राष्ट्रीय | अवधेश झा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 सितंबर 2026
फर्जी एसटी प्रमाणपत्र से नौकरी पाने का मामला
मुंबई से सामने आया यह मामला आरक्षण व्यवस्था और फर्जी जाति प्रमाणपत्र के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, शिरीष पी. पाटिल ने खुद को ‘टोकरे कोली’ अनुसूचित जनजाति का सदस्य बताते हुए प्रमाणपत्र हासिल किया और इसी आधार पर 1994 में मुंबई महानगरपालिका में कनिष्ठ सिविल इंजीनियर के पद पर नियुक्ति पाई। बाद में उनके एसटी प्रमाणपत्र की जांच शुरू हुई तो पुलिस सतर्कता प्रकोष्ठ ने परिवार के पुराने रिकॉर्ड खंगाले। जांच में परिवार के पूर्वजों के रिकॉर्ड में ‘कोली’, ‘हिंदू कोली’ और ‘हिंदू सूर्यवंशी कोली’ जैसे उल्लेख मिले, जिन्हें एसटी श्रेणी में नहीं माना गया। इसके बाद उनके एसटी प्रमाणपत्र की वैधता पर गंभीर सवाल उठे।
2009 में नोटिस, 2020 में प्रमाणपत्र रद्द
मुंबई महानगरपालिका ने जुलाई 2009 में पाटिल को कारण बताओ नोटिस जारी किया। इसके बाद प्रमाणपत्र की जांच की प्रक्रिया लंबे समय तक चलती रही। रिपोर्ट के मुताबिक पाटिल ने जांच समिति के सामने कार्यवाही को कई वर्षों तक टालने की कोशिश की। जनवरी 2020 में जांच समिति ने उनके प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित कर दिया। पाटिल ने इसके खिलाफ बंबई हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी और एसटी प्रमाणपत्र रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, 2021 में मिली अंतरिम राहत
मामला इसके बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। रिपोर्ट के अनुसार, 18 नवंबर 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सेवा से बर्खास्तगी पर अंतरिम रोक लगा दी। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रमाणपत्र रद्द होने के बावजूद पाटिल की नौकरी तत्काल खत्म नहीं हुई और वह मुंबई महानगरपालिका में काम करते रहे। आखिरकार 30 जून 2025 को वह सेवानिवृत्त हो गए। यानी जिस प्रमाणपत्र की वैधता पर वर्षों से सवाल चल रहा था, उसी विवाद के बीच उन्होंने तीन दशक से ज्यादा समय तक महानगरपालिका में नौकरी की।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख क्या रहा?
गुरुवार को न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने एसटी प्रमाणपत्र को रद्द किए जाने और बंबई हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। यानी अदालत ने यह नहीं कहा कि उनका एसटी प्रमाणपत्र सही था। इसके उलट प्रमाणपत्र को अमान्य करने का फैसला कायम रहा। लेकिन अदालत ने उनके मामले में एक नरम रुख अपनाया और उन्हें सेवानिवृत्ति लाभ के साथ शांतिपूर्वक सेवा से विदा होने की अनुमति दी।
परिवार को भविष्य में एसटी लाभ नहीं मिलेगा
सुप्रीम कोर्ट के सामने पाटिल की ओर से यह आश्वासन दिया गया कि वह या उनके परिवार का कोई सदस्य भविष्य में उस अमान्य एसटी प्रमाणपत्र के आधार पर किसी लाभ का दावा नहीं करेगा। इसी आश्वासन को ध्यान में रखते हुए अदालत ने उन्हें सेवानिवृत्ति लाभ देने की अनुमति दी। यानी अदालत ने प्रमाणपत्र को वैध नहीं माना, लेकिन लंबे समय तक चली न्यायिक प्रक्रिया और उनके द्वारा दिए गए आश्वासन को देखते हुए उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभों से पूरी तरह वंचित करने का रास्ता नहीं अपनाया।
फर्जी प्रमाणपत्र पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों से अलग रुख
यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले कई मामलों में साफ कर चुका है कि फर्जी या गलत एससी-एसटी प्रमाणपत्र के आधार पर शिक्षा या नौकरी हासिल करने वाले व्यक्ति को आरक्षण का लाभ बनाए रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसे मामलों में अदालतों ने नौकरी, प्रवेश और आरक्षण से जुड़े लाभ वापस लेने का रुख अपनाया है। इसलिए पाटिल को सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाने का फैसला अपने तथ्यों और लंबे समय तक चले मामले के संदर्भ में देखा जाना महत्वपूर्ण है।
आरक्षण के असली हकदारों के अधिकार का सवाल
इस मामले का सबसे गंभीर पहलू केवल एक कर्मचारी की नौकरी नहीं है। आरक्षण का उद्देश्य उन समुदायों को अवसर देना है जिन्हें संविधान और कानून के तहत विशेष संरक्षण दिया गया है। अगर कोई व्यक्ति गलत प्रमाणपत्र के जरिए उस श्रेणी में प्रवेश करता है तो इससे उस वर्ग के वास्तविक पात्र उम्मीदवारों का अवसर प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि फर्जी जाति प्रमाणपत्र के मामलों को अदालतें सामान्य सेवा विवाद की तरह नहीं देखतीं। ऐसे मामलों में प्रमाणपत्र की सत्यता, नियुक्ति का आधार और आरक्षण के वास्तविक लाभार्थियों के अधिकार सभी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
तीन दशक की नौकरी के बाद उठा अंतिम सवाल
पाटिल के मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर 2009 में ही मुंबई महानगरपालिका ने प्रमाणपत्र को लेकर कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया था और बाद में जांच में प्रमाणपत्र अमान्य पाया गया, तो मामला 2020 तक क्यों चलता रहा और फिर 2021 की अंतरिम राहत के बाद 2025 तक नौकरी कैसे जारी रही? यही लंबी कानूनी प्रक्रिया इस मामले को असाधारण बनाती है। सुप्रीम कोर्ट ने अंततः प्रमाणपत्र रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन उनकी लंबी सेवा और दिए गए आश्वासन को ध्यान में रखते हुए सेवानिवृत्ति लाभ देने का रास्ता चुना।
फैसले का मतलब यह नहीं कि फर्जी प्रमाणपत्र सही ठहरा
इस फैसले को समझने में एक बात बिल्कुल स्पष्ट रखना जरूरी है—सुप्रीम कोर्ट ने एसटी प्रमाणपत्र को सही नहीं माना। अदालत ने प्रमाणपत्र रद्द किए जाने के फैसले को बरकरार रखा। राहत इस बात पर दी गई कि पाटिल सेवानिवृत्त हो चुके थे और उन्होंने भविष्य में स्वयं या परिवार की ओर से उस अमान्य प्रमाणपत्र के आधार पर कोई लाभ नहीं लेने का आश्वासन दिया था। इसलिए इस फैसले को फर्जी प्रमाणपत्र के इस्तेमाल को मंजूरी के रूप में देखना सही नहीं होगा।
आरक्षण व्यवस्था की निगरानी पर फिर उठे सवाल
मामला यह सवाल जरूर छोड़ता है कि जाति और जनजाति प्रमाणपत्रों की जांच इतनी लंबी क्यों चलती है और नियुक्ति के शुरुआती चरण में प्रमाणपत्रों की पूरी तरह जांच क्यों नहीं हो पाती। अगर किसी व्यक्ति की पात्रता पर वर्षों बाद सवाल उठता है तो तब तक वह नौकरी, पदोन्नति और दूसरे सेवा लाभ हासिल कर चुका होता है। दूसरी तरफ वास्तविक पात्र उम्मीदवारों के लिए आरक्षित अवसर पहले ही खत्म हो चुका होता है। ऐसे मामलों से यह जरूरत सामने आती है कि आरक्षण प्रमाणपत्रों की जांच समयबद्ध, पारदर्शी और नियुक्ति से पहले प्रभावी तरीके से हो, ताकि न तो गलत व्यक्ति लाभ ले सके और न ही वास्तविक पात्र व्यक्ति अपने अधिकार से वंचित हो।




