राजनीति/ बिहार-झारखंड | ABC NATIONAL NEWS | पटना/रांची | 1 सितंबर 2026
सोन नदी के पानी को लेकर बिहार और झारखंड के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद अब समझौते की राह पर पहुंच गया है। दोनों राज्यों ने सोमवार, 31 अगस्त को सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। दिल्ली में हुए इस समझौते के दौरान केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल मौजूद रहे। समझौते के तहत सोन नदी के कुल 7.75 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी में से 5.75 MAF बिहार और 2 MAF झारखंड के हिस्से में आएगा। इस समझौते को दोनों राज्यों के बीच जल संसाधन को लेकर लंबे समय से चले आ रहे मतभेद को सुलझाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
दरअसल, सोन नदी का पानी बिहार और झारखंड दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सिंचाई, कृषि, पेयजल और क्षेत्रीय जल प्रबंधन के लिहाज से नदी दोनों राज्यों की बड़ी जरूरतों से जुड़ी है। 1973 में जब बिहार और झारखंड एक ही राज्य का हिस्सा थे, तब सोन नदी के 7.75 MAF पानी के उपयोग को लेकर एक समझौता हुआ था। बाद में वर्ष 2000 में झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद पुराने समझौते के तहत पानी के बंटवारे और अधिकार को लेकर दोनों राज्यों के बीच मतभेद पैदा हुए। अलग-अलग प्रशासनिक जरूरतों और बढ़ती आबादी के बीच यह विवाद वर्षों तक चलता रहा।
अब नए MoU ने इसी पुराने विवाद को एक स्पष्ट जल-बंटवारा व्यवस्था देने की कोशिश की है। बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2 MAF पानी देने पर सहमति बनी है। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के अनुसार इस मुद्दे पर अब औपचारिक सहमति बन गई है। इसका अर्थ यह है कि दोनों राज्य सोन नदी के उपलब्ध जल संसाधन के उपयोग को लेकर एक तय हिस्सेदारी के आधार पर आगे बढ़ सकेंगे।
यह समझौता केवल कागज पर पानी का बंटवारा नहीं है, बल्कि इसके पीछे दोनों राज्यों के किसानों और कृषि अर्थव्यवस्था का बड़ा सवाल भी जुड़ा हुआ है। सोन नदी का पानी बिहार के बड़े हिस्से में सिंचाई के लिए इस्तेमाल होता है। दूसरी तरफ झारखंड में भी जल संसाधनों की उपलब्धता कृषि, उद्योग और स्थानीय विकास के लिए महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक विवाद रहने से जल प्रबंधन और उससे जुड़े कई फैसलों में जटिलताएं बनी रहती थीं। ऐसे में हिस्सेदारी स्पष्ट होने से भविष्य में जल उपयोग और परियोजनाओं को लेकर निर्णय लेना आसान हो सकता है।
समझौते का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बिहार और झारखंड दोनों ही मानसून और जल संसाधनों की अनिश्चितता से प्रभावित होने वाले राज्य हैं। एक तरफ अत्यधिक बारिश और बाढ़ जैसी परिस्थितियां चुनौती बनती हैं, तो दूसरी तरफ कई इलाकों में सिंचाई और जल उपलब्धता की समस्या रहती है। सोन नदी के पानी का वैज्ञानिक और संतुलित इस्तेमाल दोनों राज्यों में कृषि उत्पादकता तथा जल प्रबंधन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।
दिल्ली में हुए इस समझौते में केंद्रीय स्तर की मौजूदगी भी महत्वपूर्ण रही। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह तथा केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल की मौजूदगी में बिहार और झारखंड के मुख्यमंत्रियों द्वारा MoU पर हस्ताक्षर किए गए। इससे संकेत मिलता है कि लंबे समय से चले आ रहे अंतरराज्यीय जल विवाद को सहमति और समन्वय के माध्यम से सुलझाने की कोशिश की गई है। अंतरराज्यीय नदियों के पानी को लेकर राज्यों के बीच मतभेद अक्सर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय तक खिंचते हैं, इसलिए किसी साझा फार्मूले पर पहुंचना अपने आप में महत्वपूर्ण है।
इस समझौते की जड़ें हालांकि आज से नहीं, बल्कि 1973 के उस दौर तक जाती हैं जब बिहार और झारखंड अलग-अलग राज्य नहीं थे। उस समय तय किए गए 7.75 MAF जल आवंटन की व्यवस्था बाद में राज्य पुनर्गठन के साथ नई परिस्थितियों में आ गई। झारखंड के गठन के बाद यह सवाल सामने आया कि पुराने संयुक्त बिहार के लिए निर्धारित जल संसाधन का नए राज्यों के बीच किस तरह बंटवारा किया जाए। यही सवाल धीरे-धीरे विवाद का रूप लेता गया।
अब 53 वर्ष पुराने मूल जल समझौते की पृष्ठभूमि में दोनों राज्यों ने नई सहमति कायम की है। यह समझौता आने वाले वर्षों में सोन नदी के पानी को लेकर प्रशासनिक स्पष्टता देने के साथ-साथ दोनों राज्यों के बीच सहयोग का नया आधार भी बन सकता है। यदि निर्धारित हिस्सेदारी के अनुसार जल प्रबंधन प्रभावी ढंग से लागू होता है, तो इसका सीधा लाभ किसानों और उन क्षेत्रों को मिल सकता है जो सोन नदी की जल व्यवस्था पर निर्भर हैं।
सोन नदी को लेकर हुआ यह समझौता एक व्यापक संदेश भी देता है कि प्राकृतिक संसाधन सीमाओं में बंटे हो सकते हैं, लेकिन उनका प्रबंधन सहयोग से ही बेहतर तरीके से किया जा सकता है। बिहार और झारखंड के बीच नदी का पानी राजनीतिक विवाद का विषय बनने के बजाय साझा विकास का साधन बने, यही इस समझौते की सबसे बड़ी संभावित उपलब्धि होगी।
फिलहाल सबसे बड़ा तथ्य यही है कि बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2 MAF सोन नदी का पानी देने पर औपचारिक सहमति बन गई है। 1973 में अविभाजित बिहार के लिए तय 7.75 MAF जल आवंटन को लेकर अलग राज्य बनने के बाद पैदा हुआ विवाद अब एक नए समझौते के जरिए सुलझाने की दिशा में बढ़ा है। आने वाले समय में इस सहमति का असली असर इस बात से तय होगा कि दोनों राज्य तय हिस्सेदारी को जमीन पर कितनी प्रभावी और पारदर्शी तरीके से लागू करते हैं।




