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प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस की फेसियल रिकग्निशन तकनीक पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

प्रदर्शनकारियों के चेहरे की पहचान और बायोमेट्रिक डेटा जुटाने पर सवाल। CPI(M) सांसद एए रहीम की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार। निजी कंपनियों के साथ डेटा साझा करने का भी मुद्दा।

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 अगस्त 2026

प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा फेसियल रिकग्निशन तकनीक के कथित इस्तेमाल का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई है, जिसमें प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए चेहरे की पहचान तकनीक के इस्तेमाल और उनके बायोमेट्रिक डेटा को एकत्र करने तथा साझा किए जाने को चुनौती दी गई है।

यह याचिका CPI(M) के राज्यसभा सांसद एए रहीम ने दायर की है। मामले को हाल में जंतर-मंतर पर हुए Cockroach Janata Party यानी CJP के NEET पेपर लीक विरोधी प्रदर्शनों से जुड़ी लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया गया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले को पहले से लंबित याचिकाओं के साथ टैग किया है। इन याचिकाओं में प्रदर्शनकारियों की प्रोफाइलिंग के लिए फेसियल रिकग्निशन तकनीक और बायोमेट्रिक जानकारी के इस्तेमाल की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठाए गए हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अदालत को बताया कि मामला दिल्ली पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ फेसियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल से संबंधित है। उन्होंने यह भी आरोप रखा कि इस प्रक्रिया के तहत जुटाया गया डेटा दो निजी कंपनियों के साथ साझा किया जा रहा है।

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू नागरिकों के निजता के अधिकार से जुड़ा है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि किसी प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों के चेहरे और बायोमेट्रिक जानकारी को किस कानूनी आधार पर एकत्र किया जा सकता है और इस तरह के डेटा के इस्तेमाल की सीमाएं क्या होंगी।

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2017 के के.एस. पुट्टस्वामी मामले में निजता के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार माना था। इसी संवैधानिक संरक्षण के संदर्भ में प्रदर्शनकारियों की पहचान और उनके व्यक्तिगत डेटा के संग्रह का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है।

याचिका में यह भी सवाल उठता है कि किसी नागरिक के किसी विरोध प्रदर्शन में शामिल होने मात्र से क्या उसकी पहचान संबंधी संवेदनशील जानकारी को रिकॉर्ड और प्रोफाइल किया जा सकता है। साथ ही, यदि ऐसा डेटा किसी निजी संस्था के साथ साझा किया जाता है, तो उसकी सुरक्षा, उपयोग और संभावित दुरुपयोग को लेकर जवाबदेही किसकी होगी—यह भी अदालत के सामने महत्वपूर्ण प्रश्न हो सकता है।

फेसियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल कानून-व्यवस्था और अपराध की जांच में दुनिया के कई हिस्सों में बढ़ रहा है। भारत में भी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा इस तकनीक के इस्तेमाल को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। समर्थकों का तर्क है कि तकनीक अपराधियों की पहचान और जांच को तेज कर सकती है, जबकि इसके आलोचक निजता, निगरानी और गलत पहचान के जोखिम को लेकर चिंता जताते रहे हैं।

प्रदर्शनकारियों के मामले में यह बहस और संवेदनशील हो जाती है, क्योंकि शांतिपूर्ण विरोध और असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। दूसरी ओर, पुलिस के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने और हिंसा या अपराध में शामिल लोगों की पहचान करने की जिम्मेदारी भी होती है।

अब सुप्रीम कोर्ट के सामने चुनौती यही संतुलन तय करने की है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की सीमा क्या होनी चाहिए और नागरिकों के निजता के अधिकार की रक्षा किस तरह सुनिश्चित की जाए।

मामले की आगे की सुनवाई में अदालत इस बात पर भी गौर कर सकती है कि प्रदर्शनकारियों का बायोमेट्रिक डेटा किस कानूनी प्रावधान के तहत जुटाया गया, उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया और उसे निजी कंपनियों के साथ साझा करने की अनुमति किस आधार पर दी गई।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका को लंबित मामलों के साथ जोड़ना इस विवाद को व्यापक संवैधानिक संदर्भ देता है। आने वाली सुनवाई में यह मामला पुलिसिंग, तकनीक और नागरिक निजता के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है।

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