ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 मई 2026
भारत का लोकतंत्र आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां राजनीतिक लड़ाई केवल चुनाव जीतने या हारने तक सीमित नहीं रह गई है। यह संघर्ष अब संविधान की आत्मा, संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की दिशा को लेकर दिखाई देने लगा है। विपक्ष लगातार यह आरोप लगा रहा है कि देश में सत्ता का केंद्रीकरण तेजी से बढ़ रहा है और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बनाया जा रहा है। दूसरी तरफ सत्तापक्ष खुद को राष्ट्रवाद, स्थिरता और विकास का सबसे बड़ा प्रतीक बताता है। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत की राजनीति अब वैचारिक बहस से हटकर संस्थागत टकराव के दौर में प्रवेश कर चुकी है?
देश के राजनीतिक माहौल को देखें तो साफ दिखाई देता है कि संविधान, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे अब केवल किताबों या संसद की बहसों तक सीमित नहीं हैं। विपक्षी दल लगातार आरोप लगा रहे हैं कि बीजेपी की राजनीति लोकतांत्रिक असहमति को कमजोर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। उनका कहना है कि जो लोग बराबरी, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक मूल्यों की बात करते हैं, उन्हें “राष्ट्रविरोधी”, “अर्बन नक्सल” या “टुकड़े-टुकड़े गैंग” जैसे तमगों से बदनाम किया जाता है। यह केवल राजनीतिक हमला नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श को सीमित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सत्ता के इर्द-गिर्द खड़ी राजनीतिक और वैचारिक ताकतें संविधान की मूल भावना — समानता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता — को कमजोर करने की दिशा में काम कर रही हैं।
आज सबसे गंभीर सवाल मीडिया की भूमिका को लेकर भी खड़ा हो चुका है। देश का बड़ा हिस्सा मानता है कि मुख्यधारा का एक बड़ा वर्ग सत्ता से कठिन सवाल पूछने के बजाय उसके पक्ष में माहौल बनाने में अधिक सक्रिय दिखाई देता है। टीवी डिबेट्स में अक्सर वही चेहरे दिखाई देते हैं जो सत्ता के नैरेटिव को मजबूत करते हैं, जबकि बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक तनाव, किसानों की समस्याएं और संस्थागत स्वायत्तता जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। विपक्ष लंबे समय से “गोदी मीडिया” शब्द का इस्तेमाल करता रहा है और उसका आरोप है कि मीडिया का बड़ा हिस्सा निष्पक्ष पत्रकारिता छोड़कर राजनीतिक प्रचार का माध्यम बन चुका है। हालांकि मीडिया जगत का एक वर्ग इन आरोपों को खारिज भी करता है, लेकिन जनता के बीच भरोसे का संकट लगातार गहराता जा रहा है।
विपक्षी दलों के सामने भी चुनौती कम नहीं है। केवल बीजेपी की आलोचना कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल खुद को संविधान बचाने वाली ताकत के रूप में पेश करना चाहते हैं, तो उन्हें जमीन पर मजबूत वैचारिक और सामाजिक आंदोलन खड़ा करना होगा। उन्हें यह दिखाना होगा कि वे केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि संस्थागत संतुलन, सामाजिक न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं। जनता अब केवल भाषण नहीं बल्कि वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टि चाहती है। विपक्ष के भीतर यह भावना लगातार मजबूत हो रही है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल चुनावी गठबंधन से नहीं बल्कि वैचारिक संघर्ष से होगी।
भारत की लोकतांत्रिक ताकत हमेशा उसकी विविधता और बहुलता रही है। यही कारण है कि संविधान ने हर नागरिक को बराबरी, स्वतंत्रता और न्याय का अधिकार दिया। लेकिन जब राजनीतिक बहसें कट्टर ध्रुवीकरण में बदल जाती हैं, तब लोकतंत्र का संतुलन कमजोर होने लगता है। आज जरूरत इस बात की है कि सत्ता और विपक्ष दोनों संविधान को केवल चुनावी हथियार बनाने के बजाय उसे शासन और राजनीति की असली आत्मा मानें।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां असहमति भी देशभक्ति का हिस्सा होती है। सवाल पूछना, सत्ता की आलोचना करना और संस्थाओं की जवाबदेही तय करना लोकतंत्र को मजबूत करता है, कमजोर नहीं। भारत की राजनीति जिस दिशा में आगे बढ़ रही है, उसमें यह तय करना आने वाली पीढ़ियों के हाथ में होगा कि देश संविधान की भावना के साथ आगे बढ़ेगा या केवल राजनीतिक बहुमत की ताकत से।




