Home » National » इलाहाबाद हाईकोर्ट की यूपी सरकार को कड़ी फटकार: “अफसर संविधान के प्रति वफादार रहें, राजनीतिक आकाओं के प्रति नहीं”

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यूपी सरकार को कड़ी फटकार: “अफसर संविधान के प्रति वफादार रहें, राजनीतिक आकाओं के प्रति नहीं”

डीयू की छात्रा पर एनएसए लगाने का आदेश रद्द; हाईकोर्ट ने कहा—बिना ठोस सबूत किसी नागरिक की आजादी छीनना संविधान के साथ खिलवाड़, 5 लाख रुपये मुआवजे का आदेश

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | प्रयागराज | 8 सितंबर 2026

“यूपी को ऑरवेलियन डिस्टोपिया मत बनाइए”

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा के मजदूरों के आंदोलन से जुड़े मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय स्नातक आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश की पुलिस और प्रशासन को बेहद कड़ी चेतावनी दी है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने कहा कि अगर नौकरशाही और पुलिस अपनी शपथ भूलकर नागरिकों के अधिकारों के खिलाफ काम करती रही तो उत्तर प्रदेश को एक “ऑरवेलियन डिस्टोपिया”, यानी ऐसा दमनकारी समाज बनाने में देर नहीं लगेगी जहां सत्ता का डर नागरिक स्वतंत्रता पर भारी पड़ जाए।

मजदूरों के हक में आवाज उठाना अपराध कैसे?

अदालत के अनुसार उपलब्ध वीडियो में प्रदर्शनकारी शांतिपूर्वक अपनी मांगों को उठा रहे थे। वे बेहतर वेतन और इंसानों जैसी काम की परिस्थितियों की मांग कर रहे थे। अदालत ने कहा कि वीडियो में भीड़ के पास लाठी, पत्थर या हिंसा में इस्तेमाल होने वाली कोई वस्तु दिखाई नहीं देती और प्रदर्शनकारी अपने संवैधानिक अधिकार तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते नजर आते हैं। आकृति चौधरी की भूमिका भी मजदूरों के समर्थन में लोगों को जुटाने और उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाने तक बताई गई।

एनएसए कोई सामान्य कानून नहीं—अदालत की दो टूक

हाईकोर्ट ने साफ किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसी कठोर व्यवस्था का इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति को जेल में रखने के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता जिसे सामान्य आपराधिक मामले में अदालत से जमानत मिल सकती हो। हिरासत के लिए केवल आरोप, अनुमान या अधिकारी की व्यक्तिगत राय पर्याप्त नहीं है। अदालत ने कहा कि हिरासत के आधार ठोस सामग्री और प्रमाण पर आधारित होने चाहिए, वरना ऐसी कार्रवाई मनमानी मानी जाएगी।

ALSO READ  राम मंदिर चढ़ावे में चोरी के पुख्ता सबूत! SIT रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, CCTV में कैद हुई करतूत

पीठ ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 से मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को केवल अंदाजे, पूर्वाग्रह, अनुमान या राय के आधार पर छीना नहीं जा सकता।

जिलाधिकारी की भूमिका पर अदालत बेहद नाराज

गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी द्वारा जारी हिरासत आदेश पर अदालत ने गंभीर आपत्ति जताई। पीठ ने कहा कि पुलिस रिपोर्ट में आकृति के खिलाफ केवल आरोप थे और उन्हें समर्थन देने वाली विश्वसनीय सामग्री नहीं थी। ऐसे में जिलाधिकारी को रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करनी चाहिए थी और यह देखना चाहिए था कि एनएसए जैसे कठोर कानून की जरूरत वास्तव में थी या नहीं।

अदालत ने यह भी कहा कि आकृति का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं दिखा जिससे यह साबित हो कि उसने हिंसा भड़काई थी। अदालत के अनुसार उपलब्ध सामग्री से ऐसा प्रतीत हुआ कि उनके खिलाफ कार्रवाई का उद्देश्य दूसरों को सार्वजनिक स्थानों पर मजदूरों के समर्थन में आवाज उठाने से रोकने के लिए एक उदाहरण स्थापित करना था।

