राष्ट्रीय/दिल्ली/शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | 10 अगस्त 2026
नई दिल्ली। दिल्ली में छात्र आंदोलनों और विरोध-प्रदर्शनों को लेकर एक गंभीर सवाल सामने आया है—क्या प्रदर्शन खत्म होने के बाद भी आंदोलन में शामिल छात्रों का पीछा नहीं छूटता? द हिंदू की रिपोर्ट में दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा और अब चंडीगढ़ में समाजशास्त्र की पढ़ाई कर रही गुरकीरत समेत कुछ पूर्व प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया है कि दिल्ली पुलिस की पूछताछ और निगरानी उनके घरों तक पहुंच गई। छात्रों के मुताबिक, पुलिसकर्मी उनके परिवार के सदस्यों से उनके बारे में जानकारी लेते हैं, पुराने मामलों को लेकर नोटिस देते हैं और लंबे समय तक उन्हें मानसिक दबाव में रखते हैं। हालांकि, इन आरोपों पर पुलिस का पक्ष और प्रत्येक मामले के तथ्यात्मक विवरण सामने आना भी जरूरी है।
‘डर अब मेरे लिए नहीं, माता-पिता के लिए है’
रिपोर्ट के अनुसार गुरकीरत, जो पहले भगत सिंह छात्र एकता मंच से जुड़ी रही हैं, ने आरोप लगाया कि दिल्ली के शिवाजी एन्क्लेव स्थित उनके माता-पिता के घर पर पुलिसकर्मी कई महीनों से हर सात से 10 दिन में पहुंच रहे हैं। उनके मुताबिक पुलिस उनकी मौजूदगी और ठिकाने के बारे में परिवार से सवाल करती है तथा पुराने मामलों, जिनमें मानहानि से जुड़े मामले भी शामिल हैं, को लेकर नोटिस देती है। उनका कहना है कि विरोध-प्रदर्शन में भाग लेने के बाद पैदा हुआ दबाव अब केवल उनके ऊपर नहीं, बल्कि उनके परिवार तक पहुंच गया है। यदि किसी छात्र के खिलाफ कानूनी मामला लंबित है तो कानून के तहत जांच और नोटिस की प्रक्रिया अपनी जगह है, लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी शांतिपूर्ण राजनीतिक या छात्र विरोध में भाग लेने की कीमत परिवार को लगातार पुलिस पूछताछ और भय के रूप में चुकानी चाहिए?
विरोध का अधिकार खत्म होते ही क्या निगरानी शुरू हो जाती है?
लोकतंत्र में प्रदर्शन करना, सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और अपनी मांगों के लिए आवाज उठाना नागरिक अधिकारों की बुनियादी अभिव्यक्तियों में शामिल है। निश्चित रूप से किसी प्रदर्शन में कानून तोड़ने, हिंसा करने या किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल होने के आरोप हों तो पुलिस को कानून के मुताबिक कार्रवाई करने का अधिकार है। लेकिन शांतिपूर्ण विरोध और आपराधिक गतिविधि के बीच फर्क बनाए रखना उतना ही जरूरी है। छात्रों का आरोप यदि सही पाया जाता है कि प्रदर्शन में उनकी भागीदारी के कारण लंबे समय तक उनके घरों और परिवारों पर दबाव बनाया गया, तो यह केवल पुलिस कार्रवाई का सवाल नहीं रहेगा, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, असहमति के अधिकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाएगा।
दिल्ली से बाहर तक पहुंचने का दावा
रिपोर्ट में ऐसे छात्रों के आरोपों का उल्लेख है जो दिल्ली के पुराने छात्र आंदोलनों में शामिल रहे हैं और अब तमिलनाडु, कर्नाटक, ओडिशा जैसे राज्यों में रहते या पढ़ते हैं। उनका दावा है कि प्रदर्शन के लंबे समय बाद भी पुलिस की पूछताछ और निगरानी से जुड़ी घटनाएं सामने आईं। यदि विभिन्न राज्यों में रह रहे पूर्व प्रदर्शनकारियों के परिवारों तक पुलिस पहुंच रही है, तो इसकी स्वतंत्र और पारदर्शी जांच की जरूरत और बढ़ जाती है। पुलिस को स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसी पूछताछ किन मामलों में, किस कानूनी आधार पर और किस प्रक्रिया के तहत की गई। केवल ‘कानून-व्यवस्था’ का सामान्य हवाला देकर हर कार्रवाई को सही नहीं ठहराया जा सकता।
छात्र आंदोलन को अपराध की नजर से देखना खतरनाक
भारत में छात्र आंदोलनों की लंबी लोकतांत्रिक परंपरा रही है। विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाली जगह नहीं, बल्कि विचार, बहस और असहमति के केंद्र भी रहे हैं। छात्र जब फीस, रोजगार, परीक्षा, शिक्षा व्यवस्था या किसी सरकारी नीति को लेकर सवाल उठाते हैं तो उनका हर सवाल सरकार के खिलाफ साजिश नहीं हो सकता। उसी तरह पुलिस या प्रशासन की हर कार्रवाई को स्वतः दमन भी नहीं कहा जा सकता। असली कसौटी कानून, तथ्य और प्रक्रिया होनी चाहिए। अगर किसी छात्र पर गंभीर अपराध का आरोप है तो उसे न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना चाहिए; लेकिन अगर आरोप केवल विरोध में शामिल होने तक सीमित है, तो उसके परिवार को लगातार दबाव में रखना लोकतांत्रिक समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा।
पुराने मामलों का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए तो नहीं?
