी राज्य सैक्सोनी-आनहाल्ट के चुनाव परिणाम ने देश की राजनीति को हिला दिया है। दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी ने 43.8% वोट हासिल कर ऐतिहासिक बढ़त बनाई है और 83 सदस्यीय विधानसभा में करीब 39 सीटों पर पहुंच रही है। पूर्ण बहुमत के लिए उसे 42 सीटों की जरूरत है, यानी वह बहुमत से सिर्फ तीन सीट दूर है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जर्मनी के किसी राज्य में इतनी मजबूत स्थिति बनाने वाली दक्षिणपंथी पार्टी अब तक सत्ता पर कब्जा नहीं कर सकी है। अब एएफडी दूसरी पार्टियों या अलग-अलग विधायकों का समर्थन हासिल करके सरकार बनाने की कोशिश कर रही है।
एएफडी बोली—जनता ने सरकार चलाने का जनादेश दिया
एएफडी के सैक्सोनी-आनहाल्ट नेता उलरिख जीगमंड ने परिणाम को सरकार बनाने का “स्पष्ट जनादेश” बताया है। पार्टी की उपनेता बीट्रिक्स फॉन स्टोर्ख ने भी अपने विरोधियों से बातचीत की अपील करते हुए कहा कि जनता के वोट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टियों को बातचीत करनी चाहिए। एएफडी अब सीडीयू के भीतर ऐसे नेताओं और विधायकों से संपर्क करने की कोशिश कर रही है जो अपनी पार्टी की मौजूदा दिशा से असंतुष्ट बताए जा रहे हैं।
लेकिन सत्ता अभी एएफडी की मुट्ठी में नहीं
43.8% वोट हासिल करना बड़ी राजनीतिक सफलता जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि एएफडी अपने दम पर सरकार बना चुकी है। विधानसभा में बहुमत के लिए उसे तीन और सीटों की जरूरत है। इसलिए अब असली राजनीतिक खेल शुरू होगा। एक संभावना यह है कि कोई छोटी पार्टी बाहर से समर्थन दे। वामपंथी लोकलुभावन बीएसडब्ल्यू के पास पांच सीटें आने की संभावना है और आव्रजन के मुद्दे पर उसका रुख भी सख्त है। दूसरी संभावना अलग-अलग विधायकों के समर्थन की है। अगर कोई रास्ता नहीं निकलता तो दोबारा चुनाव की स्थिति भी बन सकती है।
सीडीयू को लगा जोरदार झटका
सबसे बड़ा झटका जर्मनी की परंपरागत रूढ़िवादी पार्टी सीडीयू को लगा है। राज्य में उसका वोट प्रतिशत घटकर सिर्फ 17.2% रह गया, जो पिछले चुनाव की तुलना में लगभग आधा है। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने परिणाम पर गहरा सदमा जताते हुए इसे बेहद बड़ा राजनीतिक झटका बताया और माना कि अब सामान्य तरीके से राजनीति चलाने का समय नहीं है। उन्होंने पार्टी में गहरे सुधार और मतदाताओं से भावनात्मक स्तर पर दोबारा जुड़ने की जरूरत स्वीकार की है।
अगर एएफडी सत्ता में आई तो क्या बदलेगा?