5 लाख रुपये मुआवजा—और पैसा अधिकारी की तनख्वाह से

हाईकोर्ट ने प्रशासन की कार्रवाई को नागरिक के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना और 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यह रकम गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी के वेतन से तथा उन अन्य अधिकारियों से वसूल की जाए जो इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार पाए जाएं, यहां तक कि संबंधित थाना प्रभारी स्तर तक जिम्मेदारी तय की जाए।

यह आदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने सिर्फ हिरासत रद्द करके मामला खत्म नहीं किया, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही की व्यक्तिगत आर्थिक जवाबदेही की दिशा में भी कदम उठाया।

ALSO READ  'मैं चार महीने से रूस में हूं, फिर भी FIR में नाम डाल दिया': किशनगंज के युवक का दावा, वायरल वीडियो से उठा विवाद

“अफसरों की वफादारी राजनीतिक कार्यपालिका से नहीं, संविधान से है”

फैसले का सबसे तीखा हिस्सा नौकरशाही और पुलिस की संवैधानिक जिम्मेदारी को लेकर है। हाईकोर्ट ने याद दिलाया कि आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को कानून ने बहुत बड़ी शक्तियां दी हैं, लेकिन इन शक्तियों के साथ उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी आती है। अधिकारियों की शपथ उन्हें भारत और संविधान के प्रति निष्ठा, ईमानदारी और निष्पक्षता से काम करने के लिए बाध्य करती है।

अदालत ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि अफसरों को समझना चाहिए कि उनकी वफादारी संविधान के प्रति है, राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति नहीं; उनकी ईमानदारी और निष्पक्षता उन लोगों के प्रति है जिनकी वे सेवा करते हैं—और लोकतंत्र में जनता ही मालिक है।

शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतंत्र का सुरक्षा वाल्व

हाईकोर्ट ने विरोध प्रदर्शन को लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया बताते हुए कहा कि समाज में सरकार की नीतियों को लेकर असहमति और तनाव होना सामान्य है। अदालत ने आंदोलन की तुलना प्रेशर कुकर के सुरक्षा वाल्व से की। अगर लोगों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी नाराजगी व्यक्त करने का रास्ता दिया जाता है तो सामाजिक दबाव बाहर निकलता रहता है; लेकिन अगर हर असहमति को दबाने की कोशिश होगी तो दबाव बढ़ सकता है और बाद में स्थिति हिंसक भी हो सकती है।

अदालत ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण भीड़ में कुछ शरारती तत्व हिंसा कर सकते हैं और फिर पूरी भीड़ को उसके लिए जिम्मेदार ठहराना अन्यायपूर्ण होगा। पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह बड़े जमावड़े में कानून-व्यवस्था बनाए रखे और वीडियो रिकॉर्डिंग जैसे तरीकों से जवाबदेही तय करे।

ALSO READ  WATCH VIDEO -- संसद में लोकतंत्र की हत्या: राहुल गांधी का माइक बंद कर चुप कराया गया, सत्ता का बहस से इंकार

लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं

इस फैसले का व्यापक संदेश बेहद साफ है—सरकार से असहमति, मजदूरों के पक्ष में आवाज उठाना या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अपने आप में राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा नहीं बन जाता। राज्य को यह साबित करना होगा कि किसी व्यक्ति की गतिविधि वास्तव में कानून में निर्धारित गंभीर खतरे की सीमा तक पहुंचती है। केवल अधिकारी की आशंका या अनुमान के आधार पर किसी नागरिक की स्वतंत्रता छीनना संविधान की कसौटी पर टिक नहीं सकता।

सत्य निकेतन हादसे से लेकर मजदूर आंदोलनों तक, दिल्ली-एनसीआर में प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसे समय में इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला एक बड़ा संवैधानिक संदेश देता है—सत्ता के पास ताकत जरूर है, लेकिन उस ताकत के ऊपर संविधान है। और लोकतंत्र में अफसर जनता के मालिक नहीं, जनता के सेवक हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *