स्वास्थ्य/ व्यापार/ महाराष्ट्र | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 6 सितंबर 2026
“लोकप्रियता मेरा लक्ष्य कभी नहीं था”
महाराष्ट्र में खाद्य सुरक्षा को लेकर लगातार सख्त कार्रवाई के कारण चर्चा में आए खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए के आयुक्त तुकाराम मुंढे ने साफ कहा है कि उन्हें अपनी लोकप्रियता की चिंता नहीं है। उनसे जब पूछा गया कि खाद्य सुरक्षा को लेकर उनकी आक्रामक कार्रवाई के बाद लोगों के बीच उनकी एक सेलिब्रिटी जैसी पहचान बन गई है, क्या यह उनके काम में बाधा बन रही है, तो उन्होंने साफ जवाब दिया—“यह कोई बाधा नहीं है। लोकप्रियता मेरा लक्ष्य कभी नहीं था।” उनके इस बयान का सीधा संदेश है कि किसी अधिकारी के लिए लोगों की वाहवाही से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी जिम्मेदारी और जनता का स्वास्थ्य होना चाहिए।
खाने की सुरक्षा को लेकर सख्ती क्यों जरूरी?
मुंढे के नेतृत्व में महाराष्ट्र में खाद्य सुरक्षा नियमों को लेकर कार्रवाई तेज हुई है। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, साफ-सफाई और नियमों के पालन को लेकर प्रशासन की सख्ती का असर कारोबारियों और खाद्य प्रतिष्ठानों पर भी दिखाई दे रहा है। उनका मानना है कि भोजन सीधे इंसान के स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है और इसमें लापरवाही का असर किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। खराब गुणवत्ता वाला भोजन हजारों लोगों की सेहत को प्रभावित कर सकता है। इसलिए नियमों का पालन करवाना केवल सरकारी कार्रवाई नहीं, बल्कि जनता के स्वास्थ्य की रक्षा करने की जिम्मेदारी है।
“स्वस्थ मानव संसाधन के बिना सुपरपावर कैसे बनेगा भारत?”
तुकाराम मुंढे ने अपनी सोच को इससे भी बड़े सवाल से जोड़ते हुए कहा कि अगर देश का मानव संसाधन स्वस्थ नहीं होगा तो भारत सुपरपावर नहीं बन सकता। उनका यह बयान केवल खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के विकास की बुनियादी जरूरत की ओर इशारा करता है। किसी भी देश की आर्थिक ताकत, उत्पादन क्षमता और विकास की असली नींव उसके नागरिक होते हैं। अगर लोग स्वस्थ नहीं हैं तो शिक्षा, रोजगार, उद्योग और अर्थव्यवस्था की तमाम योजनाओं का पूरा फायदा उठाना भी मुश्किल हो जाता है।
लोकप्रियता के बजाय जिम्मेदारी का सवाल
मुंढे की बात का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि सरकारी अधिकारी की सफलता का पैमाना सोशल मीडिया की लोकप्रियता या लोगों की तारीफ नहीं, बल्कि उसके काम का वास्तविक असर होना चाहिए। खाद्य सुरक्षा जैसे विषय में कार्रवाई करते समय किसी अधिकारी को लोकप्रिय होने के बजाय नियमों को लागू करने और जनता के हित को प्राथमिकता देनी पड़ती है। यही वजह है कि उनका बयान एक बड़ी प्रशासनिक सोच को सामने रखता है—अधिकारी का काम लोगों को खुश करना नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी और निष्पक्षता से निभाना है।
सवाल सिर्फ खाने का नहीं, पूरे समाज की सेहत का है
तुकाराम मुंढे का संदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खाद्य सुरक्षा को अक्सर केवल मिलावट या रेस्टोरेंट की जांच तक सीमित करके देखा जाता है। वास्तव में यह करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है। साफ और सुरक्षित भोजन, सही गुणवत्ता, नियमों का पालन और प्रभावी निगरानी किसी भी स्वस्थ समाज की बुनियादी जरूरत हैं। ऐसे में महाराष्ट्र में चल रही खाद्य सुरक्षा की सख्ती को लेकर बहस चाहे जितनी हो, मुंढे ने अपनी प्राथमिकता बिल्कुल साफ कर दी है—उन्हें लोकप्रियता नहीं, जनता का स्वास्थ्य महत्वपूर्ण लगता है।




