अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | ताइपे/वॉशिंगटन | 18 मई 2026
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई हाई-प्रोफाइल बैठक के बाद ताइवान को लेकर अमेरिका के रुख पर नई बहस शुरू हो गई है। ट्रंप के हालिया बयानों ने ताइवान, अमेरिका और चीन के बीच चल रहे संवेदनशील शक्ति संतुलन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि ताइवान को हथियार बेचने और संभावित चीनी हमले की स्थिति में अमेरिकी सैन्य मदद को लेकर अंतिम फैसला अभी बाकी है। इसके बाद ताइवान ने बेहद संयमित लेकिन स्पष्ट शब्दों में प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि द्वीप का भविष्य केवल ताइवान की जनता तय करेगी, कोई बाहरी ताकत नहीं।
ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने अपने बयान में कहा कि “ताइवान एक संप्रभु और स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र है और वह चीन के अधीन नहीं है।” हालांकि उन्होंने सीधे ट्रंप का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका पूरा संदेश स्पष्ट रूप से वॉशिंगटन और बीजिंग दोनों के लिए राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। ताइवान के विदेश मंत्रालय ने भी बयान जारी कर दोहराया कि ताइवान की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं हो सकता और लोकतांत्रिक अधिकार केवल वहां की जनता के हाथ में हैं।
दरअसल पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब ट्रंप ने चीन यात्रा के दौरान ताइवान को लेकर अपेक्षाकृत नरम रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि अमेरिका “9,500 मील दूर जाकर युद्ध नहीं चाहता” और दोनों पक्षों को तनाव कम करना चाहिए। ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्होंने अभी तक ताइवान को प्रस्तावित 14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज पर अंतिम फैसला नहीं लिया है। उनके इन बयानों ने ताइवान में चिंता बढ़ा दी क्योंकि दशकों से अमेरिका ताइवान का सबसे बड़ा रणनीतिक समर्थक और हथियार आपूर्तिकर्ता रहा है।
बीजिंग लगातार ताइवान को अपना हिस्सा मानता आया है और जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग की चेतावनी भी देता रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ट्रंप के साथ बैठक में ताइवान को “अमेरिका-चीन संबंधों का सबसे संवेदनशील मुद्दा” बताया। चीनी सरकारी मीडिया के अनुसार शी ने कहा कि यदि ताइवान मुद्दे को ठीक से नहीं संभाला गया तो दोनों देशों के बीच “टकराव और संघर्ष” की स्थिति पैदा हो सकती है। यही कारण है कि ट्रंप के हालिया बयान को केवल कूटनीतिक टिप्पणी नहीं बल्कि वैश्विक रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि अमेरिकी प्रशासन के कई अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि ताइवान को लेकर अमेरिका की आधिकारिक नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी कहा कि वॉशिंगटन की “वन चाइना पॉलिसी” और ताइवान के समर्थन की रणनीति पहले जैसी ही बनी हुई है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की व्यक्तिगत बयानबाजी कई बार आधिकारिक नीति से अलग संदेश दे देती है, जिससे सहयोगी देशों में असमंजस पैदा होता है।
अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी चेतावनी दी कि यदि अमेरिका ताइवान मुद्दे पर चीन के सामने कमजोर पड़ा तो बीजिंग और आक्रामक हो सकता है। उन्होंने कहा कि “अगर आप चीन को एक इंच देंगे, तो वह एक मील ले लेगा।” ग्राहम ने ताइवान को सैन्य रूप से मजबूत बनाए रखने और चीन के खिलाफ संभावित प्रतिबंधों की तैयारी की भी वकालत की।
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन की “अमेरिका फर्स्ट” रणनीति अब वैश्विक गठबंधनों की पारंपरिक राजनीति को प्रभावित कर रही है। यूरोप में NATO सहयोगियों के साथ तनाव और अब ताइवान पर बदलते संकेत यह दिखाते हैं कि अमेरिका अपने सुरक्षा दायित्वों को नए तरीके से परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है। इससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन और अधिक संवेदनशील हो सकता है।
ताइवान फिलहाल सार्वजनिक रूप से संयमित भाषा का इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन वहां की सरकार और जनता दोनों इस बात को लेकर सतर्क हैं कि अमेरिका का समर्थन भविष्य में कितना मजबूत बना रहेगा। चीन लगातार सैन्य दबाव बढ़ा रहा है, जबकि ताइवान अपनी रक्षा तैयारियों और ड्रोन तकनीक को मजबूत करने में जुटा हुआ है। ऐसे में ट्रंप के हालिया बयान केवल राजनीतिक टिप्पणी नहीं बल्कि पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा राजनीति को प्रभावित करने वाले संकेत माने जा रहे हैं।




