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महिलाओं के लिए सुरक्षित यात्रा का अदृश्य मूल्य: भारत का सच

भारत में कई महिलाएं यात्रा करते समय सुरक्षा के लिए अतिरिक्त खर्च, समय और मानसिक बोझ उठाती हैं। इसे “सेफ्टी प्रीमियम” या “अवॉइडेंस टैक्स” कहा जा सकता है—जहां महिलाएं जोखिम से बचने के लिए महंगे या अलग विकल्प चुनती हैं।

महिला/ लाइफस्टाइल | ABC NATIONAL NEWS | 11 अगस्त 2026

हकीकत क्या है?

NARI 2025 रिपोर्ट (नेशनल कमीशन फॉर वुमन द्वारा 31 शहरों की 12,770 महिलाओं का सर्वे) के अनुसार, लगभग 40 प्रतिशत शहरी महिलाएं अपने शहरों में खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। रात होने के बाद सुरक्षा का अहसास तेजी से गिर जाता है—बसों, मेट्रो और सार्वजनिक जगहों पर। सार्वजनिक परिवहन (29 प्रतिशत) और पड़ोस (38 प्रतिशत) सबसे ज्यादा जोखिम वाले इलाके बताए गए। केवल एक तिहाई महिलाएं उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराती हैं, और सिर्फ 25 प्रतिशत अधिकारियों पर भरोसा जताती हैं।

सर्वे में 2024 में 7 प्रतिशत शहरी महिलाओं ने सार्वजनिक जगहों पर उत्पीड़न का अनुभव बताया (24 साल से कम उम्र की महिलाओं में यह 14 प्रतिशत)। कई अध्ययनों में सार्वजनिक जगहों और परिवहन में यौन उत्पीड़न की दरें ऊंची बताई गई हैं। ये आंकड़े आधिकारिक NCRB केस रजिस्ट्रेशन से कहीं ज्यादा हैं, क्योंकि रिपोर्टिंग बहुत कम होती है।

परिणामस्वरूप भारतीय महिलाएं अक्सर ये व्यवहार अपनाती हैं:

– रात में अकेले पैदल न चलना
– अपरिचित शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट से बचना
– दिन के उजाले में पहुंचने की योजना बनाना
– महिलाओं जैसे विकल्पों को प्राथमिकता देना

अतिरिक्त खर्च कहां लगता है?

आवास: कई होस्टल्स और गेस्ट हाउस में महिलाओं-केवल डॉर्म या रूम उपलब्ध हैं। कुछ जगहों पर कीमतें मिलती-जुलती होती हैं, लेकिन मांग ज्यादा होने पर ये विकल्प महंगे पड़ सकते हैं या सीमित उपलब्धता के कारण जल्दी बुक हो जाते हैं। तमिलनाडु जैसे राज्यों में महिलाओं-केवल हॉस्टल्स की डिमांड बहुत ऊंची है (कुछ चेन में ऑक्यूपेंसी 90 प्रतिशत से ऊपर)। कोच्चि जैसे शहरों में सरकारी/नगर निगम द्वारा संचालित “शी लॉज” सस्ते विकल्प (डॉर्म ₹100 प्रति रात के आसपास) देते हैं, लेकिन ये पर्याप्त नहीं हैं।

परिवहन: दिल्ली में “पिंक टिकट” (मुफ्त बस यात्रा), कर्नाटक में शक्ति योजना, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसी योजनाओं से महिलाओं को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा मिलती है। रेलवे में लेडीज कोच और सख्त जुर्माने (कुछ डिवीजनों में पुरुषों के लिए ₹2500 तक) सुरक्षा बढ़ाने के प्रयास हैं। फिर भी कई महिलाएं अपरिचित शहरों में कैब या प्री-बुक्ड ट्रांसपोर्ट चुनती हैं, जो महंगा पड़ता है।

अन्य लागत: ट्रैवल इंश्योरेंस, दिन के उजाले वाली फ्लाइट/ट्रेन, महिलाओं-केवल टूर ग्रुप और सुरक्षित लगने वाले सेंट्रल लोकेशन वाले होटल। मानसिक लागत (cognitive load) सबसे भारी है—हर कदम पर जोखिम का आकलन।

सकारात्मक रुझान भी हैं

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय महिलाओं की सोलो ट्रैवल में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है (कुछ रिपोर्ट्स में 135 प्रतिशत तक की वृद्धि का जिक्र)। अमनाथ यात्रा जैसे धार्मिक स्थलों पर भी सोलो महिला यात्रियों का अनुपात बढ़ा है। मुंबई, कोहिमा, विशाखापट्टनम, भुवनेश्वर जैसे शहर NARI में अपेक्षाकृत सुरक्षित पाए गए। पूर्वोत्तर के कई हिस्से और कुछ पर्यटन स्थल बेहतर अनुभव देते हैं।

फिर भी, सुरक्षा अभी भी “प्रीमियम फीचर” बनी हुई है। जब महिलाएं मिश्रित जगहों पर असुरक्षित महसूस करती हैं तो वे उन विकल्पों की तरफ जाती हैं—और कीमत चुकाती हैं।

मूल सवाल: क्या सुरक्षित महसूस करना कोई अतिरिक्त खर्च का विषय होना चाहिए? भारत में मुफ्त बस यात्रा, लेडीज कोच, शी लॉज और बढ़ते महिलाओं-केवल टूर जैसे कदम सही दिशा में हैं। लेकिन असली समाधान व्यापक होगा—बेहतर स्ट्रीट लाइटिंग, प्रभावी पुलिसिंग, तेज न्याय, सार्वजनिक जगहों का जेंडर-सेंसिटिव डिज़ाइन और सामाजिक नजरिया बदलना।

जब तक ऐसा नहीं होता, भारतीय महिलाएं फैसला करती रहेंगी: क्या मेरी मानसिक शांति के लिए यह अतिरिक्त ₹1000-5000 या उससे ज्यादा खर्च करने लायक है? और अक्सर जवाब “हां” ही होता है।

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