अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | 7 सितंबर 2026
नक्शा बदला तो दुनिया की तस्वीर ही बदल गई
जिस दुनिया का नक्शा हम बचपन से स्कूलों की किताबों, एटलस और इंटरनेट पर देखते आए हैं, उसकी तस्वीर वास्तव में धरती के देशों और महाद्वीपों के असली आकार को सही तरीके से नहीं दिखाती। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शुक्रवार को 164 के मुकाबले 1 वोट से एक प्रस्ताव पारित कर दुनिया के नक्शों में इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन को बढ़ावा देने की सिफारिश की है। यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है और संयुक्त राष्ट्र ने पुराने मर्केटर नक्शे पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन पहली बार दुनिया के सामने यह बहस इतनी मजबूती से आई है कि आखिर हम धरती को जिस नक्शे के जरिए समझते हैं, वह कितना सही है।
अफ्रीका जितना दिखता है, उससे करीब 14 गुना बड़ा है
सबसे चौंकाने वाली बात अफ्रीका को लेकर है। पुराने मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड लगभग अफ्रीका जितना बड़ा दिखाई देता है, जबकि वास्तविक क्षेत्रफल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। यही वजह है कि नक्शे को लेकर उठी बहस सिर्फ तकनीकी या भौगोलिक मुद्दा नहीं रह गई है। सवाल यह है कि अगर चार-पांच सौ साल से दुनिया के बच्चे एक ऐसे नक्शे को देखकर बड़े हो रहे हैं जिसमें कुछ महाद्वीप जरूरत से ज्यादा बड़े और कुछ जरूरत से ज्यादा छोटे दिखाई देते हैं, तो क्या इससे दुनिया के बारे में हमारी सोच भी प्रभावित होती रही है?
यूरोप और उत्तरी अमेरिका बड़े, अफ्रीका और दक्षिण एशिया छोटे
मर्केटर प्रोजेक्शन में जैसे-जैसे भूमध्य रेखा से दूरी बढ़ती है, आकार का भ्रम भी बढ़ता जाता है। इसका असर खास तौर पर यूरोप, रूस और उत्तरी अमेरिका पर दिखाई देता है, जबकि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया अपने वास्तविक आकार से छोटे नजर आते हैं। मर्केटर नक्शा 1569 में कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने बनाया था। उस समय समुद्री यात्राओं के लिए दिशाओं और कोणों को सही रखना ज्यादा महत्वपूर्ण था। इसलिए उस नक्शे की अपनी उपयोगिता थी, लेकिन आज जब दुनिया को देशों के वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना के लिए नक्शे चाहिए, तो वही तरीका भ्रम पैदा करता है।
इक्वल अर्थ क्या बदलता है?
इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन का उद्देश्य देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल को वास्तविक अनुपात के ज्यादा करीब दिखाना है। इसके लिए नक्शे पर महाद्वीपों की सीमाओं को थोड़ा मोड़ा जाता है, लेकिन उनका क्षेत्रफल अधिक सही तरीके से प्रदर्शित होता है। यानी अफ्रीका को उसकी वास्तविक विशालता के करीब दिखाया जाता है और यूरोप या उत्तरी अमेरिका को उस अतिरिक्त आकार से बाहर लाया जाता है जो मर्केटर प्रोजेक्शन में दिखाई देता है। आसान शब्दों में कहें तो नया नक्शा आकार का भ्रम कम करता है और जमीन का वास्तविक अनुपात ज्यादा साफ दिखाता है।
अमेरिका अकेला देश जिसने विरोध किया
संयुक्त राष्ट्र में इस प्रस्ताव पर अमेरिका ने अकेले विरोध में वोट दिया। सर्बिया, एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा और यूक्रेन मतदान से अलग रहे। अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सेविच ने प्रस्ताव की आलोचना करते हुए इसे एक “कट्टर वैचारिक परियोजना” बताया और कहा कि संयुक्त राष्ट्र को वास्तविक समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि 16वीं सदी के नक्शों पर बहस करनी चाहिए।
अफ्रीकी देशों ने कहा—नक्शे सिर्फ तस्वीर नहीं बनाते
टोगो ने अफ्रीकी समूह की ओर से इस पहल का नेतृत्व किया और अफ्रीकी संघ ने भी इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन का समर्थन किया है। टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि नक्शे शिक्षा, कल्पना और दुनिया को देखने की सामूहिक सोच को प्रभावित करते हैं। इसलिए उनके अनुसार अफ्रीका को उसके वास्तविक आकार में दिखाना सिर्फ नक्शे में बदलाव नहीं, बल्कि दुनिया के सामने अफ्रीका की वास्तविक स्थिति को सामने रखना है।
क्या पुराना नक्शा अब पूरी तरह खत्म हो जाएगा?
नहीं। यह बात समझना बेहद जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव गैर-बाध्यकारी है। इसका मतलब यह नहीं है कि अब दुनिया के सभी नक्शों से मर्केटर प्रोजेक्शन हट जाएगा या हर स्कूल और वेबसाइट को तुरंत नया नक्शा अपनाना होगा। संयुक्त राष्ट्र ने केवल इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन के ज्यादा इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया है। यानी आगे स्कूल, संस्थान और तकनीकी कंपनियां अपने नक्शों में किस प्रोजेक्शन का इस्तेमाल करती हैं, यह उनके फैसले पर निर्भर करेगा।
असल सवाल नक्शे से ज्यादा हमारी सोच का है
धरती गोल है और उसे सपाट कागज पर उतारते समय किसी न किसी चीज में विकृति आना तय है। कोई नक्शा आकार को बेहतर दिखाता है तो दूरी या आकृति में समझौता करता है। मर्केटर ने दिशा और कोणों को प्राथमिकता दी थी, क्योंकि 16वीं सदी के जहाजों के लिए यह बेहद उपयोगी था। इक्वल अर्थ क्षेत्रफल को प्राथमिकता देता है। इसलिए सवाल यह नहीं कि पुराना नक्शा “झूठा” था और नया नक्शा “सच” है। असली सवाल यह है कि हम किस उद्देश्य से नक्शा इस्तेमाल कर रहे हैं और क्या हमें दुनिया के देशों का वास्तविक आकार समझाने वाला नक्शा भी उतनी ही प्रमुखता से नहीं दिखाना चाहिए?
500 साल बाद दुनिया फिर नक्शे को देख रही है
मर्केटर के नक्शे ने सदियों तक दुनिया को देखने का एक तरीका तय किया। अब संयुक्त राष्ट्र के इस कदम ने उस पुरानी तस्वीर को चुनौती दी है। अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका के वास्तविक आकार को समझने के लिए इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन एक अलग नजरिया देता है। नक्शा बदलने से दुनिया नहीं बदलती, लेकिन दुनिया को देखने का हमारा नजरिया जरूर बदल सकता है। और शायद इसी वजह से 500 साल पुराने नक्शे पर आज फिर इतनी बड़ी वैश्विक बहस खड़ी हो गई है।




