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जनधन योजना पर बड़ा सवाल: हर चौथा खाता निष्क्रिय, 5.72 करोड़ खातों में एक भी रुपया नहीं!

आरटीआई के जवाब में सामने आई तस्वीर—59 करोड़ से ज्यादा खातों में ₹3.15 लाख करोड़ जमा, लेकिन करोड़ों खाते इस्तेमाल से बाहर

राष्ट्रीय |ABC NATIONAL NEWS | जयपुर | 6 सितंबर 2026

हर चौथे जनधन खाते पर लगा निष्क्रियता का ठप्पा

प्रधानमंत्री जनधन योजना को देश के गरीब और बैंकिंग व्यवस्था से बाहर रहे लोगों को बैंकिंग से जोड़ने की बड़ी पहल के रूप में शुरू किया गया था। लेकिन अब एक आरटीआई के जवाब से इस योजना के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। जानकारी के मुताबिक जनधन योजना के हर चार खातों में से करीब एक खाता निष्क्रिय है। यानी करोड़ों खाते ऐसे हैं जिनका लंबे समय से नियमित इस्तेमाल नहीं हो रहा। इसके साथ ही करीब 5.72 करोड़ जनधन खातों में कोई शेष राशि यानी एक भी रुपया जमा नहीं था। यह आंकड़ा केवल बैंक खाते खोल देने और वास्तव में लोगों को लगातार बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने के बीच का अंतर सामने लाता है।

59 करोड़ से ज्यादा खाते, ₹3.15 लाख करोड़ से अधिक जमा

12 अगस्त 2026 तक देश में प्रधानमंत्री जनधन योजना के 59 करोड़ से अधिक खाते थे। इन सभी खातों में मिलाकर ₹3.15 लाख करोड़ से ज्यादा की राशि जमा थी। यानी योजना का आकार बहुत बड़ा है और करोड़ों परिवारों तक बैंकिंग व्यवस्था पहुंची है। लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि इतने बड़े नेटवर्क के बावजूद करोड़ों खाते निष्क्रिय हैं और लगभग 5.72 करोड़ खातों में कोई पैसा नहीं था। यही वजह है कि अब केवल खातों की संख्या को सफलता का पैमाना मानने के बजाय यह सवाल भी जरूरी हो गया है कि इन खातों का वास्तविक इस्तेमाल कितना हो रहा है।

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खाता खुल गया, लेकिन क्या बैंकिंग से जुड़ाव भी हुआ?

जनधन योजना का मूल उद्देश्य केवल बैंक खाता खोलना नहीं था। इसका मकसद ऐसे लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना था जो पहले बैंक खाते से दूर थे। लेकिन अगर बड़ी संख्या में खाते निष्क्रिय हो जाएं या उनमें कोई राशि न हो, तो सवाल उठता है कि इन खाताधारकों तक बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं का वास्तविक लाभ कितनी मजबूती से पहुंच पाया है। कई गरीब परिवारों के लिए बैंक खाता सरकारी सहायता, पेंशन, मजदूरी और दूसरी आर्थिक मदद पाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए निष्क्रिय खातों की बड़ी संख्या को केवल एक सामान्य बैंकिंग आंकड़ा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अब असली परीक्षा सिर्फ खाते खोलने की नहीं

इन आंकड़ों से जनधन योजना की उपलब्धियों पर सवाल उठाना जरूरी नहीं, लेकिन यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि खाते खोलने के बाद उन्हें सक्रिय बनाए रखने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। सरकार के सामने अब अगली चुनौती उन करोड़ों खातों को फिर से सक्रिय करने, खाताधारकों को नियमित बैंकिंग से जोड़ने और यह सुनिश्चित करने की है कि जरूरतमंद लोगों को सरकारी योजनाओं और वित्तीय सेवाओं का लाभ बिना बाधा मिलता रहे।

59 करोड़ खातों की बड़ी संख्या के बीच 5.72 करोड़ खाली खाते क्यों?

एक तरफ 59 करोड़ से ज्यादा जनधन खातों में ₹3.15 लाख करोड़ से अधिक जमा है, वहीं दूसरी तरफ 5.72 करोड़ खाते शून्य राशि वाले हैं। यही विरोधाभास इस पूरी तस्वीर को महत्वपूर्ण बनाता है। योजना का विस्तार निश्चित रूप से बड़ा है, लेकिन अब सवाल उसकी पहुंच से आगे बढ़कर उसके वास्तविक उपयोग का है। आखिर जिन लोगों के नाम पर खाते खोले गए, क्या वे नियमित रूप से बैंकिंग व्यवस्था का इस्तेमाल कर रहे हैं? और जो खाते निष्क्रिय हो चुके हैं, उन्हें दोबारा सक्रिय करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? जनधन योजना की अगली सफलता का पैमाना शायद यही होना चाहिए कि खाते कितने खुले नहीं, बल्कि उनमें कितने लोग वास्तव में सक्रिय रूप से बैंकिंग कर रहे हैं।

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