सैक्सोनी-आनहाल्ट में सरकार बनाने का मतलब सिर्फ सत्ता का प्रतीकात्मक हस्तांतरण नहीं होगा। राज्य सरकार के पास पुलिस और स्थानीय शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अधिकार होते हैं। एएफडी की कई नीतियां पहले से ही जर्मनी में विवाद का विषय हैं। पार्टी शरणार्थी बच्चों को अलग कक्षाओं में रखने और ऐसे प्रवासियों को हिरासत में लेकर वापस भेजने के लिए विशेष टास्क फोर्स बनाने की बात करती है, जिन्हें राज्य में रहने का अधिकार नहीं है। पार्टी की ‘रीमाइग्रेशन’ नीति भी बेहद विवादास्पद है। एएफडी इसे मुख्य रूप से अपराधियों और अवैध रूप से रह रहे लोगों को वापस भेजने के रूप में प्रस्तुत करती है, जबकि उसके आलोचक इसे व्यापक निर्वासन की नीति से जोड़ते हैं।
जर्मनी की खुफिया एजेंसी ने एएफडी को दक्षिणपंथी चरमपंथी माना है
इस चुनाव की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि सैक्सोनी-आनहाल्ट में एएफडी को घरेलू खुफिया तंत्र द्वारा दक्षिणपंथी चरमपंथी के रूप में वर्गीकृत किया गया है। एएफडी इस वर्गीकरण को स्वीकार नहीं करती। पार्टी की चुनावी सफलता ने अब यह बहस और तेज कर दी है कि क्या जर्मनी की मुख्यधारा की पार्टियां एएफडी को सत्ता से बाहर रखने की अपनी पुरानी नीति जारी रखेंगी या चुनाव परिणाम के दबाव में उससे बातचीत करनी पड़ेगी।
‘एएफडी से बात करो’ बनाम ‘एएफडी से दूरी रखो’
एएफडी का तर्क है कि उसे वोट देने वाले लाखों लोगों की पसंद को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि दूसरी पार्टियां उससे राजनीतिक दूरी बनाना चाहती हैं। दूसरी तरफ जर्मनी की अधिकांश मुख्यधारा की पार्टियां अब तक एएफडी के साथ सहयोग से बचती रही हैं। यही टकराव अब सैक्सोनी-आनहाल्ट में सरकार गठन की सबसे बड़ी बाधा है। अगर सीडीयू या दूसरी पार्टियों का कोई धड़ा एएफडी को समर्थन देता है तो यह जर्मनी की राजनीति में एक बड़ी परंपरा के टूटने जैसा होगा।
अमेरिका और रूस में खुशी, पोलैंड में चिंता
एएफडी की जीत पर जर्मनी के बाहर भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव परिणाम का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर साझा किया। इसके बाद रूसी राष्ट्रपति के विशेष दूत किरिल दिमित्रीव ने एएफडी की जीत को ऐतिहासिक बताया और पहले भी पार्टी को जर्मनी के लिए उम्मीद और सहयोग की पार्टी बताया था। दूसरी ओर पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टुस्क ने बिल्कुल उलट प्रतिक्रिया दी और एएफडी की सफलता पर खुशी मनाने वालों की तीखी आलोचना की। इससे साफ है कि जर्मनी में एएफडी का उभार अब सिर्फ घरेलू राजनीति का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि पूरे यूरोप की राजनीति पर इसका असर पड़ सकता है।
यह सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं?
एएफडी की पकड़ पूर्वी जर्मनी में लगातार मजबूत होती दिखाई दे रही है। पार्टी ने 2024 में पड़ोसी थ्यूरिंगिया में भी राज्य चुनाव जीता था, हालांकि वहां बहुमत न मिलने के कारण वह सत्ता में नहीं आ सकी। अब सैक्सोनी-आनहाल्ट में 43.8% वोट तक पहुंचना एक और बड़ा संकेत है। राष्ट्रीय स्तर पर भी एएफडी जनमत सर्वेक्षणों में मजबूत स्थिति में बताई जा रही है। इसके बाद आने वाले क्षेत्रीय चुनाव—खासकर मेक्लेनबुर्ग-वोर्पोमेर्न और बर्लिन—और भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
जर्मनी के सामने अब असली परीक्षा
सैक्सोनी-आनहाल्ट का परिणाम जर्मनी की राजनीति के सामने सीधा सवाल रखता है—क्या मुख्यधारा की पार्टियां एएफडी को लगातार राजनीतिक रूप से अलग-थलग रख पाएंगी, जबकि मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा उसे समर्थन दे रहा है? या फिर चुनावी अंकगणित उन्हें किसी न किसी रूप में बातचीत करने के लिए मजबूर करेगा? फिलहाल एएफडी बहुमत से तीन सीट दूर है, इसलिए सत्ता उसके हाथ में आई नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि जर्मनी की राजनीति में एएफडी अब दरवाजे पर दस्तक नहीं दे रही—वह दरवाजे के बिल्कुल सामने खड़ी दिखाई दे रही है।




