ओपिनियन | आलोक रंजन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 जुलाई 2026
दिल्ली ने आंदोलनों का इतिहास देखा है। इस शहर ने सत्ता बदलने वाली आवाज़ें भी सुनी हैं और सत्ता को आईना दिखाने वाले जनसैलाब भी देखे हैं। लेकिन सोमवार की दिल्ली कुछ अलग थी। यह सिर्फ जंतर-मंतर का प्रदर्शन नहीं था। यह सिर्फ संसद मार्च नहीं था। यह सिर्फ एक संगठन का आंदोलन भी नहीं था। यह राजधानी की उन सड़कों का दिन था, जहां ट्रैफिक नहीं, लोकतंत्र खड़ा था। जंतर-मंतर छोटा पड़ चुका था। कनॉट प्लेस का सेंट्रल पार्क लोगों से भर चुका था। जनपथ, रायसीना रोड, संसद मार्ग, इंडिया गेट, प्रेस क्लब और आसपास की सड़कें हजारों युवाओं से अटी पड़ी थीं। ऐसा लग रहा था कि पूरा देश अपने भविष्य का जवाब मांगने दिल्ली चला आया है। दिल्ली जाम थी, लेकिन यह जाम गाड़ियों का नहीं, सवालों का था।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत इसकी संख्या नहीं थी, बल्कि उसका स्वरूप था। वहां सिर्फ दलित नहीं थे, सिर्फ पिछड़े नहीं थे, सिर्फ सवर्ण नहीं थे। सिर्फ मुसलमान नहीं थे, सिर्फ किसान नहीं थे, सिर्फ बेरोजगार नौजवान नहीं थे। वहां हर वर्ग, हर जाति, हर धर्म और हर राज्य के लोग दिखाई दे रहे थे। मेडिकल के छात्र थे, इंजीनियरिंग की तैयारी करने वाले युवा थे, प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी थे, उनके माता-पिता थे, सामाजिक कार्यकर्ता थे और आम नागरिक भी थे। उनकी राजनीतिक सोच अलग-अलग हो सकती थी, लेकिन उनकी चिंता एक थी—अगर मेहनत और प्रतिभा पर भरोसा खत्म हो जाएगा, तो देश का भविष्य किस भरोसे पर खड़ा रहेगा? शायद यही वजह थी कि यह आंदोलन किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे समाज की बेचैनी का प्रतीक बनता दिखाई दिया।
आंदोलन का केंद्र था कथित पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और नरेंद्र मोदी सरकार से स्पष्ट जवाब। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतता गया, आंदोलन केवल मांगों का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल बन गया। संसद की ओर बढ़ते छात्रों को रोकने के लिए राजधानी को बैरिकेडों में बदल दिया गया। जगह-जगह पुलिस की भारी तैनाती थी। जब प्रदर्शनकारी आगे बढ़े तो उन्हें रोकने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए, कई स्थानों पर लाठीचार्ज हुआ और भीड़ को पीछे धकेलने की कोशिश की गई। धुएं से भरी हवा, आंखों में जलन, भागते और फिर लौटते छात्र, सायरनों की आवाज़ और पुलिस की पंक्तियों के बीच एक बात साफ दिखाई दे रही थी—डर के बावजूद युवा पीछे हटने को तैयार नहीं थे। वे बार-बार संभलकर फिर आगे बढ़ रहे थे। शायद इसलिए कि उनके लिए यह सिर्फ प्रदर्शन नहीं, अपने भविष्य की लड़ाई थी।
दिनभर के घटनाक्रम के बीच कुछ ऐसे आरोप भी सामने आए, जिन्होंने इस पूरे आंदोलन को और अधिक संवेदनशील बना दिया। कई छात्रों और युवाओं ने आरोप लगाया कि संसद की ओर जाने वाले रास्तों पर लगाए गए कुछ बैरिकेडों में बिजली का करंट छोड़ा गया था, जिससे उन्हें झटके लगे। प्रदर्शनकारियों ने मौके पर इस संबंध में शिकायतें कीं और सोशल मीडिया पर कई वीडियो भी साझा किए। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और दिल्ली पुलिस ने भी इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की। हालांकि, सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ वीडियो में यह भी दिखाई दिया कि जब मीडिया कर्मियों ने मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों से इन आरोपों पर सवाल पूछे, तो कुछ पुलिसकर्मी कैमरे के सामने जवाब देने से बचते हुए वहां से हटते नजर आए। अगर ऐसे गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो लोकतंत्र में उनका जवाब तथ्यों और पारदर्शिता के साथ दिया जाना चाहिए। यदि आरोप गलत हैं तो उन्हें स्पष्ट रूप से खारिज किया जाना चाहिए, और यदि उनमें सच्चाई का कोई अंश है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। चुप्पी हमेशा संदेह को जन्म देती है।
इसी बीच सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वह वीडियो पूरे दिन की सबसे मार्मिक तस्वीर बन गया, जिसमें एक युवक पुलिसकर्मियों के सामने खड़ा होकर बार-बार कह रहा था—”मुझे मारो, सर… मारो।” कुछ क्षण बाद लाठियां उस पर बरसती दिखाई देती हैं। उस वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन उसने पूरे देश को झकझोर दिया। यह सिर्फ एक युवक की आवाज़ नहीं थी। यह शायद उस पीढ़ी की निराशा थी, जिसे लगता है कि उसकी मेहनत, उसकी परीक्षाएं और उसका भविष्य लगातार सवालों के घेरे में है। जब कोई युवा लाठी से बचने के बजाय उसे झेलने के लिए तैयार दिखाई दे, तो समझ लेना चाहिए कि उसके भीतर का आक्रोश कितना गहरा हो चुका है।
निस्संदेह सरकार का भी अपना पक्ष है। संसद की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और संवेदनशील इलाकों की रक्षा करना किसी भी सरकार और पुलिस की संवैधानिक जिम्मेदारी है। प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा कारणों से प्रदर्शनकारियों को रोका गया और आवश्यक कार्रवाई की गई। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि सुरक्षा और असहमति के बीच संतुलन बनाया जाए। अगर युवा सड़कों पर उतरकर अपनी बात कहना चाहते हैं, तो उन्हें सुनना भी लोकतंत्र की जिम्मेदारी है। बैरिकेड और लाठियां कुछ देर के लिए रास्ते रोक सकती हैं, लेकिन सवालों को ज्यादा देर तक नहीं रोक सकतीं।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह दिन कई संकेत देकर गया। लंबे समय बाद राजधानी की सड़कों पर ऐसा दृश्य दिखाई दिया, जहां आंदोलन की पहचान किसी जाति, किसी धर्म, किसी क्षेत्र या किसी राजनीतिक विचारधारा से नहीं हो रही थी। यह आंदोलन सही है या गलत, इसकी मांगें कितनी व्यावहारिक हैं या नहीं—इस पर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन इस बात से इनकार करना मुश्किल है कि जब हजारों युवा अलग-अलग पृष्ठभूमियों से निकलकर एक साथ खड़े हो जाएं, तो यह किसी भी सरकार के लिए चेतावनी का संकेत होता है। लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति तब नहीं होती जब लोग सड़कों पर उतरते हैं; सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब लोगों को यह महसूस होने लगे कि उनकी आवाज़ कहीं सुनी ही नहीं जा रही।
दिल्ली का जाम देर-सवेर खुल जाएगा। बैरिकेड हट जाएंगे। आंसू गैस का धुआं हवा में घुल जाएगा। संसद मार्ग पर फिर गाड़ियां दौड़ेंगी और राजधानी अपनी सामान्य रफ्तार पकड़ लेगी। लेकिन सोमवार की तस्वीरें शायद लंबे समय तक भारत की राजनीति और लोकतंत्र की स्मृति में दर्ज रहेंगी। क्योंकि उस दिन दिल्ली की सड़कों पर सिर्फ भीड़ नहीं थी, वहां अपने भविष्य, अपनी मेहनत और अपने अधिकारों का जवाब मांगता हुआ एक पूरा भारत खड़ा था। लोकतंत्र की असली ताकत सिर्फ चुनाव जीतने में नहीं होती, बल्कि उन सवालों को सुनने में होती है जो जनता सड़क पर लेकर आती है। और जब उन सवालों के केंद्र में देश का युवा हो, तो उन्हें टालना शायद किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक भूल साबित हो सकता है।




