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चर्च से टकराव के बाद तीन ननों ने खुद बुनी नई जिंदगी, सिलाई मशीन बनी आत्मनिर्भरता का सहारा

कभी जिस कॉन्वेंट में सन्नाटा और संघर्ष था, आज वहीं दिनभर चलती हैं सिलाई मशीनें; ‘स्टैंड बाय मी’ के जरिए तीन नन अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश में जुटीं

व्यापार/ लाइफस्टाइल/ केरल | ABC NATIONAL NEWS | कोट्टायम | 6 सितंबर 2026

कॉन्वेंट की सिलाई अब जिंदगी का रास्ता बनी

केरल के कोट्टायम जिले के कुरविलंगाड स्थित सेंट फ्रांसिस मिशन होम में आजकल सिलाई मशीनों की आवाज सुनाई देती है। कभी यही जगह चर्च के भीतर उठे एक बड़े विवाद के केंद्र में रही थी। अब यहां कपड़े नापे जाते हैं, काटे जाते हैं, मशीनों से सिले जाते हैं और धीरे-धीरे तैयार कपड़े एक नए सफर की कहानी लिख रहे हैं। यहां रहने वाली तीन ननों के लिए सिलाई कभी कॉन्वेंट में सीखी गई एक सामान्य कला थी, लेकिन आज वही हुनर उनके लिए अपने दम पर जिंदगी खड़ी करने का जरिया बन गया है।

संघर्ष के बाद अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश

इन तीनों ननों ने बिशप फ्रैंको मुलक्कल से जुड़े मामले में अपने रुख के बाद वर्षों तक अलगाव और मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया। अब उन्होंने अपनी जिंदगी को नए तरीके से आगे बढ़ाने का फैसला किया है। इसी कोशिश से ‘स्टैंड बाय मी’ नाम का कपड़ों का काम शुरू हुआ है। इसका उद्देश्य सिर्फ कपड़े सिलना और बेचना नहीं है, बल्कि उन तीनों के लिए ऐसा रास्ता तैयार करना है जहां वे अपने हुनर के दम पर अपनी जिंदगी चला सकें और अपने भविष्य के फैसले खुद ले सकें।

सिलाई मशीन के पीछे छिपी है आत्मसम्मान की कहानी

‘स्टैंड बाय मी’ की कहानी को केवल एक छोटे कपड़ा कारोबार के रूप में देखना इस पूरी कहानी को छोटा कर देना होगा। इन महिलाओं के लिए हर सिलाई, हर कपड़ा और हर तैयार परिधान उस लंबे संघर्ष के बाद आगे बढ़ने की कोशिश है। जिस हुनर को उन्होंने कभी धार्मिक जीवन का हिस्सा रहते हुए सीखा था, वही अब उनकी आर्थिक स्वतंत्रता का आधार बन रहा है। मशीन पर चलता धागा सिर्फ कपड़े को जोड़ नहीं रहा, बल्कि उनके बिखरे हुए जीवन को भी एक नई दिशा देने की कोशिश कर रहा है।

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बिशप फ्रैंको मुलक्कल मामले के बाद बदली जिंदगी

इन ननों का नाम बिशप फ्रैंको मुलक्कल से जुड़े मामले के दौरान सार्वजनिक चर्चा में आया था। उस दौर ने उनके जीवन को गहराई से प्रभावित किया और इसके बाद उन्हें लंबे समय तक अलगाव और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अब वे पीछे मुड़कर उसी संघर्ष में फंसे रहने के बजाय अपने भविष्य को अपने तरीके से बनाने की कोशिश कर रही हैं। सिलाई का यह काम उसी बदलाव का प्रतीक बन गया है—जहां कभी संघर्ष उनकी पहचान था, अब हुनर और आत्मनिर्भरता उनकी नई पहचान बनने की कोशिश कर रहे हैं।

‘स्टैंड बाय मी’ सिर्फ नाम नहीं, एक संदेश भी

‘स्टैंड बाय मी’ नाम अपने आप में भी इस पहल की भावना को सामने रखता है। तीनों ननों के लिए यह काम शायद यह बताने का एक तरीका है कि मुश्किल समय के बाद भी इंसान अपने जीवन को दोबारा खड़ा कर सकता है। इसके लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी हाथ में मौजूद हुनर, थोड़ी हिम्मत और अपने फैसले खुद लेने का साहस ही नई शुरुआत के लिए काफी होता है।

अब मशीनों की आवाज में सुनाई देती है नई उम्मीद

सेंट फ्रांसिस मिशन होम में चलती सिलाई मशीनें इसलिए खास हैं क्योंकि उनके पीछे केवल कपड़ा तैयार करने का काम नहीं, बल्कि सम्मान के साथ अपनी जिंदगी जीने की कोशिश है। तीनों ननों ने अपने पुराने अनुभवों और सीखे हुए हुनर को अपनी नई राह बनाने के लिए इस्तेमाल किया है। उनकी कहानी बताती है कि लंबे संघर्ष के बाद भी जीवन रुकता नहीं है—कभी वही हाथ, जिन्होंने वर्षों तक दूसरों के लिए काम किया, एक दिन अपनी स्वतंत्र जिंदगी की सिलाई भी शुरू कर देते हैं।

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