छात्रों ने पुराने मामलों में नोटिस और पूछताछ का आरोप लगाया है। यहां सबसे जरूरी सवाल पारदर्शिता का है। पुलिस को यह बताना चाहिए कि किन मामलों में नोटिस जारी किए गए, मामले किस स्थिति में हैं और संबंधित छात्रों को कानूनी प्रक्रिया के तहत किस हैसियत से पूछताछ के लिए बुलाया गया। यदि कोई मामला वर्षों पुराना है, तो उसके संबंध में अचानक बार-बार परिवार से पूछताछ क्यों हो रही है—इसका स्पष्ट जवाब जरूरी है। कानून की ताकत अपराध की जांच में होनी चाहिए, किसी नागरिक को भयभीत करने में नहीं।
परिवार को निशाना बनाना स्वीकार्य नहीं
किसी व्यक्ति के खिलाफ जांच चल रही हो तो उससे पूछताछ करना कानून का हिस्सा हो सकता है, लेकिन परिवार के सदस्यों को लगातार परेशान किए जाने का आरोप बेहद गंभीर है। माता-पिता से किसी छात्र के बारे में जानकारी लेना तभी उचित ठहराया जा सकता है जब उसका स्पष्ट कानूनी और जांच संबंधी आधार हो। अगर परिवार को केवल इसलिए बार-बार पुलिस के सामने जवाब देना पड़ रहा है क्योंकि उनका बेटा या बेटी किसी छात्र आंदोलन में शामिल था, तो यह लोकतांत्रिक असहमति के लिए भय का माहौल पैदा कर सकता है।
पुलिस की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी
यह पूरा मामला केवल छात्रों के आरोपों के आधार पर निष्कर्ष निकालने का नहीं है। पुलिस का पक्ष सामने आना चाहिए और जिन मामलों में आरोप लगाए गए हैं, उनकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि होनी चाहिए। लेकिन आरोप इतने गंभीर हैं कि उन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। दिल्ली पुलिस और संबंधित प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि प्रदर्शनकारियों के घरों पर कितनी बार पुलिस गई, किन मामलों में गई, क्या नोटिस दिए गए और क्या कार्रवाई किसी न्यायिक या वैधानिक प्रक्रिया के तहत की गई। पारदर्शिता ही इस विवाद का सबसे उचित जवाब हो सकती है।
लोकतंत्र में असहमति दुश्मनी नहीं
छात्र सरकार से सवाल पूछ सकते हैं, विरोध कर सकते हैं और अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतर सकते हैं। सरकार और पुलिस को भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब सत्ता के सामने असहमति की आवाज उठती है। अगर छात्र का सवाल गलत है तो उसका जवाब दीजिए, अगर उसका आरोप गलत है तो तथ्य सामने रखिए और अगर उसने कानून तोड़ा है तो कानून के अनुसार कार्रवाई कीजिए। लेकिन विरोध करने वाले छात्र और उसके परिवार को डर के साये में रखना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहचान नहीं हो सकती।
सवाल सिर्फ कुछ छात्रों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत का युवा सरकार से सवाल पूछने के बाद भी बिना डर के अपने घर लौट सकता है? अगर प्रदर्शन खत्म होने के महीनों और वर्षों बाद भी पुलिस की दस्तक घर के दरवाजे तक पहुंचती है, तो जवाबदेही केवल छात्रों की नहीं—सिस्टम की भी बनती है।




