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ट्रंप-शी डील से बदलेगा वैश्विक व्यापार? — चीन हर साल खरीदेगा 17 अरब डॉलर के अमेरिकी कृषि उत्पाद

अंतरराष्ट्रीय/ व्यापार | सुरजीत सिंह | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/बीजिंग | 18 मई 2026

अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से चल रहे व्यापार तनाव के बीच अब एक बड़ा आर्थिक समझौता सामने आया है। व्हाइट हाउस के अनुसार चीन ने 2026 से 2028 तक हर साल कम से कम 17 अरब डॉलर के अमेरिकी कृषि उत्पाद खरीदने पर सहमति जताई है। यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हाल ही में हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद सामने आया है। माना जा रहा है कि यह समझौता दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच बिगड़े व्यापारिक रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश का हिस्सा है।

व्हाइट हाउस की ओर से जारी फैक्ट शीट में कहा गया कि चीन की यह खरीद प्रतिबद्धता पहले से मौजूद सोयाबीन समझौतों से अलग होगी। यानी बीजिंग अमेरिकी कृषि बाजार में अतिरिक्त खरीद करेगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका-चीन टैरिफ युद्ध और राजनीतिक तनाव के कारण दोनों देशों के बीच कृषि व्यापार में भारी गिरावट आई थी। 2025 में अमेरिकी कृषि निर्यात चीन को लगभग 65 प्रतिशत तक गिर गया था और कुल व्यापार घटकर करीब 8.4 अरब डॉलर रह गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी किसानों को मिल सकता है, खासकर सोयाबीन, मक्का, गेहूं, बीफ और पोल्ट्री उद्योग को। चीन दुनिया का सबसे बड़ा कृषि आयातक देशों में से एक है और अमेरिकी किसान लंबे समय से चीनी बाजार में वापसी की मांग कर रहे थे। ट्रंप प्रशासन ने भी इसे अपनी बड़ी आर्थिक और राजनीतिक जीत के रूप में पेश किया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह समझौता केवल कृषि खरीद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बाजार पहुंच, निवेश और व्यापारिक सहयोग को भी बढ़ावा देगा।

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चीन ने अमेरिकी बीफ और पोल्ट्री उत्पादों पर लगी कई पाबंदियां हटाने के संकेत भी दिए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार बीजिंग अमेरिकी बीफ प्रोसेसिंग सुविधाओं पर लगे निलंबन खत्म करने और बर्ड फ्लू मुक्त राज्यों से पोल्ट्री आयात फिर शुरू करने पर सहमत हुआ है। इसके अलावा दोनों देशों ने “यूएस-चाइना बोर्ड ऑफ ट्रेड” और “यूएस-चाइना बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट” बनाने का भी फैसला किया है, ताकि बाजार पहुंच और व्यापारिक विवादों को हल किया जा सके।

हालांकि कई आर्थिक विश्लेषक इस समझौते को लेकर सतर्क भी हैं। उनका कहना है कि चीन पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी कृषि उत्पादों पर अपनी निर्भरता कम कर चुका है और अब वह ब्राजील जैसे देशों से बड़ी मात्रा में सस्ते सोयाबीन और अनाज खरीदता है। आंकड़ों के मुताबिक 2016 में चीन के कुल सोयाबीन आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी 41 प्रतिशत थी, जो हाल के वर्षों में काफी घट गई। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या चीन वास्तव में लंबे समय तक इतनी बड़ी मात्रा में अमेरिकी कृषि उत्पाद खरीदेगा या यह समझौता अधिक राजनीतिक संदेश देने के लिए किया गया है।

इस समझौते को वैश्विक भू-राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हाल के महीनों में अमेरिका और चीन के बीच तकनीक, सेमीकंडक्टर, ताइवान और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को लेकर तनाव बढ़ा है। ऐसे माहौल में कृषि व्यापार पर सहमति यह संकेत देती है कि दोनों देश टकराव के बावजूद आर्थिक रिश्तों को पूरी तरह टूटने नहीं देना चाहते। विश्लेषकों का मानना है कि यह डील ट्रंप प्रशासन के लिए घरेलू राजनीतिक रूप से भी अहम है, क्योंकि अमेरिकी ग्रामीण इलाकों और किसान समुदाय में समर्थन बनाए रखना रिपब्लिकन पार्टी की रणनीति का बड़ा हिस्सा माना जाता है।

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अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या यह कृषि समझौता अमेरिका-चीन संबंधों में स्थिरता लाएगा या फिर यह केवल अस्थायी आर्थिक समझौता साबित होगा। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच यह डील वैश्विक कृषि बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दिशा पर बड़ा असर डाल सकती है।

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