अंतरराष्ट्रीय | महेंद्र सिंह | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग | 18 मई 2026
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक बार फिर साफ संकेत दे दिए हैं कि बीजिंग अब केवल आर्थिक और सैन्य महाशक्ति बनने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वैचारिक और बौद्धिक स्तर पर भी दुनिया को “चीनी मॉडल” देने की तैयारी में जुट चुका है। चीन की सरकारी मीडिया CGTN और शिन्हुआ की रिपोर्ट के मुताबिक शी जिनपिंग ने दर्शनशास्त्र और सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में “चीनी बौद्धिक प्रणाली” को तेज़ी से विकसित करने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि चीन को ऐसा वैचारिक ढांचा तैयार करना होगा जो “चीन, दुनिया, जनता और समय” के सवालों का जवाब दे सके।
शी जिनपिंग ने यह टिप्पणी दर्शन और सामाजिक विज्ञान के उच्च गुणवत्ता विकास को लेकर जारी एक विशेष निर्देश में की। उन्होंने कहा कि 2012 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 18वीं कांग्रेस के बाद से चीन ने ज्ञान, सिद्धांत और शोध पद्धति के क्षेत्र में लगातार प्रगति की है। उनके मुताबिक चीन के शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने ऐसे कई महत्वपूर्ण शोध परिणाम दिए हैं जो देश की आधुनिक सोच और विकास मॉडल को मजबूत करते हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि चीन अपने समाजवादी ढांचे और पार्टी की नई विचारधारा को व्यवस्थित रूप से अकादमिक और बौद्धिक रूप दे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल शिक्षा या रिसर्च का मामला नहीं है, बल्कि चीन की दीर्घकालिक “सॉफ्ट पावर रणनीति” का हिस्सा है। जिस तरह पश्चिमी देशों ने लोकतंत्र, उदारवाद और पूंजीवाद को वैश्विक वैचारिक मॉडल के रूप में स्थापित किया, उसी तरह चीन अब “चीनी आधुनिकीकरण” और “समाजवादी विकास मॉडल” को दुनिया के सामने वैकल्पिक रास्ते के रूप में पेश करना चाहता है। बीजिंग का मानना है कि पश्चिमी राजनीतिक और सामाजिक सिद्धांत अब दुनिया की सभी समस्याओं का समाधान नहीं दे पा रहे हैं, इसलिए चीन अपने अनुभवों और मॉडल को नए वैश्विक विमर्श के रूप में स्थापित करना चाहता है।
शी जिनपिंग ने अपने संदेश में पार्टी की “नई थ्योरी” की गहराई से व्याख्या और शोध को और तेज करने पर जोर दिया। इसका सीधा मतलब यह माना जा रहा है कि चीन अब शिक्षा, इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान और दर्शन जैसे विषयों में भी कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा को अधिक संस्थागत रूप देना चाहता है। हाल के वर्षों में चीन में विश्वविद्यालयों, मीडिया और सांस्कृतिक संस्थानों पर पार्टी का प्रभाव लगातार बढ़ा है और अब बौद्धिक ढांचे को भी उसी दिशा में ढालने की कोशिश दिखाई दे रही है।
चीन के भीतर इसे “राष्ट्रीय आत्मविश्वास” और “सभ्यतागत पुनर्जागरण” के रूप में पेश किया जा रहा है। सरकार समर्थक विश्लेषकों का कहना है कि चीन को पश्चिमी विचारधाराओं की नकल करने के बजाय अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं के आधार पर नया ज्ञान ढांचा तैयार करना चाहिए। वहीं आलोचकों का मानना है कि इससे अकादमिक स्वतंत्रता और वैचारिक विविधता प्रभावित हो सकती है, क्योंकि चीन में पहले से ही इंटरनेट, मीडिया और विश्वविद्यालयों पर कड़ा सरकारी नियंत्रण मौजूद है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस बयान को काफी अहम माना जा रहा है। अमेरिका और यूरोप लंबे समय से चीन पर आरोप लगाते रहे हैं कि वह केवल आर्थिक प्रभाव नहीं बल्कि वैचारिक प्रभाव भी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। “बेल्ट एंड रोड”, वैश्विक मीडिया नेटवर्क, टेक्नोलॉजी निवेश और शिक्षा सहयोग कार्यक्रमों के जरिए चीन पहले ही कई देशों में अपनी मौजूदगी मजबूत कर चुका है। अब “चीनी बौद्धिक प्रणाली” की बात यह संकेत देती है कि बीजिंग आने वाले समय में वैचारिक नेतृत्व की लड़ाई में भी खुलकर उतरना चाहता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में दुनिया में केवल आर्थिक या सैन्य प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि “नैरेटिव वॉर” भी तेज होगी। एक तरफ पश्चिमी लोकतांत्रिक मॉडल होगा, तो दूसरी तरफ चीन “केंद्रीकृत विकास मॉडल” को सफल उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करेगा। शी जिनपिंग का यह नया बयान उसी वैश्विक वैचारिक प्रतिस्पर्धा की दिशा में बड़ा संकेत माना जा रहा है।




