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हिमालय की तबाही के 12 दिन बाद भी हजारों लापता, नेपाल-तिब्बत में मौत का आंकड़ा 1,384 पार

नेपाल में 1,341 शव बरामद, करीब 4,996 लोग अब भी लापता; तिब्बत में 43 मौतें और 519 लोग गायब—बर्फीली तबाही के बीच सुरंगों से जिंदा निकल रहे लोग

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 7 सितंबर 2026

12 दिन बाद भी खत्म नहीं हुआ तलाश का सिलसिला

नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ और ग्लेशियर टूटने की घटना के 12 दिन बाद भी राहत और बचाव अभियान जारी है। हजारों परिवार आज भी अपने लोगों की तलाश में हैं। दोनों देशों को मिलाकर कम से कम 1,384 लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है, जबकि 5,500 से ज्यादा लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। इनमें करीब 800 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। नेपाल में अब तक 1,341 शव बरामद किए जा चुके हैं और करीब 4,996 लोगों की तलाश जारी है। तिब्बत में चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार 43 लोगों की मौत हुई है और 519 लोग अभी भी लापता हैं।

सुरंगों में जिंदगी की उम्मीद अब भी बाकी

इस भयानक तबाही के बीच उम्मीद की कुछ किरणें भी सामने आई हैं। शुक्रवार के बाद से चार लोगों को जिंदा निकाला गया, जिनमें तीन लोग जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों से मिले। शुरुआत में सरकार ने ऐसी सुरंगों में करीब 100 लोगों के फंसे होने की संभावना जताई थी। नेपाल के ऊर्जा मंत्री बिराज भक्त श्रेष्ठ के मुताबिक खराब मौसम, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और संपर्क व्यवस्था की कमी के बावजूद सुरंगों में खोज और बचाव अभियान जारी है। यानी जहां एक तरफ हजारों लोगों की तलाश में वक्त निकलता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सुरंगों से किसी और जिंदगी के बच निकलने की उम्मीद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

ग्यिरोंग में मलबे के नीचे दबी जिंदगी

चीन की ओर ग्यिरोंग में तबाही का मंजर बेहद गंभीर है। नेपाल से जुड़ा यह महत्वपूर्ण सीमावर्ती व्यापारिक रास्ता बाढ़ और मलबे की चपेट में आ गया। पांच मंजिला सीमा शुल्क भवन का अब लगभग कोई हिस्सा दिखाई नहीं देता। बचावकर्मी फावड़ों, खुदाई करने वाली मशीनों और जमीन के भीतर खोज करने वाले रडार की मदद से मलबे में दबे लोगों को तलाश रहे हैं। भारी उपकरणों की मदद अब संभव हो पाई है क्योंकि ग्यिरोंग तक जाने वाली एकमात्र सड़क बुधवार को दोबारा खोल दी गई। लेकिन गहरी कीचड़, खराब मौसम और नए भूस्खलन का खतरा बचाव अभियान को लगातार मुश्किल बना रहा है।

क्या यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा है?

इस त्रासदी ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन के सवाल को दुनिया के सामने ला दिया है। ग्लेशियर टूटने की इस घटना का वास्तविक कारण अभी जांच के अधीन है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया के बढ़ते तापमान के साथ ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़ की घटनाओं की संख्या और उनका आकार बढ़ा है। संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के अनुसार ऐसी बाढ़ 1950 के बाद लगभग पांच गुना अधिक बार होने लगी है। इसका मतलब यह नहीं कि इस विशेष आपदा का एकमात्र कारण जलवायु परिवर्तन ही साबित हो चुका है, लेकिन हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बढ़ता तापमान और बदलती जलवायु निश्चित रूप से गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं।

