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तीसरा ध्रुव कहीं अपना संतुलन तो नहीं खो रहा? क्या हिमालय की तबाही को हम फिर भी नजरअंदाज करेंगे?

हिमालय में कुछ सेकंड की तबाही ने पूरे दक्षिण एशिया को चेतावनी दे दी है—ऊंचे पहाड़ों पर जो टूटता है, उसका असर हजारों किलोमीटर दूर मैदानों तक पहुंच सकता है

ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 सितंबर 2026

हिमालय में हुई इस भयानक तबाही को सिर्फ एक और बाढ़ मान लेना शायद सबसे बड़ी भूल होगी। हजारों मीटर की ऊंचाई पर बर्फ, चट्टान और जमी हुई मिट्टी का एक विशाल हिस्सा अचानक टूटकर नीचे आया। देखते ही देखते पानी, मिट्टी, बर्फ और पत्थरों का ऐसा सैलाब बना कि रास्ते में आने वाली बस्तियां, सड़कें और पुल इसकी चपेट में आ गए। नेपाल और तिब्बत के बड़े हिस्से में तबाही मची और इसका असर भारत के मैदानी इलाकों तक महसूस हुआ। सबसे डराने वाली बात यह है कि हमें अभी इस घटना के पूरे असर का अंदाजा भी नहीं है। पहाड़ों में हुई ऐसी एक बड़ी टूटन सिर्फ उस दिन की तबाही नहीं होती। इससे पहाड़ों की ढलान कमजोर हो सकती है, नदियों का रास्ता बदल सकता है, नई झीलें बन सकती हैं या पुरानी झीलों पर दबाव बढ़ सकता है। यानी आज की एक आपदा आने वाले वर्षों में कई और आपदाओं की शुरुआत बन सकती है।

हिमालय सिर्फ पहाड़ नहीं, पूरे दक्षिण एशिया की जीवनरेखा है

हिमालय को हम अक्सर बर्फ से ढके खूबसूरत पहाड़ों के रूप में देखते हैं, लेकिन वास्तव में यह पूरा क्षेत्र करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ा है। गंगा, ब्रह्मपुत्र और दूसरी बड़ी नदियों का पानी इन्हीं पहाड़ों और ग्लेशियरों से आता है। नेपाल, भारत, बांग्लादेश और दक्षिण एशिया के दूसरे हिस्सों की खेती, पीने का पानी, बिजली और करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी इस प्राकृतिक व्यवस्था पर निर्भर है। इसलिए करीब 5,000 मीटर की ऊंचाई पर होने वाली कोई बड़ी घटना सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं रहती। पहाड़ से निकला पानी और मलबा नीचे आते-आते नदी को उफनाता है और फिर वही नदी हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले लोगों के लिए खतरा बन सकती है। इसीलिए हिमालय में होने वाली हर बड़ी टूटन को पूरे दक्षिण एशिया के लिए चेतावनी की तरह देखना होगा।

क्या इस बार भी हमने सिर्फ तबाही देखी और सबक नहीं लिया?

सबसे बड़ा सवाल यही है। हिमालय पहले से ही बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। यहां ग्लेशियर तेजी से बदल रहे हैं, जमीन के भीतर जमी बर्फ पिघल रही है, पहाड़ों की ढलान कमजोर हो रही है और मौसम का मिजाज भी बदल रहा है। दूसरी तरफ हम लगातार सड़कें बना रहे हैं, सुरंगें खोद रहे हैं, बांध और बिजली परियोजनाएं बना रहे हैं और पहाड़ों पर बस्तियों का विस्तार कर रहे हैं। विकास जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम पहाड़ की क्षमता समझकर विकास कर रहे हैं? अगर किसी इलाके की जमीन ही अस्थिर है, तो वहां कितनी बड़ी सड़क, कितनी गहरी सुरंग या कितनी बड़ी परियोजना बनाई जा सकती है, इसका जवाब सिर्फ इंजीनियरिंग से नहीं मिल सकता। इसके लिए भूगर्भ विज्ञान, पर्यावरण और स्थानीय लोगों के अनुभव को भी उतनी ही अहमियत देनी होगी।

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एक पहाड़ टूटता है, तो खतरा यहीं खत्म नहीं होता

हिमालय की सबसे बड़ी समस्या यह है कि एक घटना दूसरी घटना को जन्म दे सकती है। कहीं भारी मलबा नदी को रोक दे तो कुछ समय बाद अचानक पानी का बड़ा दबाव बन सकता है। कहीं नई झील बन जाए तो उसके टूटने से नीचे के इलाकों में अचानक बाढ़ आ सकती है। किसी ढलान के कमजोर होने के बाद कुछ दिन, कुछ महीने या कुछ साल बाद वही पहाड़ दोबारा टूट सकता है। इसलिए ऐसी आपदा के बाद सिर्फ सड़क और पुल बनाने का काम पूरा कर देना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि पहाड़ के अंदर और आसपास क्या बदलाव हुआ है। कौन-सी ढलान कमजोर हुई है? कौन-सी नदी का रास्ता बदला है? कहां नई झील बनी है? कहां अगली बड़ी टूटन का खतरा पैदा हुआ है? अगर इन सवालों के जवाब नहीं खोजे गए तो आज की तबाही कल और बड़ी मुसीबत बन सकती है।

खेती पर पड़ा असर सबसे बड़ा संकट बन सकता है

हिमालयी क्षेत्र की तबाही का असर सिर्फ मकानों और सड़कों तक सीमित नहीं रहेगा। बड़ी मात्रा में मिट्टी, रेत और पत्थर अगर खेतों पर जमा हो जाएं तो जमीन की खेती करने की क्षमता लंबे समय तक प्रभावित हो सकती है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नेपाल और उत्तर बंगाल से लेकर बिहार और आगे तक नदियों के साथ आने वाला मलबा कृषि जमीन और जल व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। अगर बड़े क्षेत्र में उपजाऊ जमीन खराब होती है तो इसका असर स्थानीय लोगों की आमदनी पर पड़ेगा। इसके बाद खाद्य उत्पादन घट सकता है और खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसलिए हिमालय की आपदा को सिर्फ राहत और पुनर्निर्माण के सवाल के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा के सवाल के रूप में भी देखना होगा।

बांध और बिजली परियोजनाओं पर भी नए सिरे से सवाल जरूरी

हिमालय में बिजली पैदा करने की बहुत बड़ी संभावना है और भारत को ऊर्जा की जरूरत भी है। लेकिन क्या हर जगह बड़ी परियोजना बनाना समझदारी है? यह सवाल अब पहले से ज्यादा गंभीर हो गया है। ऊंचे पहाड़ों से अचानक आने वाली बाढ़ और भारी मलबा बांधों, सुरंगों, बिजलीघरों और निर्माणाधीन परियोजनाओं के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। अगर किसी ऊपरी इलाके में बहुत बड़ा मलबा नीचे आता है और रास्ते में नदी तथा परियोजनाओं को प्रभावित करता है, तो नुकसान कई गुना बढ़ सकता है। इसलिए हर नई परियोजना से पहले यह देखना जरूरी है कि उस इलाके की भूगर्भीय स्थिति क्या है, वहां पिछले वर्षों में क्या बदलाव हुए हैं और भविष्य में अचानक आने वाली बड़ी आपदा का सामना करने की क्षमता कितनी है।

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क्या हमें हर जगह सुरंग और सड़क बनाने की दौड़ रोकनी होगी?

यह विकास के खिलाफ सवाल नहीं है। सवाल विकास के तरीके का है। पहाड़ मैदान नहीं हैं। यहां एक सड़क बनाने का मतलब सिर्फ सड़क बनाना नहीं है। पहाड़ काटने से ढलान पर दबाव बदल सकता है, पानी के प्राकृतिक रास्ते प्रभावित हो सकते हैं और बारिश या बर्फ पिघलने के समय जमीन ज्यादा कमजोर हो सकती है। सुरंगों और बड़ी परियोजनाओं के लिए भी यही बात लागू होती है। इसलिए हिमालय में विकास का नया नियम होना चाहिए—पहले पहाड़ की क्षमता समझो, फिर परियोजना बनाओ। अगर किसी जगह प्रकृति की सीमा पार हो रही है तो वहां परियोजना का आकार घटाना या उसे किसी दूसरी जगह ले जाना भी विकास की समझदारी हो सकती है।

तीसरा ध्रुव और पिघलती जमीन का डर

तिब्बत का विशाल पठार अक्सर धरती का तीसरा ध्रुव कहा जाता है। यहां दुनिया के सबसे बड़े ऊंचाई वाले जमे हुए भू-क्षेत्रों में से एक मौजूद है। इस जमीन में लंबे समय से बर्फ के साथ मिट्टी और चट्टान जमी हुई है। जब तापमान बढ़ता है तो यह जमी हुई जमीन पिघलने लगती है। इससे जमीन की मजबूती कम हो सकती है और पहाड़ों पर भूस्खलन तथा बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। जमी हुई जमीन में लंबे समय से जमा कार्बन और दूसरी गैसें भी तापमान बढ़ने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि इस एक घटना को सीधे वैश्विक तापमान में किसी निश्चित बदलाव का कारण बताना जल्दबाजी होगी। इसके वास्तविक वैश्विक प्रभावों को समझने के लिए वैज्ञानिकों को लंबे समय तक अध्ययन करना होगा। लेकिन खतरे के संकेतों को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं होगी।

क्या अगली बड़ी टूटन हमारा इंतजार कर रही है?

यही वह सवाल है जिसे सुनकर असहजता होती है, लेकिन पूछना जरूरी है। क्या यह सिर्फ एक अलग घटना थी या हिमालय में तेजी से बदल रही परिस्थितियों का संकेत? इसका जवाब अभी किसी के पास पूरी तरह नहीं है। वैज्ञानिकों को यह पता लगाना होगा कि इस घटना के बाद कितनी ढलानें कमजोर हुई हैं, कितने जलाशयों और नदियों का रास्ता बदला है और आगे किन इलाकों में खतरा बढ़ गया है। अगर इन सवालों पर अभी काम नहीं हुआ तो अगली घटना के समय हमारे पास फिर वही जवाब होंगे—बचाव दल भेजे जाएंगे, सड़कें बंद होंगी, पुल टूटेंगे और नुकसान का हिसाब लगाया जाएगा।

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नेपाल से बिहार तक एक ही नदी, एक ही खतरा

हिमालय की कोई सीमा नहीं होती, लेकिन नदियां राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानतीं। नेपाल में शुरू हुआ पानी और मलबा भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश तक पहुंच सकता है। आगे यही नदी व्यवस्था बांग्लादेश तक असर डाल सकती है। इसलिए हिमालय से जुड़ी आपदा को सिर्फ नेपाल या सिर्फ भारत की समस्या मानना गलत होगा। यह पूरे दक्षिण एशिया की साझा समस्या है। भारत, नेपाल, भूटान, चीन और बांग्लादेश को मिलकर हिमालयी नदियों, ग्लेशियरों, मौसम और भूस्खलन पर साझा जानकारी और चेतावनी व्यवस्था विकसित करनी होगी। किसी पहाड़ पर खतरा पैदा होने के बाद नीचे रहने वाले लोगों को कुछ घंटे पहले चेतावनी मिल जाए तो हजारों जानें बचाई जा सकती हैं।

अब सिर्फ राहत नहीं, हिमालय के लिए नई नीति चाहिए

भारत के सामने चुनौती बहुत बड़ी है। हमें अपने पुराने विकास मॉडल को हिमालय के हिसाब से बदलना होगा। वैज्ञानिक संस्थानों, मौसम विभाग, जल विशेषज्ञों, भूगर्भ वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों को एक साथ काम करना होगा। हर संवेदनशील इलाके का नया जोखिम नक्शा बनना चाहिए। बड़ी परियोजनाओं की समय-समय पर दोबारा जांच होनी चाहिए और जिन इलाकों में खतरा बढ़ गया है वहां निर्माण की सीमा तय करनी होगी। सिर्फ आपदा आने के बाद पैसा खर्च करने से बेहतर है कि पहले ही खतरे को पहचानकर तैयारी की जाए। इसके लिए बड़ी रकम लगेगी, लेकिन सवाल यह है कि आज कुछ हजार करोड़ बचाने की कोशिश में अगर कल लाखों करोड़ का नुकसान हो जाए तो वह कैसी समझदारी होगी?

हिमालय हमें चेतावनी दे रहा है

हिमालय ने हजारों साल में अपना रूप बनाया है और हम उसे कुछ दशकों में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। सड़कें चाहिए, बिजली चाहिए, पर्यटन चाहिए, रोजगार चाहिए—लेकिन इन सबके साथ एक और चीज चाहिए, प्रकृति की सीमा का सम्मान। पहाड़ों को सिर्फ जमीन या परियोजना की जगह समझना बंद करना होगा। यहां हर नदी, हर ढलान, हर ग्लेशियर और हर जंगल की अपनी भूमिका है। इस आपदा का सबसे बड़ा सबक यही है कि अगर हमने हिमालय की कमजोरी को नहीं समझा तो अगली तबाही सिर्फ पहाड़ों की नहीं होगी। उसका असर खेतों, शहरों, बिजली व्यवस्था, खाद्य कीमतों और करोड़ों लोगों की जिंदगी तक पहुंच सकता है।

सवाल अब यह नहीं है कि हिमालय बदल रहा है या नहीं। सवाल यह है कि जब हिमालय बदलेगा, तब क्या हम तैयार होंगे? और उससे भी बड़ा सवाल—हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसा हिमालय छोड़कर जाएंगे?

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