नेपाल ने दुनिया से मांगा जलवायु मुआवजा

इस तबाही के बाद नेपाल ने सवाल उठाया है कि जिन गरीब और संवेदनशील देशों का वैश्विक उत्सर्जन में योगदान बहुत कम है, उन्हें जलवायु आपदाओं की भारी कीमत अकेले क्यों चुकानी पड़े। नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र समर्थित हानि और क्षति कोष से सहायता मांगने की प्रक्रिया शुरू की है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा है कि बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है कि वे नेपाल जैसे कमजोर देशों की मदद करें। नेपाल सरकार ने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों को औपचारिक जलवायु मुआवजा अनुरोध भी भेजा है।

84 हजार से ज्यादा लोगों तक मदद पहुंचाना चुनौती

संयुक्त राष्ट्र ने राहत के लिए 5 करोड़ डॉलर की अपील की है। बताया गया है कि बाढ़ से प्रभावित 84 हजार से ज्यादा लोगों तक राहत पहुंचाना बेहद कठिन हो गया है। सड़कें टूटी हैं, संपर्क व्यवस्था बाधित है और कई इलाके मलबे तथा पानी से घिरे हैं। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के सबसे कम विकसित देशों के समूह के सलाहकार मनजीत धखाल का कहना है कि ऐसी आपदाओं की कीमत कमजोर देशों को अपने स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास के लिए रखे पैसे से चुकानी पड़ती है। उनके अनुसार नेपाल ने इस आपदा को पैदा नहीं किया, इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी बनती है कि वह उसकी मदद करे।

कागज पर बना कोष, लेकिन पैसा कितना?

जलवायु संकट के लिए बनाए गए इस कोष की अपनी भी एक बड़ी चुनौती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अब तक करीब 82.2 करोड़ डॉलर देने का वादा किया गया था, लेकिन लगभग 63.1 करोड़ डॉलर ही प्राप्त हुए हैं। अभी तक इस राशि से भुगतान भी शुरू नहीं हुआ है। ऐसे में नेपाल की मांग सिर्फ आर्थिक मदद का सवाल नहीं है, बल्कि यह उस वैश्विक व्यवस्था की परीक्षा भी है जिसके तहत जलवायु आपदाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित गरीब देशों को सहायता देने की बात कही गई थी।

बच्चों ने खोया परिवार, घर और बचपन

काठमांडू के एक बौद्ध मठ को राहत शिविर में बदल दिया गया है, जहां करीब 200 लोगों को हेलीकॉप्टर से लाया गया। वहां डॉक्टर और स्वयंसेवक घायलों और विस्थापित लोगों की मदद कर रहे हैं। लेकिन इस आपदा का सबसे गहरा असर बच्चों के चेहरों पर दिखाई देता है। रिपोर्ट के अनुसार कई बच्चों ने अपने परिवार, घर और माता-पिता तक खो दिए हैं। एक स्वयंसेवक ने बच्चों को अपनी भावनाएं चित्रों के जरिए व्यक्त करने का मौका दिया। हैरानी की बात यह रही कि ज्यादातर बच्चों ने खुशी वाला विकल्प चुना। स्वयंसेवक के मुताबिक यह जरूरी नहीं कि बच्चे वास्तव में खुश हों; इतनी बड़ी त्रासदी के तुरंत बाद उनकी भावनाएं भीतर दब सकती हैं और आने वाले दिनों, महीनों या वर्षों में यह दर्द सामने आ सकता है।

हिमालय की इस त्रासदी का सवाल बहुत बड़ा है

नेपाल और तिब्बत की यह आपदा केवल हजारों लापता लोगों की तलाश और राहत अभियान की कहानी नहीं है। यह हिमालय की बदलती प्रकृति, बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों की अस्थिरता और आपदाओं से निपटने की वैश्विक तैयारी पर भी बड़ा सवाल है। आज मलबे के नीचे दबे लोगों को खोजने की चुनौती है, लेकिन कल सवाल यह होगा कि क्या दुनिया हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को अगली ऐसी तबाही से बचाने के लिए समय रहते कुछ करेगी? क्योंकि जिन लोगों ने अपने घर, परिवार और जीवन खो दिए, उनके लिए जलवायु संकट कोई आंकड़ा नहीं—एक ऐसी त्रासदी है जिसका दर्द पीढ़ियों तक रह सकता है।

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